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आखिरी मौका ही रहे 'विवाद से विश्वास'

मुकेश बुटानी एवं तरुण जैन /  April 09, 2020

विपक्ष की आपत्तियों के बावजूद प्रत्यक्ष कर 'विवाद से विश्वास'  विधेयक (योजना) को हाल ही में संसद में पारित कर दिया गया। कई लोगों ने इस विधेयक के पारित होने पर खेद जताते हुए कहा कि यह ईमानदार करदाताओं के साथ अन्यायपूर्ण मोलभाव करता है क्योंकि नैतिक मानदंडों से विकृत माने जाने वाले आचरण में लिप्त लोगों को यह रियायत देता है।

इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ ही इस कानून के साथ संवैधानिकता की परिकल्पना संलग्न हो गई है। अब करदाता लंबित कर मामलों के संदर्भ में लागत-मुफीद विश्लेषण करेंगे, मुकदमों को बंद करने के लिए विवरण जमा करेंगे और इन विवादों पर अदालती कार्यवाही जारी रखने की संभावना भी खत्म कर देंगे।

विवाद से विश्वास योजना को 2019 में अप्रत्यक्ष कर मामलों के लिए लाई गई ऐसी ही समाधान योजना की तार्किक परिणति के तौर पर देखा जा रहा है। पिछली योजना के तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपये के कर विवादों का निपटारा किया गया था। मुकदमों को बंद करने के एक तात्कालिक उपाय के तौर पर यह तदर्थ कर विवाद समाधान योजना करदाताओं का नजरिया पेश करने की बात करती थी। इस संपर्क-सेतु को जोडऩे की जरूरत है और नई योजना से संबद्ध नैतिक सवालों से दूर रहने की भी जरूरत है। अप्रत्यक्ष करों के लिए लाई गई योजना में 30 फीसदी बकाया कर का भुगतान कर विवाद खत्म करने का प्रावधान था लेकिन विवाद से विश्वास योजना में समूची कर राशि के भुगतान (राजस्व विभाग की दाखिल अपील के मामले में यह 50 फीसदी भुगतान की बात करता है) की जरूरत है जो इस योजना को किसी तरह की 'माफी' योजना साबित करने के लिए नाकाफी है। चर्चा के लिए वाजिब कर कटौती के लिए नाकाम होने पर व्यय की अस्वीकृति से संबंधित मामले को ही लेते हैं। ऐसे मामलों में यह संभव है कि कमाई वाले करदाता ने समूची आय पर कर का भुगतान कर दिया है और इस तरह सरकार को राजस्व की कोई क्षति न हुई हो। इसके बावजूद, ऐसे मामलों में भी अस्वीकृति को लागू किया जाता है और चूककर्ता कटौतीकर्ता पर जुर्माना लगाने की कार्रवाई शुरू की जाती है। जिन मामलों में कर कटौती करने वाले समूची कर राशि देने के लिए आगे आते हैं उनमें इसे किसी भी तरह से माफी योजना नहीं बताया जा सकता है।

इस निरर्थक कवायद में किसी को वह बड़ी तस्वीर नहीं भूलनी चाहिए कि यह योजना एक पहेली का एक हिस्सा भर है। पिछले दशक में सरकार ने कर संबंधी मुकदमों की 'बुराई' पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए हैं। एक समग्र राष्ट्रीय मुकदमा नीति को आकार देना ऐसा ही एक कदम था जिसने मुकदमा दायर करने की सोच पर लगाम लगाने की कोशिश की है। इसी तरह राजस्व अपीलों के लिए क्रमिक रूप से मौद्रिक सीमाएं भी बढ़ा दी गई हैं। कई मामलों में प्रतिकूल फैसले आने पर भी राजस्व विभाग ने आगे और अपील न करने के संकल्प के मद्देनजर उन्हें स्वीकार कर लिया। मसलन, जनवरी 2015 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बंबई उच्च न्यायालय के उस फैसले पर मुहर लगा दी थी जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) के साथ जारी कीमत संबंधी विवादों को खत्म करने की बात कही गई थी। इस तरह के सुधारात्मक कदमों के बारे में पहले नहीं सुना गया था। इनके बावजूद कर-मुकदमे लगातार बढ़ रहे हैं। वित्त मंत्री ने कहा भी है कि विवाद से विश्वास योजना 'उत्पीडऩ' करने वाले मुकदमों को बंद करने का एक और तरीका है।

