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आपातकालीन उपाय अपनाने का आया उचित समय

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  April 05, 2020

यह तय है कि हालात बहुत खराब हैं। कोविड-19 महामारी के आगमन के बाद पिछले कुछ दिनों में कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी हर गतिविधि एकदम अप्रत्याशित, असाधारण और कल्पना से परे रही है। केवल मॉल, न्यायालय, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बसें और ट्रेन ही नहीं बल्कि वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और कार्यालय भी बंद कर दिए गए हैं। केवल स्वास्थ्य सेवाएं और किराने की दुकानें खुली हैं। हर तरह का कारोबार थम गया है। ऐसे असामान्य हालात में हमें असाधारण प्रतिक्रिया की आवश्यकता होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने राह दिखाई है। अनुच्छेद 142 के प्रावधान के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम समय सीमाओं को आगे बढ़ा दिया है। कोई भी मामला यदि न्यायालय के समक्ष लाया जाता है तो उसे एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। न्यायालय को पता है कि मौजूदा परिस्थितियों में लोगों का न्यायालय तक पहुंचना असंभव है। सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी तरह का भ्रम दूर करने के लिए अनुच्छेद 141 का स्पष्ट उल्लेख किया और सभी उच्च न्यायालयों को यह आदेश दिया कि वे अपने यहां तथा अपने अधीनस्थ न्यायालयों में इस आदेश को लागू करें। अनुच्छेद 141 कुछ और नहीं कहता बल्कि इस महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उल्लिखित कानून भारत के तमाम न्यायालयों पर लागू होगा। न्यायालय को शायद ही कभी यह याद दिलाने की आवश्यकता पड़ती है कि यह प्रावधान संविधान में मौजूद है। परंतु आज देश जिस आपातकालीन परिस्थिति में है, उसके कारण न्यायालय को यह स्पष्ट करना पड़ा कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है बल्कि यह एक ऐसा निर्णय है जो पूरे देश पर न्यायिक असर डालेगा।

इस परिदृश्य में अर्थव्यवस्था और अर्थव्यवस्था की निगरानी करने वाले हमारे विधिक तंत्र के हर अंग को नए सिरे से तैयारी करनी होगी और इस बारे में नए ढंग से सोचना होगा कि मामलों से कैसे निपटा जाए। वित्त मंत्रालय और कंपनी मामलों के मंत्रालय ने यह घोषणा कर दी हैकि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया प्रक्रियाओं की शुरुआत करने के लिए जरूरी समय-सीमा में इजाफा किया जाएगा। यदि कोई कॉर्पोरेट कर्जदार एक लाख रुपये तक की राशि का कर्ज चुकाने में अक्षम रहता है तो कर्जदाता निस्तारण प्रक्रिया शुरू कर सकता है। अब इस सीमा को बढ़ाकर एक करोड़ रुपये किया जा रहा है। इसके साथ ही यह घोषणा भी की गई कि 30 अप्रैल तक हालात का विश्लेषण किया जाएगा और उसके बाद सरकार जरूरत पडऩे पर उक्त प्रावधानों को निलंबित भी कर सकती है।

यह देखना सुखद है कि सरकार शुरुआत से ही अर्थव्यवस्था में आने वाली दिक्कतों के बारे में सोच रही है लेकिन उपरोक्त उपाय निरर्थक साबित हो सकते हैं। यदि चार सप्ताह पहले यह कहा जा सकता है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया व्यवस्था को 30 अप्रैल से स्थगित भी किया जा सकता है तो इसका अर्थ यह है कि जो लोग इसे लेकर जरा भी संशय में हैं वे 30 अप्रैल के पहले अपने स्तर पर कार्यवाही की शुरुआत भी कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो ऐसी प्रक्रियाओं की शुरुआत करने की हड़बड़ी सामने आएगी। इस बीच राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट ने कोविड-19 से निपटने के क्रम में अपना कामधाम लगभग बंद कर दिया है। संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था को यही संकेत जा रहा है कि कोविड-19 के प्रभाव और उससे होने वाले नुकसान को लेकर अभी भ्रम की स्थिति है।

पूंजी बाजार नियामक पर भी बाजार बंद करने का दबाव होगा। इससे चीजें और जटिल होंगी। अभी हालात ऐसे नहीं है कि दुनिया के एक हिस्से में कुछ संस्थान बंद हों। बल्कि दुनिया भर के तमाम शहर और राज्य बंद हो चुके हैं। भारत भी इससे अलग नहीं है।

तमाम जगहों पर शेयर कीमतें धराशायी हो रही हैं और बैंकों तथा कर्जदारों के लिए प्रतिभूति के लिए रखे गए शेयर बेमोल हो जाएंगे। यदि उन्होंने प्रतिभूति बेची तो उन्हें दिए गए कर्ज की तुलना में बहुत कम राशि मिलेगी और इसका कर्जदारों पर बहुत ही बुरा असर होगा। वित्तीय बाजारों को बंद करने के बजाय वित्तीय नियामकों को चाहिए कि वे मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए अधिकार प्रवर्तन और दायित्वों को फिलहाल पूरी तरह स्थगित कर दें। कंपनियों से कहा जा रहा है कि वे बोर्ड बैठकों का आयोजन न करें लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। जरूरत एक ऐसा ढांचा मुहैया कराने की हैजो कंपनियों को साहसी कदम उठाने में सक्षम बनाए और वे अगले तीन वर्ष के बारे में सोच सकें। पूरा का पूरा कानूनी ढांचा स्वस्थ वृद्धि को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसे तेजडिय़ा बाजार नियमन भी कहा जा सकता है। कानून तैयार करते वक्त किसी ने नहीं सोचा होगा कि बाजार अनुमानों को कभी ऐसी दीर्घकालिक मंदी से गुजरना होगा। अब दोबारा विचार करने का वक्त आ गया है। विधायिका को भी कुछ वैसा ही हस्तक्षेप करना होगा जैसा न्यायपालिका ने समय सीमा बढ़ाकर किया। जैसा कि मेरे एक निजी इक्विटी निवेशक मित्र ने कहा, 'अब शल्य चिकित्सा का वक्त है, होमियोपैथी या किसी अन्य चिकित्सा से काम नहीं चलेगा।' जब हालात जंग जैसे आपातकालीन हों तो सोच में भी बदलाव लाना होता है, उस वक्त शांतिकालीन नीतिगत ढांचा काम नहीं आता है।

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, Emergency, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी, सर्वोच्च न्यायालय,
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