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लॉकडाउन समाप्त हो अथवा नहीं?

शंकर आचार्य /  April 10, 2020

कोविड-19 के कारण लागू तीन सप्ताह का देशव्यापी लॉकडाउन 14 अप्रैल की मध्य रात्रि को समाप्त हो रहा है। सरकार को उससे कुछ समय पहले कुछ विकल्पों में से एक की घोषणा करनी होगी: (क) लॉकडाउन की अवधि में कुछ सप्ताह का इजाफा, (ख) लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना और (ग) लॉकडाउन को तत्काल पूर्ण रूप से समाप्त करना। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत के बारे में मीडिया में आई जानकारी से संकेत निकला कि उनसे यह चर्चा की गई कि लॉकडाउन के दौरान लगे प्रतिबंधों को किस प्रकार चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाए। अन्य खबरों के मुताबिक लॉकडाउन को कुछ सप्ताह आगे बढ़ाया जा सकता है। मेरा मानना है कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।

कोविड-19 के खिलाफ इस जंग में लॉकडाउन चीन, अमेरिका और बड़े यूरोपीय देशों में स्वैच्छिक हथियार बना। दिलचस्प है कि जर्मनी और दक्षिण कोरिया ने लॉकडाउन को नहीं अपनाया जबकि वहां इस महामारी से होने वाली मृत्यु दर सबसे कम है। इन देशों और भारत के बीच कम से कम चार बड़े अंतर हैं जो भारत के लिए लंबे लॉकडाउन को वांछित नहीं बनाती। पहली बात तो यह कि भारत एक गरीब मुल्क है जहां औसत आय चीन की औसत आय के पांचवें हिस्से और यूरोप या अमेरिका की औसत आय के 20वें हिस्से के बराबर है। देश के 20 फीसदी परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रहे हैं। जबकि 20 से 30 प्रतिशत लोगों की हालत उनसे कुछ ही बेहतर है। इसका अर्थ यह है कि करीब आधी आबादी किसी तरह दिन काट रही है। मौजूदा लॉकडाउन जैसी स्थिति में उनके पास आय में आई कमी से निपटने का कोई जरिया नहीं है। लॉकडाउन बढऩे पर वे अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरा नहीं कर पाएंगे।

दूसरी बात, देश की श्रम शक्ति का करीब 80 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है। इनकी आय बहुत कम रहती है। यह प्राय: अनुशंसित न्यूनतम वेतन से भी कम रहती है। लॉकडाउन की स्थिति में जहां कम से कम आधी आर्थिक गतिविधियां ठप हैं, वहां रोजगार और आय के मोर्चे पर सबसे अधिक नुकसान कामगारों को ही उठाना पड़ा। टेलीविजन पर नजर आने वाले हजारों प्रवासी श्रमिक जो सैकड़ों मील चलकर अपने घरों को गए, वे इसे अच्छी तरह दर्शाते हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकनॉमी के ताजा सर्वेक्षण से पता चलता है कि मार्च के आखिरी सप्ताह में बड़े पैमाने पर रोजगार की हानि और श्रम शक्ति भागीदारी में गिरावट देखने को मिली। चूंकि यह श्रम शक्ति मोटे तौर पर असंगठित क्षेत्र में है इसलिए उसे हर्जाना देना या सुरक्षित रखना भी मुश्किल है। सरकार की आय या खपत समर्थक योजनाओं का भी उन्हें लाभ नहीं मिलेगा।

तीसरी बात गरीब देशों की तरह भारत में भी कल्याण योजनाएं यूरोपीय शैली के राष्ट्रीय कल्याण ढांचे का विकल्प नहीं हैं। हमें उनकी तरह बेरोजगारी बीमा और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलती।

चौथा, स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और सेवाओं की अमेरिका और यूरोप के देशों से तुलना नहीं की जाती। यह बेहद खराब है। उन देशों में लॉकडाउन के पीछे बुनियादी दलील यह थी कि इस अवधि का इस्तेमाल अस्पताल के बेड, वेंटिलेटर और पीपीई आदि खरीदने या कोविड-19 मरीजों की बढ़ती तादाद को देखते हुए इनकी बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए इनका निर्माण करने में किया जाएगा। निकट भविष्य में यानी एक डेढ़ साल में कोविड-19 का टीका बनने तक या इसका उपचार सामने आने तक यूं ही बच बचाकर रहना होगा। भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो कोविड-19 के उपचार के लिए इन सुविधाओं में इजाफा कर पाना काफी हद तक मुश्किल नजर आता है। देश में लॉकडाउन तीन सप्ताह चले या तीन महीने, हम जो चीजें 70 वर्ष में नहीं हासिल कर पाए वे कुछ सप्ताह में नहीं हासिल होंगी।

प्रश्न यह है कि मौजूदा लॉकडाउन से आर्थिक गतिवधियां ठप करने, व्यापक पैमाने पर रोजगार की हानि के अलावा क्या हासिल हो रहा है? कुछ बातें तो हो रही हैं। मसलन बीमारी का प्रसार धीमा पड़ा है। लॉकडाउन के कारण हमें अस्पताल सुविधाओं की उपलब्धता और गहन चिकित्सा के लिए जरूरी उपकरणों को जुटाने में मदद मिल रही है। स्क्रीनिंग, टेस्टिंग और क्वारंटीन करने में आसानी हो रही है। दूसरा, इसके चलते लोग नाटकीय ढंग से अपने घर में सिमट गए हैं। इससे विभिन्न प्रकार की लागत में कमी आई है। लॉकडाउन समाप्त होने के बाद भी सामाजिक दूरी जैसे मानकों, बार-बार हाथ धोने, मास्क पहनने जैसी आदतें दीर्घकाल में काम आ सकती हैं। बड़े पैमाने पर लोगों के जमाव को भी कम किया जा सकता है। यह सही है कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में जहां तमाम लोग कच्ची बस्तियों में रहते हैं इसमें से काफी कुछ नहीं हो पाएगा। बहरहाल, हमें इन लाभों की भारी आर्थिक और मानवीय कीमत चुकानी पड़ सकती है।

लॉकडाउन करने वाले अमीर देशों में इसकी लागत और लाभ को लेकर बहस चल रही है। इसे मोटे तौर पर कोविड से होने वाली मौतों के कम होने और इसकी आर्थिक कीमत के संदर्भ में देखा जा रहा है। भारत के लिए ऐसी बहस बहुत सामान्यीकृत हो जाएगी। यह समझने की बात है कि दीर्घकालिक लॉकडाउन से मौतों की तादाद बढ़ेगी क्योंकि लोगों की आय समाप्त हो गई है और उन्हें पर्याप्त पोषण तथा विभिन्न बीमारियों मसलन टीबी, डायरिया, श्वसन समस्या, दिल की बीमारियों, मधुमेह आदि का उचित इलाज नहीं मिल पाएगा। इसके अलावा भूख से भी लोगों की मौत होगी। लॉकडाउन में केवल जीडीपी का नुकसान नहीं होगा। बल्कि इस दौरान लोग कोविड से भी मरेंगे और दूसरी वजहों से भी। ज्यादातर मौतें गरीबों की होंगी। किसी को नहीं पता कि कितनी मौत होंगी। मेरा मानना है कि मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन को 14 अप्रैल के बाद नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।

जैसा कि लगातार कहा जा रहा है, हमें यह भी आशा करनी चाहिए कि गर्मियां बढऩे के साथ कोविड-19 वायरस कमजोर पड़ेगा।

(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, Virus, Flu, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी,
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