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गरीबी की चपेट में आएंगे 40 करोड़ : आईएलओ

सोमेश झा /  April 08, 2020

कोविड-19 वायरस को नियंत्रित करने के लिए देश भर में लगाए गए कड़े लॉकडाउन के कारण करीब 40 करोड़ भारतीयों के गरीबी की चपेट में आने का जोखिम है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने हाल में जारी रिपोर्ट में ऐसा कहा है।

आईएलओ ने कोविड-19 और कार्य की दुनिया पर अपनी रिपोर्ट में कहा, 'भारत, नाइजीरिया और ब्राजील में लॉकडाउन और संक्रमण की रोकथाम के अन्य उपायों से असंगठित अर्थव्यवस्था में बड़ी तादाद में कामगार प्रभावित होंगे। भारत में करीब 90 फीसदी लोग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं। ऐसे में करीब 40 करोड़ कामगारों के गरीबी की चपेट में आने का जोखिम है।'

संगठन ने कहा कि यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफर्ड के सूचकांक में भारत के मौजूदा लॉकडाउन के उपाय ऊपरी छोर पर रहे हैं। इससे असंगठित क्षेत्र के कामगार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और बहुत से कामगारों को ग्रामीण क्षेत्रों में वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

दरअसल आईएलओ ने यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफर्ड के सूचकांक का इस्तेमाल करके एक चार्ट बनाया है। इसमें दिखाया गया है कि भारत ने अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान और ब्राजील एवं चीन जैसे अन्य देशों की तुलना में ज्यादा असंगठित कामगारों को लॉकडाउन में जकड़ा है।

आईएलओ ने कहा है कि लॉकडाउन और उससे संबंधित कारोबारी अवरोधों का कामगारों पर अचानक भारी असर पड़ा है। संगठन का अनुमान है कि इस महामारी से दुनिया भर में 19.5 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियां जाने के आसार हैं। इसने कहा कि आवास एवं खाद्य सेवा, विनिर्माण, रियल एस्टेट, थोक एवं खुदरा कारोबार, वाहन मरम्मत जैसे क्षेत्रों को सबसे अधिक जोखिम में माना जा रहा है।

आईएलओ के मुताबिक दुनिया भर में करीब दो अरब लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इन लोगों में से अधिकतर उभरते और विकासशील देशों में हैं। इस अनुमान के मुताबिक भारत का दुनिया भर के असंगठित कामगारों में करीब 20 फीसदी हिस्सा है।  नियमित रूप से रोजगार सर्वेक्षण करने वाली निजी एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी ने कहा कि 5 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में बेरोजगारी की दर 23.4 फीसदी पर पहुंच गई।

भारत में लॉकडाउन से उल्टा प्रवास हुआ है। कामगार उद्योगों के बंद होने, स्वास्थ्य की चिंताओं और घर का किराया देने एवं अन्य जरूरतें पूरी करने में असमर्थ होने के कारण शहर छोड़कर गांव जा रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पांच से छह लाख कामगारों को पैदल घर जाना पड़ा क्योंकि उनके लिए परिवहन का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। लाखों श्रमिक अब भी विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए रैन बसेरों में रह रहे हैं।

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