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बीच का रास्ता ही होगा कारगर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 12, 2020

ब्राजील के राष्ट्रपति जाइर बोल्सोनारो ने भारत से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और पैरासिटामॉल की मांग करते हुए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा और रामायण में लक्ष्मण का जीवन बचाने के लिए हनुमान के संजीवनी बूटी लाने के प्रसंग का जिक्र किया तो वह शायद ही जानते हों कि वह ऐसा कितने उपयुक्त समय पर कर रहे हैं। शायद उनके कार्यालय में कोई पक्का हनुमान भक्त है जिसने यह सुनिश्चित किया कि यह पत्र ठीक हनुमान जयंती के दिन यहां पहुंचे। चाहे जो भी हो, आज जब हम तीन सप्ताह के लॉकडाउन को आगे बढ़ाने (आशा है ऐसा न हो), पूरी तरह समाप्त करने (हम ऐसा भी नहीं चाहते) या व्यवस्थित छूट देने की बात पर चर्चा कर रहे हैं तो हमेंं ऐसी तमाम कहानियां याद आ रही हैं। हम इनमें से तीसरे विकल्प को प्राथमिकता देंगे बेशक बजरंगबली की मदद से। हमारे देवता केवल दयालु ही नहीं हैं बल्कि उनमें हास्यबोध भी है। खासकर उनमें जिनका जिक्र बोल्सोनारो ने किया।

हनुमान को याद कीजिए। लक्ष्मण अचेत पड़े हैं, उन्हें रावण के पुत्र मेघनाद जिसे इंद्रजित के नाम से भी जाना जाता है, ने आज के जमाने के हिसाब से किसी आधुनिक नियंत्रित शस्त्र से घायल किया है। लंका के बेहतरीन चिकित्सक सुषेण कहते हैं कि हिमालय की जादुई औषधि संजीवनी बूटी ही उन्हें बचा सकती है। जामवंत कहते हैं कि केवल हनुमान ही वह बूटी ला सकते हैं।

इसके बाद की कथा हमें मालूम है। बूटी को पहचानने में विफल हनुमान समूचा द्रोणागिरि पर्वत ही उठा लाए। हनुमान से जुड़ी कथाओं में यह अत्यंत चर्चित है। सुषेण ने तत्काल बूटी से लक्ष्मण का उपचार किया।

यह बात मौजूदा हालात पर भी लागू होती है। आईसीएमआर ने फरवरी के मध्य में देश में कोरोनावायरस संक्रमण के मामलों में इजाफे की निगरानी शुरू की। शुरुआत में लक्षण वाले संदेहास्पद, विदेश से लौटने वाले या उनके संपर्क में आने वाले लोगों का परीक्षण किया गया। यह तादाद बेहद कम थी। प्रति 10 लाख परीक्षण के मानक पर भी यह बेहद कम था। आईसीएमआर के विशेषज्ञों ने देश मेंं महामारी विज्ञान के सबसे पुराने और प्रचलित तरीके को अपनाया।

इसमें उन रोगियों के नमूने लिए गए जो सांस के गंभीर संक्रमण से ग्रस्त थे या जो गंभीर निमोनिया से पीडि़त होकर 50 बड़े अस्पतालों के आईसीयू में थे। शुरुआती दो सप्ताह में जो 826 नमूने लिए गए उनमें से एक भी कोविड-19 संक्रमित नहीं था। इसे इस बात का प्रमाण माना गया कि यह बीमारी अभी पहले और दूसरे चरण में है। यानी यह या तो विदेशों से आने वालों में है या उनके संपर्क में आने वालों में।

बाद के दिनों में जब जांच बढ़ी तो 19 मार्च को दो पॉजिटिव मामले सामने आए। अब तक के 965 नमूनों में से दो। किसी ने मुझसे कहा नहीं है लेकिन जितना मैं इस व्यवस्था को जानता हूं उसके हिसाब से यह खतरे की घंटी थी। उसी दिन देश भर के सभी अस्पतालों में सांस के गंभीर संक्रमण वाले मरीजों की जांच की घोषणा की गई। अगले दो सप्ताह में यानी 2 अप्रैल तक 4,946 जांच की गई।

आईसीएमआर की पिछले दिनों प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि सांस के गंभीर संक्रमण वाले 5,911 मामलों में 104 कोरोना पॉजिटिव निकले। यह अभी भी मात्र 1.8 फीसदी था लेकिन नगण्य ही। 21 से 23 मार्च के बीच यह स्थिति बन चुकी थी। इससे समझा जा सकता है कि कैसे लॉकडाउन की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। अब लक्षित हल तलाश करने का समय नहीं रह गया था। संक्षेप में कहें तो अब जड़ी बूटी पहचानने का नहीं बल्कि सीधे पहाड़ उठा लेने का वक्त था। इसके पश्चात क्या उस पहाड़ के समक्ष बैठकर तीन सप्ताह का वक्त काटा जाता? ऐसा करने पर तो लक्ष्मण की जान ही जोखिम में आ जाती। लक्ष्मण यानी अर्थव्यवस्था और देश का गरीब तबका मरणासन्न हो रहा था।  हमें किसी ऐसे ज्ञानी की आवश्यकता है जो जरूरी बूटी तलाश करे या कम से कम ऐसी बूटियों का समूह जो कारगर हों।

