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खर्च को लेकर इतनी कंजूसी क्यों दिखा रही है सरकार?

दिलाशा सेठ /  April 05, 2020

बीएस बातचीत

केरल के साथ ही अन्य राज्य केंद्र को उच्चतम न्यायालय में घसीटने की तैयारी कर रहे हैं। इसकी वजह है कि केंद्र उनके 40,000 करोड़ रुपये जीएसटी बकाये के साथ ही  40,000 करोड़ रुपये की लंबित एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर का भुगतान नहीं कर रही है। कोविड-19 के प्रकोप को देखते हुए केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने दिलाशा सेठ के साथ बातचीत में कहा कि यदि केंद्र सरकार उधारी सीमा में जीडीपी के 1 फीसदी का इजाफा नहीं करती है तो राज्य को कठिन वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। पेश हैं मुख्य अंश...


कोरोनावायरस के मुकाबले के लिए आप केंद्र सरकार की तैयारियों पर आपका आकलन क्या है? क्या 1.7 लाख करोड़ की राहत पर्याप्त है?

पेश की गई राहत निराशाजनक है। एक ओर जब केंद्र सरकार ने देशबंदी कर रखी है और अधिकांश लोग अपना रोजगार गंवा बैठे हैं तब उसने उन्हें 500 रुपये प्रति महीने की मामूली पेशकश की है। निस्संदेह राशन मुफ्त और अतिरिक्त दिया जा रहा है लेकिन यदि आप बाकी जगहों पर दिए जा रहे राहत को देखें तो यह पर्याप्त नहीं है। ब्रिटेन स्?वरोजगार कर रहे लोगों और कामगारों को 80 फीसदी वेतन का भुगतान कर रहा है।

केंद्र सरकार को किन क्षेत्रों में आवंटन बढ़ाने की जरूरत है?

सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों को संस्थागत करने का यह सबसे उपयुक्‍त समय है। पहला, असंगठित क्षेत्र के लिए सार्वभौमिक पेंशन योजना शुरू करना अच्छा रहेगा, जो केवल गरीबी रेखा से नीचे के लिए लोगों तक सीमित न हो। 1,000-2,000 रुपये तक की पेंशन योजना शुरू की जानी चाहिए। केरल सरकार 55 लाख लोगों को 1,200 रुपये देती है जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 6.5 लाख रुपये की है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरी में की गई बढ़ोतरी संदेह के घेरे में है क्योंकि इसका लाभ केवल 100 दिनों का रोजगार पाने वाले मजदूर को ही मिलेगा। कोविड के दौरान कोई भी मनरेगा कार्यक्रम नहीं चलेगा। प्रत्येक मरनेगा मजदूर के खातों में पिछले वर्ष के मासिक औसत भुगतान के आधार पर पैसा भेजा जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत किए जाने वाले आवंटन को भी दोगुना किया जाना चाहिए। 

केरल सरकार ने 20,000 करोड़ रुपये के कोविड पैकेज की घोषणा की है। राज्?यकी दबावग्रस्?तवित्तीय स्थिति और केंद्र के पास पड़े बकाया के बीच आप बाजार से कितना उधार लेंगे? केंद्र को राज्यों की कोई परवाह नहीं है। हमें संकट से निकलना होगा। कम से कम उसे जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर जैसे हमारे बकाये का तो भुगतान कर देना चाहिए। उसे राज्यों को जीडीपी की अतिरिक्?त1 फीसदी उधारी लेने की अनुमति देनी चाहिए। हमने अगले वर्ष के लिए 27,000 करोड़ रुपये की उधारी की अनुमति दी है और उसका आधा अग्रिम उधार लेना चाहते हैं और इसे बंदी के दौरान अप्रैल से मई के बीच खर्च करना चाहते हैं।

क्या आपको लगता है कि केंद्र आपकी उधारी सीमा को बढ़ाएगा, क्योंकि 2020-21 में अर्थव्यवस्था में गिरावट आने के आसार हैं? 

हम बड़ा जोखिम लेने जा रहे हैं और इसका आगे गंभीर परिणाम हो सकता है। लेकिन हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इसके अच्छे नतीजे निकलेंगे क्योंकि दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है। राष्ट्रीय आय वित्त वर्ष 2021 में नकारात्?क रहेगी। वैश्विक वृद्धि भी नकारात्मक होने जा रही है। अमेरिका इतना संरक्षणवादी है कि उसने 2 लाख करोड़ डॉलर के पैकेज की घोषणा की है। दूसरे देश भी खर्च रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार खर्च करने में इतना कंजूसी क्यों कर रही है?  मुझे भरोसा है कि केंद्र सरकार परिस्थितियों को देखते हुए अपने रुख में परिवर्तन लाने पर मजबूर हो जाएगी।

बकाया जीएसटी को लेकर आपकी केंद्र से बात कहां तक पहुंची है?
केरल को 3,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। यह केरल जैसे राज्य के लिए बड़ी राशि है। दुर्भाग्य यह है कि मार्च के आखिर तक केंद्र सरकार ने गैर कानूनी तरीके से राज्यों का 40,000 करोड़ रुपये बकाया रोके रखा। उसने एकीकृत जीएसटी को संचित निधि में शामिल कर रखा है। इसमें हमें सिर्फ 42 प्रतिशत दिया गया है, जो बंटवारे से आता है, जबकि आईजीएसटी का 50 प्रतिशत राज्यों को मिलना चाहिए। हमें करीब 40,000 रुपये नुकसान हो रहे हैं। जीएसटी और उपकर का संग्रह भी कठिन हो सकता है। मुआवजा की जरूरतें तेजी से बढ़ेंगी, लेकिन क्या आप उम्मीद करते हैं कि ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार आपको भुगतान करेगी? मार्च में संग्रह खराब रहा। अप्रैल में देशबंदी की वजह से बमुश्किल कुछ होनाा है। ऐसे मेंं केंद्र सरकार को हमें मुआवजा देना चाहिए। वह जीएसटी परिषद को उधारी लेने और भुगतान करने व एक साल और उपकर को बढ़ाने का काम कर सकती है।

कानून जीएसटी परिषद को उधारी लेने की अनुमति देता है?
मुआवजा कोष है, उसमें अन्य धन भी डाला जा सकता है। हमारा मानना है कि ऐसा हो सकता है। अगर केंद्र सरकार उधार लेना नहींं चाहती है तो वह कोष को उधारी की अनुमति दे सकती है। यह ऐसे कदम हैं, जो केंद्र सरकार के वित्त पर असर डाले बगैर उठाए जा सकते हैं।

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