बिजनेस स्टैंडर्ड - दवा निर्यात में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का हिस्सा मामूली
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दवा निर्यात में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का हिस्सा मामूली

सोहिनी दास / मुंबई April 07, 2020

भारत हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू) का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। वित्त वर्ष 19 में देश से 5.1 करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ था। देश के कुल 19 अरब डॉलर के दवा निर्यात में इसका हिस्सा बहुत मामूली है।

बहरहाल वित्त वर्ष 2020 में फरवरी तक के आंकड़ों के मुताबिक दवा का निर्यात 3.6 करोड़ डॉलर कम रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप एचसीक्यू की हिमायत कर रहे हैं, ऐसे में अचानक इस दवा की वैश्विक मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। ब्राजील और भारत के सार्क पड़ोसी देशों ने भारत से दवा की मांग की है।

केंद्र ने खुद ही आईपीसीए लैबोरेटरीज और कैडिला हेल्थकेयर से 10 करोड़ टैबलेट की जरूरत बताई है। विनिर्माताओं का कहना है कि भारत के बाजारों में पर्याप्त स्टॉक है और अतिरिक्त दवाओं का निर्यात किया जा सकता है। वे सरकार को इस महीने में इसकी आपूर्ति की कवायद कर रहे हैं।

उन्होंंने कहा कि चीन एचसीक्यू नहीं बनाता और भारत ही विश्व का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। एचसीक्यू और क्लोरोक्वीन फॉस्फेट एक ही वर्ग की दवाएं हैं।

क्लोरोक्वीन का इस्तेमाल मलेरिया के मरीजों के उपचार के लिए होता है। वहीं दूसरी तरफ एचसीक्यू का इस्तेमाल ऑटो इम्यून डिसऑर्डर जैसे आर्थराइटिस, लूपस और मधुमेह की तीसरी श्रेणी के उपचार के लिए होता है। कुछ स्वास्थ्य शोधाथी एचसीक्यू का सामान्य एंटीबायोटिक्स एजीथ्रोमाइसिन के साथ इस्तेमाल कर कोविड-19 का उपचार करने की कवायद कर रहे हैं।

सरकार ने एक परामर्श में एचसीक्यू का इस्तेमाल स्वास्थ्य कर्मियों और ज्यादा जोखिम वाले लोगोंं को करने की सलाह दी है, जिससे उन्हें संक्रमण से बचाया जा सके।

इस दवा का इस्तेमाल कोविड-19 के मरीजों के लिए भी हो रहा है। विशेषज्ञों ने इसके व्यापक इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी है, जब तक कि क्लीनिकल ट्रायल के बाद यह दवा संदेह से परे नहीं हो जाती है।

अमेरिकी एफडीए ने 19 मार्च की विज्ञप्ति में कहा है कि वह अन्य सरकारी एजेंसियों व अध्ययन केंद्रों के साथ मिलकर क्लोरोक्वीन के इस्तेमाल की जांच कर रहा है कि इसका कोविड-19 के उपचार में इस्तेमाल हो सकता है या नहीं।

भारत में एचसीक्यू की बिक्री तेज हो गई है। मार्केट रिसर्च फर्म एआईओसीडी एडब्ल्यूएसीएस के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में एचसीक्यू की बिक्री में 19 प्रतिशत की तेजी आई है। इसकी वजह यह है कि अचानक चर्चा में आने की वजह से तमाम भारतीय इसे खरीदकर रख रहे हैं, जिसकी कीमत बमुश्किल 3 रुपये प्रति टैबलेट है।

बहरहाल अब सवाल यह उठता है कि क्या यह पर्याप्त मात्रा में है? प्रमुख विनिर्माताओं ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि स्थानीय आपूर्ति को लेकर चिंता करने की कोई बात नहीं है। भारत जरूरत पडऩे पर हर महीने 100 टन दवा बना सकता है और इसकी क्षमता आसानी से बढ़ाई जा सकती है।

इस दवा की प्रमुख उत्पादक आईपीसीए है और यूएस एफडीए ने हाल में उसके संयंत्र से आयात अलर्ट हटा दिया है, जिससे वह अमेरिका को निर्यात कर सकती है। कैडिला पहले से ही अमेरिका को निर्यात कर रही है, हालांकि मात्रा बहुत ज्यादा नहीं है।

भारत में मामले लगातार बढ़ रहे हैं। एक विनिर्माता ने साफ किया, 'एक मरीज को 14 टैबलेट देने की जरूरत होती है। 10 करोड़ टैबलेट से भारत 7 करोड़ लोगों का इलाज कर सकता है। अगर मामले बढ़कर एक महीने में 1,00,000 तक पहुंच जाते हैं और हर मरीज को 3 स्वास्थ्यकर्मी की जरूरत हो, तब भी देश में पर्याप्त स्टॉक है।'

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