बिजनेस स्टैंडर्ड - कोविड-19 के द्वितीयक प्रभाव अधिक कष्टकारी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, May 29, 2020 09:49 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कोविड-19 के द्वितीयक प्रभाव अधिक कष्टकारी

देवाशिष बसु /  April 08, 2020

देश भर में 21 दिनों की पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) जारी रहने के बीच मुझे ऐसा लगता है कि हम इस खुशनुमा उम्मीद में जी रहे हैं कि लॉकडाउन की अवधि खत्म होने के बाद हम कोरोनावायरस के प्रसार को नाटकीय रूप से धीमा कर पाएंगे और लॉकडाउन खत्म होने के साथ ही हालात फिर से पटरी पर लौट आएंगे। यह खुशनुमा परिदृश्य अमेरिका और भारत जैसी कई अर्थव्यवस्थाओं में महामारी से उपजे दुष्प्रभावों को कम करने के लिए घोषित राहत पैकेजों के साथ मिलकर व्यापक स्तर पर होने वाले वैश्विक गतिरोध को कम कर सकेंगे। बाजारों को भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें हैं और राहत पैकेज की घोषणा के बाद शेयर बाजारों में आई तेजी इसकी बानगी है। वैश्विक स्तर पर बाजारों में तेजी का रुख इसी उम्मीद और भरोसे पर टिका हुआ है।

लेकिन अगर यह विश्वास गलत साबित है तो क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमने जिस तरह इस महामारी के आगमन को लेकर उसे कमतर आंका, कहीं हम वैसे ही इससे उबरने में लगने वाले वक्त को कम आंक रहे हैं? मानव जाति बुनियादी तौर पर आशावादी होती है, यह एक ऐसा गुण है जो हमें अपनी सामान्य जिंदगी में काफी मदद करता है। मुश्किल वक्त में हम इसी गुण के सहारे फिर से खड़े होते हैं। हालांकि ऐसा वक्त भी होता है जब संशयग्रस्त होना भी एक गुण होता है और आशावाद का दामन पकड़े रहना सिर्फ बेवकूफी होती है। किसी महामारी की स्थिति में भी ऐसा ही होता है। इसके पीछे सोच आक्रामक के बजाय रक्षात्मक कदम उठाने की है जो उम्मीद पर आधारित हों। लेकिन यह हमारी पहली सहज वृत्ति नहीं है। मसलन, सिर्फ शेयरों के भाव धड़ाम होने की वजह से हम यह मानकर चलें कि इस गिरावट की वजह खत्म होते ही शेयर फिर से तेजी पकड़ लेंगे। यह शेयरों की खरीद का मौका है क्योंकि 'सामान्य' वक्त में शेयर बाजार में गिरावट का दौर आम तौर पर खरीदारी का वक्त होता है, न कि किनारे बैठ जाने और चिंतित होने का। लेकिन किसी ने कहा है कि शेयर बाजार में आपको नियमों का पालन करना चाहिए और इसी के साथ यह भी पता होना चाहिए कि कब इन नियमों का पालन नहीं करना है।

मैंने 1992 में हर्षद मेहता घोटाले के बाद से अब तक के हरेक शेयर बाजार क्रैश को करीब से देखा है। हरेक क्रैश के कारण अलग रहे थे लेकिन उन सबमें एक बात आम थी: पहली बड़ी गिरावट समस्या के पूर्ण प्रभाव को नहीं दर्शा पाती थी। आज भी निवेशक सदमे और तनाव में हैं लेकिन आशावादी बने हुए हैं। इस क्रैश के पहले निवेशक शेयरों के जिस ऊंचे भाव के अभ्यस्त थे वह अब भी उनके दिमाग पर हावी है। वे उम्मीद कर रहे हैं कि हालात सामान्य होते ही शेयरों के भाव फिर से चढ़ जाएंगे। इस परिघटना को 'रेसेंसी बायस' यानी 'तात्कालिकता के प्रति झुकाव' कहा जाता है।

आशावाद की ही तरह हम इंसानों में एक और स्वाभाविक गुण होता है: हम केवल अपने कार्यों के तात्कालिक परिणामों यानी फस्र्ट-ऑर्डर प्रभावों को ही देख पाते हैं। फस्र्ट-ऑर्डर प्रभाव सरल होते हैं और कारण एवं उसके प्रभावों के बीच संबंध दृश्यमान होते हैं। अगर कोविड-19 महामारी के संदर्भ में देखें तो तीन हफ्तों के लॉकडाउन से इस वायरस का प्रसार धीमा हो पाना फस्र्ट-ऑर्डर प्रभाव है। लेकिन किसी महामारी या वित्तीय उथल-पुथल जैसे जटिल हालात में द्वितीयक एवं तृतीयक प्रभाव कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं और वे बाद में सामने आते हैं। लेकिन हम उनका पूर्वानुमान लगाने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। एकदम इसी वजह से निवेशक मौजूदा बाजार क्रैश में पहली बड़ी गिरावट के बाद भी आशावादी बने रहे। यह 1992 में भी हुआ था जब अगस्त और सितंबर के बीच शेयर बाजार तेजी पकडऩे के बाद फिर से धराशायी हो गए थे। वर्ष 2000 में मई और जुलाई के बीच शेयर बाजार में गिरावट के पहले खूब तेजी रही थी। वर्ष 2008 में भी मार्च और मई के बीच शेयरों के भाव चढऩे के बाद औंधे मुंह गिरे थे।

