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माकूल वक्त पर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 10, 2020

कोविड-19 महामारी नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के पहले साल को बचाने सही समय पर आई है। यह साल प्रतिकूल आर्थिक रुझानों के साथ शुरू हुआ था, अर्थव्यवस्था के गैर-सरकारी हिस्से की वृद्धि दिसंबर 2019 के पहले की दो तिमाहियों में महज तीन फीसदी ही रह गई थी। राजनीतिक तौर पर मोदी नागरिकता कानून में संशोधन के बाद देश भर में उपजे विरोध एवं धरनों के चलते एक बंद-गली की तरफ बढ़ चुके थे। इस कानून की कई राज्यों ने भी जोरदार मुखालफत की और दशकीय जनगणना भी खतरे में पड़ गई। लेकिन कुछ हफ्तों में ही पूरा विमर्श बदल चुका है। नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोग हट चुके हैं, राज्य सरकारें वित्तीय सहयोग की आस में केंद्र के आगे कतार में लगी हैं और सारी आर्थिक समस्याओं को अब आसानी से कोविड-19 के दरवाजे पर धकेला जा सकता है। कुछ अहम मुद्दों पर चर्चा के दौरान संसद में नहीं दिखे प्रधानमंत्री अब हरेक कुछ दिन पर राष्ट्रीय टेलीविजन पर आकर नोटबंदी वाले अंदाज में बिना किसी पूर्व सूचना के लॉकडाउन की घोषणा करते और उपदेश सुनाते हुए दिख जाते हैं। वह वैश्विक पटल पर भी उसी तरह सक्रिय भूमिका में हैं, कभी अमेरिका तो कभी ब्राजील के राष्ट्रपति उन्हें जरूरी दवाओं की आपूर्ति के लिए धन्यवाद दे रहे हैं। विपक्ष चारों खाने चित है। उसे इस संकट के समय खुद को राष्ट्रीय प्रयासों का अंग दिखाने के साथ आलोचना भी करनी है। मोदी जैसा चतुर नेता एक संकट में छिपा अवसर कभी नहीं गंवाता है और वह इसका इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने में कर रहे हैं। पीएम-केयर्स फंड इसकी एक मिसाल है। यह डॉनल्ड ट्रंप से कुछ खास अलग नहीं है जिन्होंने कोविड महामारी का इस्तेमाल करते हुए अपने चुनौतीकर्ता जो बाइडन को टीवी स्क्रीन से दूर ही कर दिया है। हालांकि गलतियां हो रही हैं लेकिन नेता के इर्दगिर्द पूरे देश के खड़े होने पर इन आलोचनाओं से पार पाना आसान है। ट्रंप ने महामारी से निपटने में देर से कदम उठाने एवं अनाड़ीपन दिखाने को लेकर हो रही आलोचनाओं को खारिज करते हुए चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन पर निशाना साधा है। वहीं मोदी ने लॉकडाउन की वजह से फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्या पर उनसे माफी मांगी। बांग्लादेश और सिंगापुर जैसे देशों ने लॉकडाउन करने के पहले अपने नागरिकों को समय दिया था लेकिन मोदी तो सर्जिकल स्ट्राइक में यकीन रखते हैं।

युद्धकाल में बड़े नेताओं की लोकप्रियता काफी बढ़ जाती है, खासकर अगर वे बहुत अच्छे वक्ता भी हों। चर्चिल ने द्वितीय विश्व युद्ध में अपने फैसलों से नाकामी को गले लगाया लेकिन कुछ बेहतरीन भाषण भी दिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भीषण आर्थिक मंदी (1929-33) से युद्ध संबंधी उत्पादन शुरू होने पर ही उबर पाई थी लेकिन इसका श्रेय रूजवेल्ट के 'न्यू डील'  कार्यक्रम को दिया जाता है। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दूसरा राष्ट्रपति चुनाव 'आतंक के खिलाफ युद्ध'  के नाम पर ही जीता था। यह युद्ध बहुत खराब मोड़ पर जाकर खत्म हुआ है लेकिन बुश तो अपने फार्महाउस में सुरक्षित हैं। लाल बहादुर शास्त्री भी एक नायक के तौर पर सामने आए क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान को रोक दिया था और नेहरू की तरह उन्हें चीन से शिकस्त नहीं खानी पड़ी थी। मोदी खुद को एक युद्धकालीन प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के लिए बेचैन हैं। पिछले साल बालाकोट एयर स्ट्राइक का इस्तेमाल चुनाव का रुख अपनी तरफ मोडऩे के लिए बखूबी किया गया था जबकि हमने उस कोशिश में खुद से काफी कमजोर दुश्मन के खिलाफ अपना एक विमान भी गंवा दिया था। इस सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये पुलवामा में हुए आतंकी हमले से पैदा हुए सुरक्षा नाकामियों के सवाल दरकिनार कर दिए गए। अब मोदी के सामने कहीं अधिक वास्तविक लेकिन अलग तरह का युद्ध है जिसकी तुलना उन्होंने महाभारत से की है। अगर आप मोदी के अगले कदम का अनुमान लगाना चाहते हैं तो वर्ष 2007 का उनका एक बयान याद करें। उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष को 'जन-आंदोलन'  बनाने में महात्मा गांधी की भूमिका की तारीफ करते हुए कहा था कि वह विकास को ऐसा ही जन-आंदोलन बनाना चाहते हैं।

गैस सब्सिडी छोडऩे के लिए चलाए गए 'गिव इट अप'  अभियान की ही तरह मोदी 'जनता कफ्र्यू'  लागू कर और लोगों को थाली बजाने एवं दीया जलाने को कह इसे जन-आंदोलन की शक्ल देना चाहते हैं। हालांकि इनकी तुलना 'दांडी मार्च'  से नहीं हो सकती लेकिन कोविड की तरह मोदी का काम भी अभी खत्म नहीं हुआ है। इस बीच मुस्लिमों को अलग-थलग करने की कोशिश एक जन-आंदोलन में तब्दील हो चुकी है।

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी, कोविड-19, आर्थिक मंदी,
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