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भारतीय इसी अव्यवस्था के हकदार हैं?

जैमिनी भगवती /  April 07, 2020

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं- अमेरिका, यूरोप और चीन में कोरोनावायरस के कारण हुई आंशिक या पूर्ण बंदी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा लोगों की आवाजाही पर लगी सख्त पाबंदी और सामाजिक दूरी बनाए रखने की मजबूरी ने भारत पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 24 मार्च को ऐलान किया कि अगले 21 दिन तक देश भर में पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) रहेगी। कोरोनावायरस पर काबू पाने का कोई चिकित्सकीय इलाज नहीं खोजे जाने तक आशंका इसी बात की है कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वास्तविक संदर्भों में पांच फीसदी तक या उससे भी नीचे आ जाएगा। इसके पीछे की सोच यह है कि भारत को मौजूदा लॉकडाउन की वजह से कम-से-कम एक महीने का आर्थिक आउटपुट गंवाना पड़ेगा।

इस वायरस के असर से पैदा हुए आर्थिक उदासी के माहौल में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारतीय इक्विटी एवं डेट में अपने निवेश को कम कर दिया है। वित्त वर्ष 2019-20 में दिसंबर 2019 के अंत में शुद्ध इक्विटी एवं डेट प्रवाह क्रमश: 7.7 अरब डॉलर और तीन अरब डॉलर था। वहीं 20 मार्च, 2020 तक शुद्ध इक्विटी आवक 3.5 अरब डॉलर तक कम हो चुकी थी जबकि भारी विदेशी निकासी होने से शुद्ध डेट प्रवाह ऋणात्मक 4.2 अरब डॉलर हो चुका था। लिहाजा पिछले तीन महीनों में भारत से शुद्ध एफआईआई पूंजी निकासी करीब 11.4 अरब डॉलर रही। यह काफी हद तक 2008-09 और अगस्त-सितंबर 2013 की पुरानी कहानी का दोहराव है जब विदेशी पूंजी आर्थिक अनिश्चितता की हालत में डॉलर-प्रभुत्व वाले साधनों में एक सुरक्षित पनाहगाह की तलाश में लगी हुई थी।

साफ है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के स्तर पर सार्वजनिक व्यय को उस स्तर तक बढ़ाना होगा कि भारतीयों, खासकर दैनिक कामगारों की आय में आने वाली तीव्र गिरावट से निपटा जा सके। फंडिंग समर्थन की प्रकृति एवं मात्रा सरकार और पीडि़तों के दुखों को लेकर सजग स्वतंत्र विशेषज्ञों के बीच गहन परामर्श पर आधारित होनी चाहिए। उम्मीद है कि वित्त मंत्री ने 26 मार्च को 1.7 लाख करोड़ रुपये का जो राहत पैकेज घोषित किया है वह व्यापक चर्चा के बाद ही लाया गया है। इसमें बैंकिंग, कृषि, परिवहन एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय जरूर ली गई होगी।

इसके बावजूद पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि भारतीय मुद्रा रुपया का मूल्य काफी ऊंचा बना हुआ है। गत 16 मार्च को आरबीआई ने दो अरब डॉलर की बिक्री कर रुपये को समर्थन देने की कोशिश की थी जिसमें छह महीनों के भीतर डॉलर की पुनर्खरीद का प्रावधान भी था। ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतों के 27 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क जाने के बाद यह माकूल समय है कि अगले 12 महीनों में रुपया प्रति डॉलर 85 रुपये या उससे भी नीचे तक जा सके।

मौजूदा वृहद-आर्थिक अनिश्चितताओं और एक महीने में भारतीय इक्विटी सूचकांकों के करीब 35 फीसदी लुढ़क जाने के बीच येस बैंक के संस्थापक एवं पूर्व सीईओ राणा कपूर से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ की घटना जल्द ही भुलाई जा सकती है। यह बात अपने आप में अनूठी है कि येस बैंक ने कपूर के पारिवारिक सदस्यों के स्वामित्व वाली 103 कंपनियों को खुले हाथ से कर्ज बांटे। अनिल अंबानी की कंपनियों को भी इस बैंक से 12,800 करोड़ रुपये के कर्ज दिए जाने की खबरें हैं। गत 19 मार्च को निदेशालय ने येस बैंक से मिले कर्जों के एवज में कपूर को कमीशन दिए जाने की आशंका की पड़ताल के लिए अनिल अंबानी से भी पूछताछ की है।

