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कोरोनावायरस से वस्त्र उद्योग को भारी नुकसान

टी ई नरसिम्हन / चेन्नई April 12, 2020

 

देश के सबसे बड़े टेक्सटाइल केंद्रों में से एक तिरुपुर की व्यस्त रहने वाली सड़कें मौजूदा समय में सुनसान दिख रही हैं। यहां 10,000 फैक्टरियों (मुख्य तौर पर छोटे एवं मझोले उद्यम) में कामकाज ठप है। इन फैक्टरियों में 600,000 से ज्यादा लोग काम करते थे। यह शहर लगभग 25,000 करोड़ रुपये के निर्यात के लिए जाना जाता है और करीब इतना ही योगदान उसका घरेलू बाजार में है। अब इस शहर को महज तीन महीने में 10,000-12,000 करोड़ रुपये के नुकसान की आशंका है।

तिरुपुर की स्थिति लॉकडाउन के बाद से अन्य प्रमुख टेक्सटाइल क्षेत्रों की तरह ही है। कृषि के बाद, दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता टेक्सटाइल उद्योग मौजूदा दौर में अपनी 25 प्रतिशत नौकरियों का नुकसान दर्ज कर सकता है। लगभग 1.29 लाख लोगों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर है और इनमें करीब 70 प्रतिशत महिलाएं हैं।

जहां कोविड-19 महामारी से पूरी तरह उत्पादन ठप हो गया है और नए ऑर्डर प्रभावित हुए हैं, वहीं निर्यातकों का कहना है कि लॉकडाउन से पहले भेजी गई खेपों के भुगतान में भी विलंब हुआ है। निर्यातकों का कहना है कि कुछ ग्राहक इसलिए खेपों की डिलिवरी नहीं ले रही हैं क्योंकि उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं। रेडीमेड गारमेंट कंपनियों को चीन में मांग सुधरने से उम्मीद दिख रही है, लेकिन कोरोनावायरस यूरोप, अमेरिका और अन्य प्रमुख बाजारों में तेजी से फैल रहा है, जिससे रिटेलरों से नए ऑर्डर नहीं आ रहे हैं। यह सही है कि सरकार ने इन कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने और तरलता को बढ़ावा देने के लिए राज्य और केंद्र करों पर छूट 1 अप्रैल से आगे बढ़ा दी है, लेकिन इससे उन कई खरीदारों को मदद नहीं मिलेगी जो लॉकडाउन की वजह से कंगाली के दौर से गुजर रहे हैं और स्टोरों के लगातार बंद होने से निर्यात में गिरावट आई है।

इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के अनुसार वित्त वर्ष 2020 के लिए, मार्जिन 120-150 आधार अंक तक प्रभावित होने और तरलता पर दबाव से क्रेडिट मानक कमजोर रहने की आशंका है। रेटिंग एजेंसी का मानना है कि भारत का निर्यात (जो अमेरिका-चीन व्यापारिक टकराव की वजह से जनवरी 2020 तक पहले ही 40 प्रतिशत तक घट चुका है) वित्त वर्ष 2021 की पहली छमाही तक प्रभावित रहेगा। एजेंसी का कहना है कि पूरे टेक्सटाइल पोर्टफोलियो में एबिटा में कम से कम 15 प्रतिशत की कमी आएगी।

घरेलू टेक्सटाइल उद्योग में खेपें रुक गई हैं और अल्पावधि परिचालन पुन: शुरू होने को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। कुछ बड़ी कंपनियों के पास बुरे समय से निपटने के लिए पर्याप्त नकदी मौजूद है, लेकिन यदि कोरोनावायरस का प्रभाव अनुमान से ज्यादा समय तक बना रहा तो छोटी कंपनियों के लिए दुखद परिणाम सामने आएगा। मॉल और शॉपिंग केंद्र बंद रहने, आवाजाही प्रतिबंधित किए जाने, और परिवहन की सुविधा उपलब्ध नहीं होने से घरेलू बिक्री प्रभावित हुई है। भारत ने 2018-19 में 16.2 अरब डॉलर मूल्य के गारमेंट का निर्यात किया था। अपैरल सेक्टर का भारत के टेक्सटाइल निर्यात में वैल्यू के संदर्भ में 43 प्रतिशत और कुल निर्यात में 5 प्रतिशत का योगदान है।

रिटेल के जरिये निर्माण समेत पूरे गारमेंट उद्योग में करीब 2.5 लोग काम करते हैं। क्लोदिंग मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएमएआई) के अनुसार यदि मौजूदा हालात एक महीने के बाद भी बने रहे तो इस उद्योग में लगभग एक-चौथाई रोजगार समाप्त हो जाएगा। सीएमएआई का मानना है कि हालात सुधरने में कम से कम 10 महीने से लेकर एक साल का वक्त लगेगा। संगठन का कहना है कि सरकारी सहयोग के बगैर यह उद्योग इस कठिन दौर में अपना अस्तित्व बचाए रखने में सक्षम नहीं हो पाएगा।

राजस्थान के भीलवाड़ा को 25,000 करोड़ रुपये मूल्य के पीवी सूटिंग्स और डाइड यार्न के लिए प्रमुख केंद्र के तौर पर जाना जाता था। अब यह कोरोनावायरस का हॉटस्पॉट बन गया है। राजस्थान टेक्स्टाइल मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन एवं भीलवाड़ा में संगम के प्रबंध निदेशक एस एन मोदानी का कहना है कि इस शहर में टेक्सटाइल उद्योग लगभग 35,000 करोड़ रुपये का है जिसमें निर्यात भी शामिल है।

21 मार्च की रात से भीलवाड़ा में गतिविधि ठप हो गई है। यदि उद्योग 14 अप्रैल के बाद परिचालन पुन: शुरू करने में सफल रहा तो भी राजस्व को सालाना आधार पर 15-20 प्रतिशत नुकसान होने की आशंका है। निर्धारित खर्च की वजह से मुनाफे पर भी दबाव पड़ेगा। यदि लॉकडाउन बढ़ाया जाता है तो नुकसान और बढ़ जाएगा।

राजस्थान से कुल निर्यात लगभग 10,000 करोड़ रुपये का है। बंदरगाहों से मंजूरी नहीं मिलने, सीमाओं के सील होने और ग्राहकों द्वारा ऑर्डर रद्द किए जाने से 25 प्रतिशत व्यवसाय पहले ही समाप्त हो चुका है।

तिरुपुर निर्यातक संघ के अध्यक्ष राजा एम षणमुगम ने कहा, 'खासकर इटली और स्पेन से यूरोपीय खरीदार हमारे सदस्यों से गारमेंट निर्यात नहीं करने और कम से कम एक या दो महीने तक इंतजार करने को कह रहे हैं।' उन्होंने कहा कि छोटे एवं मझोले उद्यमी मौजूदा हालात में बैंक ऋण अदायगी में सक्षम नहीं होंगे। षणमुगम का कहना है, 'हमें यह आशंका सता रही है कि बकाया न मिलने की वजह से बैंक कहीं इस तरह की इकाइयों को बेसेल मानकों के तहत एनपीए परिसंपत्तियां घोषित न कर दें।' कुल मिलाकर, अब इस उद्योग की कंपनियां कोरोना प्रभाव कम होने और उसके बाद मांग सुधरने का इंतजार कर रही हैं।

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