नवाचारी उपायों के साथ समाधान की भावना को बनाए रखने की सख्त जरूरत है। अगले कदम के तौर पर प्रत्यक्ष कर संहिता पर गठित विशेषज्ञ समिति के सुझावों, खासकर कर-विवादों में मध्यस्थता की पहल, को राजकोषीय कानूनों में जगह दी जानी चाहिए। इसके अलावा वैकल्पिक विवाद निपटान संस्थानों- मसलन, अग्रिम निर्णय प्राधिकरण और विवाद समाधान पैनल में उत्साह का संचार करने के लिए शिद्दत से कोशिश करना आज के वक्त की जरूरत है। नीतियों का खाका तैयार करने वालों को लंबित विवादों की समीक्षा कर उन मामलों अलग करना होगा जिनमें सबसे ज्यादा मुकदमेबाजी देखी जाती है। ऐसा करने पर कानूनी संशोधनों या प्रक्रियागत रियायतों के जरिये बुद्धिमान मुद्दा-आधारित समाधान निकलकर सामने आ पाएंगे।

हालांकि मनोदशा में बदलाव की जरूरत सबसे बड़ी है। सभी तरह के आदेशों के खिलाफ अपील दायर करने की नियमित कवायद पर रोक लगाने की जरूरत है। सरकार को एक नई समीक्षा व्यवस्था शुरू करने की जरूरत है जो निर्णय तक पहुंचने के लिए राजस्व विभाग के फील्ड-ऑफिसरों के अहम पर आधारित न हो और यह सुनिश्चित करे कि केवल कानून के बारे में ठोस सवालों से संबंधित विवादों को ही अदालत तक ले जाया जाए। शायद अपील दायर करने का फैसला लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक तौर पर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) फिल्टरिंग प्रणाली की तरह एक आंतरिक समीक्षा बोर्ड का गठन कर सकता है जो उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय में दायर की जाने वाली अपीलों के बारे में फैसला लेने के लिए जिम्मेदार होगा। बोर्ड के स्तर पर एक अकेली संस्था बढ़ते विवादों को सीमित करने के अलावा करदाताओं के बीच सामंजस्य रखने, अपील प्रस्तावों के बारे में रुझानों के बदलाव और एक समीक्षा मशीनरी के तौर पर काम करेगी। सामान्य वंचना-रोधी नियम (जीएएआर) के बारे में गठित अनुमति पैनल से इसकी साम्यता देखी जा सकती है लेकिन यह भी स्पष्ट है कि ऐसे सशक्त पैनलों की मौजूदगी कर अधिकारियों को नियमित आदेश जारी करने के बजाय सजगता से काम करने के लिए बाध्य करती है।

सरकार ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह आश्वासन दिया था कि वह 1997 में लाई गई स्वैच्छिक आय घोषणा योजना (वीडीआईएस) को औचित्य के आधार पर निरस्त करने से हुए सार्वजनिक अपमान से बचने के लिए भविष्य में ऐसी कोई भी योजना नहीं लेकर आएगी। विवाद से विश्वास योजना को इस तरह की आखिरी योजना ही रखा जाए और कर संबंधी विवादों के समाधान के लिए नवाचारी समाधान तलाशे जाएं। इस योजना से संबंधित सवालों के जवाब देने और इसके लाभों को 30 जून तक बढ़ाने में सीबीडीटी ने जिस तरह की तेजी दिखाई है उससे यह योजना करदाताओं के लिए शानदार मौका है।

(लेखक बीएमआर लीगल फर्म के साझेदार हैं)

Keyword: विवाद से विश्वास, कर विवाद, विधेयक, करदाता, मुकदमा, राजस्व विभाग,
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