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मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है कोविड-19

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  April 12, 2020

कई लोगों के लिए यह एक अनजानी अनिश्चितता का डर है कि उन्हें कितने दिन तक अपने रोजमर्रा के कामकाज को स्थगित रखना पड़ेगा। कई अन्य को आशंका है कि कहीं वे कोरोनावायरस के संपर्क में न आ जाएं या फिर कहीं यह उनकी वित्तीय हालत को नुकसान न पहुंचाए। परंतु बात केवल इतनी नहीं है। बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है जिनको आशंका है कि उनका रोजगार छिन सकता है। इसके बाद एक बड़ी चिंता यह है कि लोगों के वेतन में कटौती हो सकती है।

दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड-19 संकट ने आर्थिक और वित्तीय अस्थिरता का एक मिश्रण तैयार किया। इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा आशंकाएं सच हैं। लोगों के सामान्य जीवन में भारी उथलपुथल उत्पन्न हो गई है। जाहिर है इसका असर लोगों के भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में लोगों ने घबराहट में किराने की जमकर खरीदारी कर ली। यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे अस्थिरता और अनिश्चितता की आशंका में लोग अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। हकीकत में संक्रमित होने का खतरा कई लोगों में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की आशंका पैदा कर चुका है।

सबसे बड़ी आशंका यह है कि यह महामारी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डाल सकती है। यह कई तरीके से हो सकता है। उदाहरण के लिए घर से काम करना जो शुरुआती दिनों में वरदान प्रतीत हो रहा था वह धीरे-धीरे अरुचिकर प्रतीत होने लगा है। एक आशंका तो यह है कि लगने लगेगा कोई काम है ही नहीं। वहीं दूसरी ओर लोगों में ज्यादा काम करने की प्रवृत्ति पैदा होने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि उन्हें लंबे समय तक काम करना चाहिए ताकि वे अपने सहकर्मियों और बॉस को दिखा सकें कि वे काम करते समय दूसरों की तुलना में अधिक उत्पादक रह सकते हैं। जब लोग घर से काम करते हैं और समय पर कोई फोन नहीं उठा पाते या ईमेल का जवाब नहीं दे पाते तो सहकर्मियों को ऐसा लग सकता है कि वे काम को गंभीरता से ले भी रहे हैं या नहीं। आम जीवन में तनाव सामान्य बात है। परंतु एक बात जिसने जाने-अनजाने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालना शुरू कर दिया है वह यह है कि वैश्विक स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियों में नोवेल कोरोनावायरस ने लाखों लोगों को भौतिक रूप से शेष दुनिया से अलग-थलग कर दिया है। भविष्य के अज्ञात भय के साथ मिलकर यह बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अधिकारी के मुताबिक शारीरिक दूरी, पृथक्करण के उपाय, स्कूलों और कार्यालयों का बंद होना आदि कदम खासतौर पर चुनौती भरे हैं। क्योंकि ये कदम उन कामों को प्रभावित करते हैं जो हमें पसंद हैं, हमारे साथियों को हमसे दूर करते हैं।

अकेलापन दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण जोखिमों में से एक है। अब जबकि अनेक लोगों की आजादी से घूमने फिरने की गतिविधियों पर अंकुश लग गया है तो समस्या और बिगड़ गई है। खासतौर पर बुजुर्गों के लिए जिनका सामाजिक जीवन भी सीमित है। यहां डिजिटल युग हमारी सहायता कर सकता है। आखिरकार इससे पहले कभी अपने प्रिय लोगों से जुड़ा रहना इतना आसान नहीं रहा। कम से कम वीडियो कॉल के माध्यम से करीब होने का भ्रम तो होता है। ऐसा लगता है कि हम जिनसे बात कर रहे हैं वे हमारे आसपास हैं।

इस पृथक्करण का लाभ लेने का एक तरीका यह है कि हम उन चीजों की प्राथमिकता तय कर सकते हैं जो हमें पसंद हैं लेकिन जिनके लिए हम अब तक समय नहीं निकाल पा रहे थे। इस एकाकीपन को दूर करने के लिए लोगों को अपने जीवन के उन पहलुओं पर विचार करना चाहिए जिन पर वे अब तक ध्यान नहीं दे पाए थे।

मनोवैज्ञानिक जो सलाह दे रहे हैं उनमें से एक यह है कि कोविड-19 के बारे में कम से कम खबरें देखें, सुनें या पढ़ें क्योंकि वे हमें निराश करती हैं। बस दिन में एक या दो बार इसके बारे में जानकारी जुटाएं। अचानक इस बीमारी के बारे में खबरों की बाढ़ किसी को भी चिंतित कर सकती हैं।

इस समय बच्चों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। बच्चे संवेदनशील हैं और जब वे बड़ों को निराशाजनक ढंग से वायरस के बारे में बात करते देखते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं। इसका आगे चलकर उनके मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

अंत में, अब जबकि कोविड-19 के बाद छंटनी और वेतन कटौती अपरिहार्य है तो ऐसे में कंपनियों को ज्यादा सावधानी बरतनी होगी ताकि वे इससे उपजे तनाव से निपट सकें। इससे निपटने के तरीके को जितना पारदर्शी रखा जाए उतना ही अच्छा। हर कोई इसकी वजह से परिचित है लेकिन सभी चाहते हैं कि उनके साथ सम्मान से और समानुभूति से पेश आया जाए। संस्थान से बाहर जा रहे लोगों के साथ आप जिस तरह का व्यवहार करते हैं, उसे संस्थान के बाकी लोग बहुत गौर से देखते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोनावायरस की महामारी से लडऩा और निपटना केवल शारीरिक या स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है बल्कि यह मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है।

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