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उद्योग जगत ने मांगा 23 लाख करोड़ रुपये का पैकेज

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली 04 08, 2020

उद्योग जगत ने देशबंदी को धीरे-धीरे खत्म किए जाने और उद्योग व समाज के कमजोर तबके के लिए 23 लाख करोड़ रुपये तक का पैकेज दिए जाने की मांग की है।

एसोचेम ने 15 से 23 लाख करोड़ रुपये (200 बिलियन से 300 बिलियन डॉलर), फिक्की ने  9 से 10 लाख करोड़ रुपये, पीएचडीसीसीआई ने 9 लाख करोड़ रुपये और सीआईआई ने जीडीपी के 2 प्रतिशत के बराबर पैकेज दिए जाने की जरूरत बताई है। अगर देश की अर्थव्यवस्था का आकार वित्त वर्ष 21 में 224.89 लाख करोड़ रुपये माना जाए, जिसके आधार पर बजट तैयार किया गया है तो जीडीपी का 2 प्रतिशत 4.5 लाख करोड़ रुपये होता है। बहरहाल अर्थव्यवस्था का आकार इस परिकल्पना की तुलना में बहुत कम हो सकता है।

भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्यकांति घोष के मुताबिक उद्योगों को बढऩे में मदद करने व श्रमिकों को भुगतान करने व राज्यों को बजट समर्थन देने के लिए 6.6 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। उन्होंने देशबंदी को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की भी बात की।

सीआईआई की ओर से वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों को भेजे गए एक नोट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष के दौरान जीडीपी वृद्धि दर दो प्रतिशत से ज्यादा रहने की संभावना नहीं है, वृद्धि दर इससे कम भी रह सकती है। चैंबर ने कहा है, 'यह हमारा सुविचारित फैसला है कि इसका असर बहुत बुरा होगा। हम सरकार के इस विचार से पूरी तरह से सहमत हैं कि जितनी जल्दी हो सके, बंदी को धीरे धीरे हटाने की जरूरत है।'

सीआईआई ने कहा है कि सरकार को एक डैशबोर्ड तैयार करने की जरूरत है, जिस पर इस महामारी के बारे में विभिन्न प्रमुख शहरों और राज्यों से संबंधित जानकारी दी गई हो। शहरों व राज्यों में काम शुरू करना इस डैशबोर्ड पर आधारित होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि धीरे-धीरे छूट दिए जाने से मानव संसाधन के निश्चित अनुपात में काम पर वापस लौटेगा और डैशबोर्ड पर हो रहे बदलाव के आधार पर उनकी आवाजाही तय की जानी चाहिए।

जिन क्षेत्रों में घर से काम करना मुश्किल है और वे बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं, उन्हें सबसे पहले शुरू किए जाने की जरूरत है।

पहले चरण में विनिर्माण, ई-कॉमर्स और निर्माण हो सकते हैं। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स और परिवहन को परिचालन की अनुमति दूसरे चरण में दी जानी चाहिए, जो पहले चरण के दो से तीन सप्ताह बाद हो सकता है। चैंबर ने कहा है कि अन्य शेष क्षेत्रों में काम डैशबोर्ड पर होने वाली प्रगति के आधार पर शुरू किया जाना चाहिए।

काम शुरू करने के बाद 50 प्रतिशत कर्मचारियों को बहाल करने में करीब 3 सप्ताह लग सकते हैं। इसके बाद धीरे धीरे इसे बढ़ाया जा सकता है, जो इस पर आधारित हो कि विभिन्न शहरों व राज्यों में डैशबोर्ड में बदलाव की क्या स्थिति है। जीडीपी के 2 प्रतिशत पैकेज की मांग का औचित्य बताते हुए चैंबर ने कहा है कि संकट जल्द खत्म नहीं होने जा रहा है, सरकार को अपनी सभी ताकत अचानक लगा देने की जरूरत नहीं है।

