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अन्य राज्यों से लौट रहे मजदूरों की निगरानी कर रहे हैं बंगाल के ग्रामीण

नम्रता आचार्य / कोलकाता April 05, 2020

तपन विश्वास केरल में राजमिस्त्री का काम करते हैं। वह 23 मार्च को उत्तर बंगाल के अलीपुरदौर के मदारीहाट स्थित अपने गांव पहुंचे। उनके पड़ोसियों ने उनके आने की खबर पुलिस को दे दी। बहरहाल विश्वास को 5 दिन तक पुलिस तलाश नहीं सकी। स्थानीय पंचायत के सदस्यों और पड़ोसियों ने उन पर नजर बनाए रखी। विश्वास बताते हैं कि वह अपने घर में छिपे हुए थे, क्योंकि उन्हें डर था कि स्वास्थ्य जांच के लिए पुलिस पकड़ ले जाएगी।

बहरहाल विश्वास की कोविड-19 की जांच हुई और उन्हें 2 सप्ताह एकांतवास में रहने को कहा गया। वह इस समय गांव वालों की निगरानी में हैं। उन्होंने कहा, 'हर कोई बोल रहा है कि मैं बाहर गया, जबकि मैंने ऐसा नहीं किया। मुझे परेशान किया जा रहा है। मेरी क्या गलती है? मैं 5 दिन चलकर घर पहुंचा हूं और अब मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है।' कुछ दिन पहले करीब 7 विस्थापित मजदूरों ने खुद को एकांतवास में डाल दिया था, जब वे 25 मार्च को चेन्नई से वापस लौटे थे। पिछले 10 से 15 दिन के दौरान कोरोनावायरस के खौफ से पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर कामगार वापस लौटे हैं। उनका लौटना भी मुसीबत बन गया है क्योंकि स्थानीय लोग भी डरे हुए हैं।  स्थानीय लोग पुलिस की भूमिका में आ गए हैं, जिससे कोविड-19 को समुदाय में न फैलने पाए। उत्तर बंगाल की एक ग्रामीण पी नीता के मुताबिक उत्तर बंगाल विस्थापित मजदूरों के  बड़े केंद्रों में से एक है। ग्रामीणों ने अपनी सीमारेखा खींच दी है और अपने इलाके में अनजान चेहरा देखते ही वे पुलिस को सूचना दे रहे हैं।  उनका कहना है, 'स्थानीय लोग इतने सक्रिय हैं कि बाजार के बाहर साबुन व पानी का इंतजाम किया गया है और हाथ धोए बिना किसी को बाजार में नहीं घुसने दिया जा रहा है।' नैतिक पुलिसिंग का नकारात्मक पहलू भी है। यह सामाजिक बहिष्कार का रूप ले सकता है और संसाधनों को लेकर भी लड़ाई छिड़ सकती है।

पश्चिम बंगाल में विस्थापन के तरीकों पर अध्ययन कर चुके अशोक फेलो दिलीप बनर्जी ने कहा, 'बंगाल के ग्रामीण परंपरागत रूप से जागरूक और जिम्मेदार रहे हैं। बहरहाल सामाजिक दूरी बनाने का मौजूदा स्वरूप लंबे समय तक सामाजिक बहिष्कार का रूप ले सकता है। हमें पहले ही रिपोर्ट मिलने लगी है कि कुछ गांवों में विस्थापित मजदूरों को घुसने नहीं दिया जा रहा है।'

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में विस्थापित मजदूरों का ग्रामीणों की नजर से बचना मुश्किल हो गया है क्योंकि प्रवेश बिंदुओं खासकर नौका टर्मिनल पर उनसे सवाल जवाब किए जा रहे हैं। सुंदरवन क्षेत्र के लोग बड़े पैमाने पर केरल में काम करते हैं, जहां पिछले 2 सप्ताह में बड़े पैमाने पर मजदूर लौटे हैं। इस इलाके में करीब 54 आवासीय गांव/टापू हैं और गांवों तक पहुंचने का एकमात्र साधन नावें हैं। एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि सरकार ने भी एक गांव से दूसरे गांव में सब्जी और खाद्यान्य जैसे जिंसों की आवाजाही पर रोक लगा दी है।

क्षेत्र की पंचायत के एक कर्मी के मुताबिक सुंदरवन में तेजी से सिमटते एक टापू घोड़ामारा में पिछले एक पखवाड़े में 75 विस्थापित आए हैं। उन्होंने कहा कि बहरहाल स्थानीय लोग पहले ही तेज कटाव की समस्या से जूझ रहे हैं और टापू पर स्थित एक स्कूल कटाव के कारण ढहने वाला है। इस तरह से विस्थापित मजदूरों के आने से यहां के संसाधनों व आजीविका के विकल्पों पर बोझ बढ़ रहा है। उत्तर बंगाल में स्थिति और गंभीर है, जहां खेती के विकल्प सीमित हैं। अलीपुर जिले के कालचीनी के रहने वाले भुवन कहते हैं, 'हमारे पास जो भी अनाज था, खत्म हो गया। अब आमदनी का साधन नहीं है। हम लकड़ीं बेचकर आजीविका चलाते हैं। अगर देशबंदी जारी रही तो हम भूख से मर जाएंगे।' 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक विस्थापन के मामले में पश्चिम बंगाल चौथे स्थान पर है। पिछले 2 दशक में पश्चिम बंगाल से विस्थापन बढ़ा है और रोजगार की संभावना न होने के कारण लोग केरल, तमिलनाडु, दिल्ली व महाराष्ट्र भागे हैं।

 
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