बिजनेस स्टैंडर्ड - समझदारी भरे हों नीतिगत हस्तक्षेप
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, October 24, 2020 06:50 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

समझदारी भरे हों नीतिगत हस्तक्षेप

साजिद जेड चिनॉय /  April 06, 2020

हर गुजरते दिन के साथ दो बातें स्पष्ट हो रही हैं। पहली, आक्रामक नियंत्रण उपाय अपनाकर हम कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोक सकते हैं। बड़ी आबादी के लॉकडाउन से निपटने के लिए आय समर्थन जरूरी है, खासकर उभरते बाजारों में जहां सुरक्षा ढांचा अधूरा और खामी भरा है। दूसरा, अचानक आर्थिक गतिवधियां ठप होने का असर अनुमान से ज्यादा भीषण होगा। सन 2020 की पहली दो तिमाहियों में विश्व अर्थव्यवस्था क्रमश: 15 और 7 फीसदी सिकुड़ेगी। यह वैश्विक वित्तीय संकट का दोगुना है। उस लिहाज से देखें तो मंदी की गहराई और उसकी अवधि न केवल इस झटके के आकार पर निर्भर होगी बल्कि इस पर भी कि क्या नीतिगत कदम ऋण और श्रम बाजारों पर असर को न्यूनतम कर सकते हैं।

यही कारण है कि विकसित देशों के नीति निर्माता खासतौर पर प्रोत्साहन पैकेज दे रहे हैं। अमेरिका ने अपने जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर का पैकेज दिया है जो अब तक के इतिहास में सर्वाधिक है। फेडरल रिजर्व व्यापक अर्थव्यवस्था के बचाव के लिए सामने आया है। वह एसएमई को सीधे ऋण दे रहा है और कॉर्पोरेट प्रतिभूति खरीद रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस में जीडीपी के 15 फीसदी के बराबर ऋण गारंटी दी गई है।

विकासशील देशों ने भी इन मुल्कों का अनुसरण किया है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये देश कम आय वाले और कमतर सामाजिक सुरक्षा वाले हैं। लॉकडाउन से जिंदगियां बच सकती हैं लेकिन लोगों की आजीविका बचाने का काम नीतिगत स्तर पर करना होगा। यही कारण है कि इन बाजारों में भी तमाम पैकेज सामने आए।

भारत ने अपनी नीतिगत प्रतिक्रिया हाल ही में घोषित की। सबसे पहले ऐसी घोषणाएं की गईं जो देश के असंगठित और कामगार वर्ग के लोगों को 21 दिन के लॉकडाउन से राहत दिला सकें। बंदी की अवधि और उसके आर्थिक असर को देखते हुए ज्यादा मदद की जरूरत पड़ सकती है।

फेड की तरह आरबीआई ने भी घोषणाएं कीं। पहले उसने रीपो दर 75 आधार अंक कम की लेकिन प्रभावी दर करीब 100 आधार अंक कम हुई। दूसरा, विभिन्न ब्याज और पूंजीगत ऋण को तीन महीने के लिए स्थगित करने की इजाजत दी गई। तीसरा, ऋण विस्तार को देखते हुए आरबीआई बैंकों को टर्म लिक्विडिटी यानी टीएलटीआरओ मुहैया कराएगा ताकि वे निवेश श्रेणी के कॉर्पोरेट बॉन्ड खरीद सकें। ये उपाय प्रोत्साहन के साथ-साथ वित्तीय स्थिरता मुहैया कराएंगे।

परंतु यदि आर्थिक झटका ज्यादा गहरा हुआ तो और अधिक कदम उठाने होंगे। एसएमई को फिलहाल राहत मिल गई है लेकिन राजस्व की कमी और कंपनियों को वेतन भत्ते चुकाने की जरूरत को देखते हुए उनकी कार्यशील पूंजी की आवश्यकता बढ़ सकती है। परंतु चूंकि एसएमई सबसे अधिक जोखिम में हैं इसलिए बैंक शायद उन्हें ऋण देने में अनिच्छुक हों। ऐसे में अस्थायी, आंशिक ऋण गारंटी इन क्षेत्रों में ऋण प्रवाह बरकरार रखेगी। नीति निर्माताओं को भी नीचे तक नकदी मुहैया कराने के मामले में सकारात्मक होना पड़ेगा। कुल मिलाकर कम आय वाले परिवारों को ज्यादा नीतिगत मदद की जरूरत होगी। एसएमई और एनबीएफसी को उन्हें इन झटकों से बचाना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि वित्तीय क्षेत्र में तनाव न बढ़े।