इन सभी मामलों में निवेशकों ने द्वितीयक एवं तृतीयक प्रभावों को नजरअंदाज किया था। वैसे मैं इस समय यह अनुमान नहीं लगाने जा रहा कि बाजार किस दिशा में जाएंगे। मेरा सिर्फ यह कहना है कि हम इस बार भी महामारी के द्वितीयक एवं तृतीयक प्रभावों को ध्यान में नहीं रख रहे हैं। अगर हम इन पर गौर नहीं करते हैं तो हम हालात की सच्चाई नहीं देख पाने से निराश ही होंगे। हमने काले धन पर लगाम लगाने के शुरुआती प्रभाव भी नहीं पैदा कर पाई नोटबंदी के बाद ऐसे प्रभावों के बारे में देखा है। इन प्रभावों ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर डाला और द्वितीयक प्रभाव के तौर पर आय एवं मांग को खत्म ही कर दिया। हमें नोटबंदी और कुछ दूसरे नीतिगत गलतियों की भारी कीमत आर्थिक वृद्धि में 2.5 फीसदी की भारी गिरावट के तौर पर चुकानी पड़ी है।

सवाल है कि कोरोनावायरस से पैदा हुई महामारी के मामले में ये प्रभाव किस तरह के होंगे? यह वायरस के बारे में नहीं बल्कि इसके खात्मे के लिए छेड़ी गई जंग के आर्थिक प्रभावों के बारे में है। लॉकडाउन की घोषणा होते ही मजदूरों का बड़ी संख्या में शहरों को छोड़कर अपने गांवों की तरफ लौटना एक ऐसा द्वितीयक प्रभाव है जिसके बारे में मोदी सरकार ने न तो सोचा था और ही उसके लिए तैयार थी। मुझे आशंका है कि हमें लंबे समय तक मांग एवं आपूर्ति का झटका देखने को मिलता रहेगा। अभी हम यह अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि इसका स्वरूप कैसा होगा? स्वास्थ्य देखभाल एवं खानपान से संबंधित क्षेत्रों के अलावा लगभग हरेक क्षेत्र के इस आकस्मिक वैश्विक संकुचन से बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। हमने अपने जीवन में ऐसा कुछ नहीं देखा है और हमें नहीं पता है कि प्रभावों की शृंखला कहां तक जा सकती है। अंग्रेजी के 'वी' आकार वाली आर्थिक बहाली को लेकर संदेह होने की यह सबसे बड़ी वजह है।

सबसे बुरी बात यह है कि हम अब भी सरकार की तरफ मुंह देख रहे हैं कि वह कुछ कदम उठाकर हालात सुधार देगी। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कोविड-19 महामारी का प्रकोप फैलने के पहले ही हमारे सामने एक ऐसी सरकार थी जिसे आर्थिक वृद्धि में लगातार आ रही गिरावट को रोकने के लिए कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मैंने कई बार यह कहा है कि इस सरकार ने पिछली सरकारों जैसे तरीके ही आजमाए हैं और उसके साथ एक नया खराब पहलू भी जोड़ा है: अर्थव्यवस्था के दो सर्वाधिक उत्पादक वर्गों- कारोबार एवं परिवार के लिए लगातार नई-नई सामाजिक चिंताएं पैदा करते रहना। हमें यह ध्यान रखना होगा कि कारोबार ही रोजगार पैदा करते हैं एवं करों का भुगतान करते हैं और मांग बनाए रखने के अलावा करों के भुगतान में परिवारों की भूमिका काफी अहम होती है। जब यह सरकार आर्थिक पतन के परिचित हालात में दंभी, उदासीन एवं नासमझ बनी रही है तो एक महामारी के द्वितीयक एवं तृतीयक प्रभावों को लेकर इसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? हमने अभी तक का इसका रुख देखा है और यह बेहद खराब रहा है। खुद को बड़े, अप्रिय अचरजों के लिए तैयार रखिए और खुशकिस्मती से मिलने वाले राहत की उम्मीद कीजिए। हो सकता है कि यह सफर लंबा और उबड़-खाबड़ हो।

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, Virus, Flu, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वोडा-आइडिया में गूगल के निवेश से अन्य निवेशक भी होंगे आकर्षित?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.