रियल एस्टेट क्षेत्र की समस्या तेजी से बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र तक पहुंच जाने के डर को देखते हुए चैंबर चाहता है कि सरकार 30,000 करोड़ रुपये के एक कोष का गठन करे, जिसका इस्तेमाल बैंक कुछ दारयों और कुछ विशेष शर्तों के साथ कर सकें। बैंक इस धन का इस्तेमाल टियर-1 बॉन्ड जारी करने के माध्यम से कर सकते हैं, जो फंड के विकल्प के माध्यम से इक्विटी में बदल सकेगा। चैंबर ने समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए अतिरिक्त समर्थन देने की मांग की है, जो सरकार द्वारा हाल में घोषित 1.7 लाख करोड़ रुपये पैकेज से अतिरिक्त होगा। इसमें जेएएम खाताधारकों को 2 लाख करोड़ रुपये दिए जाने की मांग की गई है।

इसमें सरकार को उद्योग के लिए सीधे सब्सिडी देने के बजाय, जैसा कि अन्य तमाम देशों में किया गया है, बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से लीवरेज (5-6 गुना) देने और उद्योग को बैंकों के माध्यम से समर्थन दिए जाने की मांग की गई है।

इसमें कहा गया है, 'हमारा अनुमान है कि अर्थव्यवस्था को 14-14 प्रतिशत कर्ज विस्तार दिए जाने की जरूरत है।'इसमें मांग की गई है कि बैंकों को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी मुहैया कराने की जरूरत है, जो उधारी लेने वाले के अप्रैल-जून के वेतन बिल के बराबर हो और इसको सरकार की ओर से गारंटी मिले और रिजर्व बैंक की रिफाइनैंस गारंटी के साथ उस पर 4 से 5 प्रतिशत ब्याज लिया जाए। चैंबर ने कहा है कि अप्रैल-जून की ब्याज बाध्यता को लेकर इसी तरह की सुविधा दबाव वाले क्षेत्रों को भी दी जानी चाहिए। चैंबर यह भी चाहता है कि बैंकों को कार्यशील पूंजी को लेकर सभी उद्योगों के लिए बढ़ी कर्ज सीमा तय करने की अनुमति दी जाए। सीआईआई ने कहा है कि कोविड बीमा योजना की घोषणा विस्थापित श्रमिकों के लिए भी 3 महीने के लिए होनी चाहिए, जिसपर आने वाले खर्च का एक हिस्सा उद्योग और एक हिस्सा सरकार वहन करे। उसके बाद विस्थापित कर्मचारियों को स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा ई पास जारी किए जाने चाहिए, जिससे वे अपने कार्यस्थल तक पहुंच सकें।

फिक्की ने कहा है कि अर्थव्यवस्था के सभी स्तरों पर राहत और पुनर्वास के लिए 9 से 10 लाख करोड़ रुपये डाले जाने की जरूरत है, जिसमें निचले स्तर से लेकर पिरामिड के उपरी स्तर तक के लोग यानी अनौपचारिक श्रमिकों, एमएसएमई और बड़े कॉर्पोरेट तक शामिल हों। चैंबर चाहता है कि कोविड के बाद के लिए 2 लाख करोड़ रुपये का पुनरुद्धार कोष 'भारत सेल्फ सफिसिएंसी फंड'बनाया जाना चाहिए।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखे गए पत्र में एसोचेम ने कहा है कि अगले 12 से 18 महीने में भारत की अर्थव्यवस्था में 200 अरब डॉलर डालने की जरूरत है, जो 300 बिलियन डॉलर तक हो सकता है। इसमें कहा गया है कि अगले 3 महीने में व्यवस्था में 50 से 100 अरब डॉलर (3.8 से 7.6 लाख करोड़ रुपये) नकदी डाले जाने की जरूरत है, जिससे नौकरियां जाने के नुकसान को रोका जा सके।

पीएचडीसीसीआई के अध्यक्ष डीके अग्रवाल ने कहा, 'सरकार ने पहले ही 2 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज दिया है। हमें उम्मीद है कि भारत के कारोबार व उद्योग के लाभ और विभिन्न राहत कदमों के तहत सरकार शेष 9 लाख करोड़ रुपये का पैकेज और जारी करेगी।'

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