यह सूची बनाना आसान है कि राज्य और क्या कर सकता है या उसे और क्या करना चाहिए। परंतु उभरते बाजारों में जहां राजकोषीय गुंजाइश सीमित है और मुद्रा को सीमित लाभ है, वहां नीतिगत बाधाएं ज्यादा हैं। ऐसे में संकट समाप्त करने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। लेखक जेपी मॉर्गन में चीफ इंडिया इकॉनोमिस्ट हैं। लेख में विचार निजी हैं।

यदि ऐसा नहीं हुआ तो विसंगति बढ़ेगी। 2008 को याद कीजिए। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद वैश्विक मौद्रिक नीति का सामान्यीकरण इतना खोखला था कि प्रतिफल की तलाश में बैंकिंग तंत्र के बाहर भारी भरकम नकदी एकत्रित हो गई। उसके चलते भारी पैमाने पर बिकवाली को बढ़ावा मिला। वित्तीय हालात तंग हुए और संकट को लेकर पेश की गई नीतिगत प्रतिक्रिया आंशिक रूप से निष्प्रभावी साबित हुई। भारत में भी 2008 के बाद का वैश्विक वित्तीय और मौद्रिक प्रोत्साहन शायद उस वक्त आवश्यक रहा हो लेकिन वर्षों बाद उसे वापस लिए जाने ने 2013 में भारत को संकट में डाल दिया था। हमें वे सबक भूलने नहीं चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोविड-19 का संकट श्रम और ऋण बाजार के जरिये बढ़े नहीं। सरकारी हस्तक्षेप ऐसे तैयार किए जाएं कि आम परिवार, छोटे कारोबार और वित्तीय बाजार को इस झटके से उबारा जा सके। इस दौरान किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

आवंटन में किफायत की बात करें तो संभव है कि कुछ छोटे कारोबार, महामारी के बाद के आने वाले दिनों में व्यवहार्य न रह जाएं। इसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी अवसर तैयार किए जाने चाहिए। कुछ रचनात्मक विनाश और संसाधनों का पुनर्आवंटन अपरिहार्य है। नीति ऐसी होनी चाहिए जो संकट के दौरान और उसके तत्काल बाद राहत प्रदान करे। इस दौरान उसे संसाधनों के पुनर्आवंटन में भेदभाव नहीं करना चाहिए। किसी न किसी मोड़ पर ऐसा करना अनिवार्य होगा।

असंतुलन को रोकना भी समान महत्त्व की बात है। विकसित देशों में ब्याज दरें शून्य के आसपास हैं, तो कोविड-19 के कारण वित्तीय घाटा बढऩे पर भी ऋण की स्थिरता खतरे में नहीं पड़ेगी। इसकी शुरुआत कई उभरते बाजारों से एकदम अलग होनी चाहिए। उच्च प्राथमिक घाटे, उच्च ब्याज दर और काफी कम नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के साथ ऋण का स्थायित्व समस्या बन सकती है अगर घाटे में इजाफा होता है। भले ही केंद्रीय बैंक सरकारी बॉन्ड की खरीदारी जारी रखें।

कई उभरते देशों में बिना भेदभाव का राजकोषीय व्यय निजी मांग में ठहराव से हो रहे नुकसान की सतत भरपाई नहीं कर पाएगा। खासतौर पर तब जबकि ये अर्थव्यवस्थाएं तमाम एसएमई के बंद होने से आपूर्ति के नकारात्मक झटके से दो चार हों। नकारात्मक आपूर्ति झटके से निपटने के लिए सकारात्मक मांग भर से काम नहीं चलता।

इन बातों का यह अर्थ नहीं कि मौद्रिक और राजकोषीय नीति को कोविड-19 के आर्थिक झटके से बचाने के लिए प्रयास ही नहीं करना चाहिए। जरूर करना चाहिए। परंतु इतिहास बार-बार बताता है कि नीतिगत प्रोत्साहन डालना, निकासी से ज्यादा आसान है। उभरते बाजारों में नीतिगत हस्तक्षेप समझदारी से आजमाया जाना चाहिए ताकि संकट के दौर में अस्थायी लेकिन गहरा सुरक्षा ढांचा तैयार हो सके और बाद में कोई विसंगति और असंतुलन भी नहीं पैदा हो। मौजूदा माहौल के दबाव में आने वाले दिनों को नहीं भूलना चाहिए।

(लेखक जेपी मॉर्गन में चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट हैं। लेख में विचार निजी हैं।)

Keyword: GDP, Economic, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी, नीतिगत हस्तक्षेप, आबादी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या स्मार्टफोन बाजार में दमदार वापसी कर पाएंगी देसी कंपनियां?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.