बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोनावायरस के समय में कारोबारी सामाजिक दायित्व
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कोरोनावायरस के समय में कारोबारी सामाजिक दायित्व

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  April 08, 2020

कारोबारी जगत भले ही मजबूरी में निष्क्रिय पड़ा हो लेकिन उसका प्रचार तंत्र उतना ही सक्रिय नजर आ रहा है जितना कि कोरोनावायरस। उसकी सक्रियता की वजह है सरकार का वह निर्णय जिसके तहत उसने कोविड-19 से जुड़े व्यय को कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) गतिविधि के अधीन लाने की अनुमति दी है। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) को दिए गए दान को सीएसआर व्यय माना जाएगा। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कंपनियों को एक ज्यादा बेहतर विकल्प दिया। यह था प्राइम मिनिस्टर्स असिस्टेंस ऐंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशंस यानी पीएम-केयर्स। देशव्यापी बंदी के दौरान प्रवासी श्रमिकों को लेकर सरकार की नीति में गंभीर खामी के प्रायश्चित स्वरूप बनाए गए फंड की निंदा नहीं की जा सकती। यह ताली और थाली बजाने जैसी घटनाओं से तो बहुत बेहतर है।

प्रधानमंत्री मोदी की पहल से शुरू पीएम-केयर्स को एक अध्यादेश के जरिये प्रभावी बनाया गया। यह सन 1948 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित पीएमएनआरएफ से कई मायनों में बेहतर है। पहली बात तो यह कि ये पीएमएनआरएफ की तरह दान पर कर राहत देता है लेकिन इसमें उसकी तरह दानदाता की सकल आय के 10 फीसदी की सीमा नहीं है। दूसरा, कंपनियां जून के अंत तक इस फंड में राशि डाल सकती हैं और वित्त वर्ष 2020 के कर रिटर्न में राहत मांग सकती हैं। तीसरा, पीएम-केयर्स को दिया जाने वाला दान कंपनियों को गत वर्ष सितंबर में घोषित रियायती कम कॉर्पोरेट कर दर का लाभ लेने से नहीं रोकता। यह रियायती लाभ उन कंपनियों के लिए घोषित किया गया था जो अन्य कोई कर राहत नहीं प्राप्त करतीं।

गत वर्ष जुलाई में कंपनी अधिनियम में पुरातनपंथी बदलावों के बाद ये घोषणाएं कंपनियों को बहुत राहत प्रदान करने वाली हैं। उन बदलावों के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा अद्र्ध बाध्यकारी बनाए गए 'भुगतान करो या स्पष्ट करो' को राजग सरकार ने पूरी तरह अनिवार्य कर दिया था। इन संशोधनों के अधीन अनुपालन न करने वाली कंपनियों पर 50,000 रुपये से 25 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने की बात कही गई। इतना ही नहीं अधिकारियों को तीन वर्ष तक की जेल भी हो सकती है।

नियमों के मुताबिक कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्ष के औसत लाभ का 2 फीसदी हर वर्ष विशिष्ट सीएसआर गतिविधियों पर व्यय करना होता है। 1,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक के टर्नओवर या 500 करोड़ रुपये या उससे अधिक की शुद्ध संपत्ति या पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक के मुनाफे वाली कंपनियों को अनुपालन के लिए तीन वर्ष का समय दिया गया है अथवा यह राशि सरकार द्वारा तय विशिष्ट फंड में चली जाएगी। वित्त मंत्री ने भले ही महात्मा गांधी के मुनाफे की सच्चाई और सामाजिक जवाबदेही का जिक्र किया हो लेकिन उक्त संशोधन प्रताडऩा के माहौल में इजाफा करने वाला है जो कारोबारियों को देश से बाहर जाने के लिए प्रेरित कर रहा है। पीएम-केयर्स ने विभिन्न कंपनियों के सीईओ की सीएसआर की समस्या के लिए रामबाण औषधि प्रदान की है। आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री की घोषणा के तत्काल बाद कंपनियों के जनसंपर्क संभालने वाली टीमों ने अपनी कंपनी की कोविड-19 कार्य योजनाओं का ब्योरा पेश करना शुरू कर दिया। इसके बाद प्रेस विज्ञप्तियों की बाढ़ आ गई। खबरें आने लगीं कि देश का कारोबारी जगत पीएम-केयर्स फंड में लाखों करोड़ों रुपये का दान कर रहा है, ठीक बॉलीवुड सितारों की तरह।

अगर पीएम-केयर्स इस राशि को समझदारीपूर्वक व्यय करता है तो यह दान बहुत अच्छा कदम है, भले ही इसकी प्रेरणा कहीं से भी आई हो। उदाहरण के लिए यदि इसका इस्तेमाल देशव्यापी स्तर पर आवश्यक कोविड-19 टेस्ट को सब्सिडी देकर सस्ता बनाने में किया जाता है तो इसे पैसे का सदुपयोग माना जाएगा। परंतु दो संदेह बरकरार हैं। पहला, यह सवाल उठा है कि जब आपदा राहत की फंडिंग के लिए 72 वर्ष पहले एक अलग फंड बनाया जा चुका था तो एक नए विशिष्ट फंड की क्या जरूरत है? इसकी एक कमजोर परिभाषा सरकार की ओर से आई है कि इस फंड का इस्तेमाल केवल कोविड-19 जैसी महामारियोंं से निपटने में किया जाएगा। यह भी कहा गया कि पीएमएनआरएफ की तरह यह व्यक्तिगत योगदान भी स्वीकार करता है।

यदि यह मान भी लिया जाए कि इस विशेष फंड के संभावित लाभ किसी राजनीतिक लक्ष्य पर भारी पड़ते हैं तो भी असहजता का दूसरा बिंदु शासन के इर्दगिर्द केंद्रित है। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष की तरह पीएम-केयर्स भी एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट है। लेकिन पीएमएनआरएफ का संचालन जहां प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरशाह करते हैं वहीं पीएम-केयर्स के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं तथा उसके सदस्य रक्षा, गृह और वित्त मंत्री हैं। राजनीतिक लोगों द्वारा इसका प्रबंधन परेशान करने वाला है। इससे यह संकेत मिलता है कि सीएसआर और सरकार के बीच एक जटिल रिश्ता तैयार हो रहा है जिसमें निगरानी की समस्या सामने आ सकती है। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पीएम-केयर्स की गतिविधियां भी पीएमएनआरएफ की तरह सार्वजनिक निगरानी में रहेंगी या नहीं? यदि सरकार कोविड-19 से लड़ाई में कारोबारी जगत का सार्थक सहयोग लेने को लेकर गंभीर थी तो वह केवल पैसे से इतर उन्हें विशिष्ट गतिविधियों में शामिल कर सकती थी जहां लाभ अधिक टिकाऊ होते। उदाहरण के लिए कुछ निजी कंपनियों और सरकारी बैंकों ने अपने सीएसआर प्रशासन को राज्य सरकारों द्वारा प्रवासियों को ठिकाना देने और पृथक्करण केंद्र बनाने की गतिविधियों में शामिल किया है। इसके अलावा बीमारी के प्रसार वाले नए इलाकों में चिकित्सा उपकरण और सुविधाएं मुहैया कराना भी कॉर्पोरेट जगत के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होता।

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