तमाम वैश्विक आकलन सामने आए हैं जिनमें कहा गया है कि भारत का लॉकडाउन इस महामारी को लेकर सबसे तीक्ष्ण प्रतिक्रिया है। सबसे उल्लेखनीय है द इकनॉमिस्ट द्वारा प्रयोग किया गया ग्राफिक। यह ग्राफिक ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के ब्लावत्नीक स्कूल ऑफ गवन्र्मेंट द्वारा तैयार किया गया है। भारत 100 प्रतिशत के साथ शीर्ष पर है जबकि इटली 90 प्रतिशत पर। परंतु यही सूचकांक हमारी सीमाएं भी दिखाता है। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में राजकोषीय प्रोत्साहन की बात करें तो भारत चार्ट में सबसे नीचे है।

इसे समझना मुश्किल नहीं है। सूचकांक में जितने भी देश शामिल हैं उनमें भारत सबसे गरीब है। भारत के बाद जो गरीब देश हैं वे उतने भी गरीब नहीं है। चीन और मलेशिया दोनों का प्रति व्यक्ति  जीडीपी भारत से पांच गुना है। भारत के सामने तिहरी चुनौती है। भारत भीड़ भरा देश है, उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई हुई है और वह गरीब है। इन हालात में व्यापक लॉकडाउन आवश्यक था। परिणाम बताते हैं कि यह कारगर रहा है। जांच का दायरा बढऩे के साथ संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। परंतु ग्राफ में गुणात्मक वृद्धि देखने को नहीं मिल रही है।

कुछ तो कारगर रहा है। बीसीजी से लेकर क्लोरोक्वीन तक या हमारी जीन संरचना तक क्या कारगर रहा है इस बारे में बात हो सकती है लेकिन लॉकडाउन का योगदान सबसे ज्यादा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक मांग इसे आगे बढ़ाने की होगी। कई राज्यों की सरकारें ऐसी मांग कर चुकी हैं। कुछ राज्य इसे बढ़ा भी चुके हैं।

क्या यह कारगर होगा? या फिर यह दवा के उस ओवरडोज की तरह होगा जो अल्पावधि में जीवन रक्षक है लेकिन ज्यादा इस्तेमाल से नुकसान करती है?

स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले दिनों रोकथाम के लिए जो योजना सामने रखी उससे कुछ बातें निकलती हैं। करीबी नजर डालें तो पता चलता है कि राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल कारगर है जिसे व्यापक भौगोलिक प्रसार और अलग-अलग जगहों की जरूरतों के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऐसे में पूरे देश को लॉकडाउन करने के बजाय भीलवाड़ा जैसी जगहों को पहचान कर उनके चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच दी जाए। दिल्ली समेत कुछ राज्यों में चिह्नित इलाकों को हॉटस्पॉट और रोकथाम क्षेत्र घोषित भी किया गया है।

हमें इस मॉडल को अपनाना चाहिए। यह एकबारगी लॉकडाउन की घोषणा करने से कहीं अधिक मुश्किल काम है। परंतु लॉकडाउन को तीन सप्ताह से आगे बढ़ाना काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है। तमाम लोग रोज कमाने और खाने वाले हैं। रबी की फसल कटाई और भंडारण की राह देख रही है। खेतों को खरीफ के लिए तैयार किया जाना है। फैक्टरियों को अपना काम शुरू करना है। इनमें दवा फैक्टरियां भी शामिल हैं। जहां कहीं भी चुनौती है, वहां रोकथाम का मॉडल अपनाया जाए।

वेंटिलेटर खरीदने पर काफी जोर है लेकिन हमें यह क्रूर सच समझना होगा कि वेंटिलेटर पर पड़े मरीज का क्या हाल होता है। पिछले दिनों व्हाइट हाउस में प्रेस से बातचीत में डॉनल्ड ट्रंप ने वेंटिलेटर से जुड़े एक सवाल पर कहा था कि क्या आप मुझसे यह पूछना चाहते हैं कि वेंटिलेटर पर जाने वाले लोगों में से कितनों की जान बचती है? आप नहीं जानना चाहेंगे।

परंतु एक दिन पहले न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू कुओमो ने गलती से ही सही लेकिन इसका जवाब दे दिया था। उन्होंने कहा था कि वेंटिलेटर पर गए मरीजों में से केवल 20 फीसदी ही जीवित बचते हैं। बेहतर यही होगा कि मरीजों को वेंटिलेटर पर जाने से पहले बचा लिया जाए।

यहां हमने 1.38 अरब की पूरी आबादी और 3 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था को वेंटिलेटर पर डाल दिया है। अब वक्त आ गया है कि मरीज को आंशिक रूप से ही सही खुद सांस लेने दी जाए।

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