लोगों की याद्दाश्त बड़ी छोटी होती है और वित्तीय धांधलियों एवं घोटालों के संदर्भ में तो यह बात खास तौर पर सही है। मसलन, सार्वजनिक बैंकों के पिछले पांच साल में हुए पुनर्पूंजीकरण का करदाताओं पर करीब 4 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ा है। भारत में बेहतर ढंग से संचालित हो रहे निजी बैंक मसलन एचडीएफसी बैंक का बहुलांश स्वामित्व विदेशी कंपनियों का है, वे पूंजी पर ऊंचा प्रतिफल हासिल करते हैं और बांटे गए कर्जों के प्रतिशत के तौर पर उनकी शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां कम हैं। फिर भी इस परिदृश्य पर विचार करना होगा कि भारत में कुल जमाओं का 90 फीसदी अगर निजी बैंकों के पास रहता है तो कैसे हालात बन सकते हैं? फिलहाल यह अनुपात महज 40 फीसदी है।

येस बैंक के मामले में भी हमने देखा कि जैसे ही किसी बैंक की हालत खस्ता होती है तो जमाकर्ताओं समेत हर तरफ से राहत पैकेज दिए जाने की चर्चाएं जोर पकडऩे लगती हैं। अगर बैंकों के प्रति जमाकर्ताओं का भरोसा तेजी से कम होता है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बैंक सार्वजनिक क्षेत्र का है या निजी।

ऐसे हालात में करदाताओं को एकमुश्त अनुदान के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस धारणा की पुष्टि करते हैं। इनमें जी-7 देशों में उपजे 2008 के वित्तीय संकट के बाद उठाए गए कदम भी शामिल हैं। 24 मार्च, 2020 को अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने यह घोषणा की है कि वह तमाम सरकारी, गिरवी रखी गई एवं कॉर्पोरेट ऋण प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए एक बार फिर तैयार है। इसका आकार 2008-09 में फेड रिजर्व की तरफ से वित्तीय प्रणाली में झोंके गए 4 लाख करोड़ डॉलर से भी अधिक हो सकता है। इसके अगले दिन अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट ने ट्रंप सरकार की तरफ से घोषित 2 लाख करोड़ डॉलर के राहत पैकेज को भी मंजूरी दे दी।

भारत में राजनीतिक कुकृत्यों के अलावा वरिष्ठ लोकसेवकों की मौन स्वीकृति के चलते हमारे सार्वजनिक बैंक दोस्ती एवं संपर्कों के आधार पर कर्ज बांटने को मजबूर होते हैं। हम बोर्ड से इतर विशेषज्ञों को वित्तीय संस्थानों एवं नियामकीय संस्थाओं के प्रमुख के तौर पर नियुक्त करने का सरकार को अधिकार देने के लिए हर तरीका अपनाते हैं। भले ही सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो जैसे नियुक्ति पैनलों का गठन किया है लेकिन सरकार का मौजूदा चलताऊ रवैया तब तक नहीं सुधारा जा सकता है जब तक कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए कानून में प्रावधान नहीं किया जाता है।

बहुत समय नहीं हुआ जब ललित मोदी- इंडियन प्रीमियर लीग, विजय माल्या- आईडीएफसी, नीरव मोदी- पंजाब नैशनल बैंक, चंदा कोछड़-आईसीआईसीआई बैंक और रवि पार्थसारथि- आईएलऐंडएफएस जैसे वित्तीय घपलों में शामिल लोगों को भारत में निजी क्षेत्र के चमकते सितारे बताया जाता था। इन मामलों के सामने आने के बाद भी कई साल बीत चुके हैं लेकिन अभी तक सरकार ने खास कार्रवाई नहीं की है। ऐसे में भारतीय वित्तीय क्षेत्र में धोखाधड़ी के लगातार सामने आ रहे मामलों को देखकर आश्चर्य नहीं होता है। ऐसे मामलों में समाचारपत्र हरेक महीने के पहले बुधवार को एक सूची प्रकाशित कर ऐसे गंभीर मामलों में हुई प्रगति का ब्योरा देने वाला एक चार्ट प्रकाशित कर सकते हैं। अगर सरकारी एजेंसियों की तरफ से कोई नई जानकारी नहीं दी गई है तो उस मामले में शून्य प्रगति दिखानी चाहिए।

सार रूप में कहें तो लोग वही सरकार पाते हैं जिसके वे हकदार होते हैं। सरकारें ही आरबीआई एवं सेबी और दूसरे वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों की नियुक्ति करती हैं। हमें खुद को एक ऐसी अवाम के तौर पर पेश करना है जो सार्वजनिक एवं निजी स्वामित्व के बीच के भ्रामक भेद के बजाय अपनी चुनी हुई सरकारों को उनकी नियुक्तियों के लिए जवाबदेह ठहराती है।

(लेखक पूर्व राजदूत एवं विश्व बैंक अधिकारी हैं)

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