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मोदी और उनके संदेश की क्या है राजनीति?

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 05, 2020

समाचार जगत में दुष्ट कोरोनावायरस के प्रसार की खबरों ने तमाम अन्य खबरों को पीछे छोड़ दिया है और लगता नहीं कि निकट भविष्य में हालात बदलने वाले हैं। परंतु मैं इससे ऊब चुका हूं। कम से कम  इस सप्ताह के लिए इससे इतर पुरानी राजनीतिक बातें करना चाहता हूं लेकिन दिक्कत यह है कि राजनीति भी काफी हद तक स्थगित नजर आ रही है।

राजनीतिक बातों पर भी कोरोनावायरस का साया है। आइए देखें कि अपने सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती को लेकर नरेंद्र मोदी ने संदेश देने के मोर्चे पर कैसा काम किया है। बतौर संदेशवाहक उनको उन्हें जो वरदान हासिल है वह मनमोहन सिंह से लेकर राजीव गांधी तक उनके आठ पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों को भी हासिल नहीं था: यानी भारतीयों के एक बड़े तबके को सीधे और आश्वस्त करने वाले ढंग से संबोधित करना। ये भारतीय उनकी बात को देववाणी मानते हैं और पोप के आदेश की तरह आज्ञा पालन करते हैं। आम लोगों, खासकर अपने मतदाताओं के दिलोदिमाग को समझने में वह इंदिरा गांधी को टक्कर देते हैं। ये ही कारण हैं कि अपनी सरकार की ओर से हर संदेश वही दे रहे हैं। वह तमाम वक्तव्य देते हैं। कुछ साधारण बातेंं करते हैं तो कुछ तीखे तंज, बाकी का काम अपने आप हो जाता है।

जैसा कि गत शुक्रवार को दिए उनके भाषण को लेकर हुआ, भाषण पूरा होने के एक घंटे के भीतर या भाषण के बीच में ही उनकी पूरी कैबिनेट, पार्टी के शीर्ष पदाधिकारी, सोशल मीडिया पर उनके कार्यकर्ता, आरएसएस और भाजपा से जुड़े बौद्धिक सभी ने भाषण के हिस्से ट्वीट करने शुरू कर दिए। कोरोनावायरस को लेकर उन्होंने जो चार भाषण दिए, उनका संपूर्ण कथन उपरोक्त ट्वीट से जुटाया जा सकता है। जब वह बोलते हैं तो ये तमाम लोग उनकी बात को प्रतिध्वनित करते हैं। सब उनकी जुबान में बोलते हैं। संदेश की बात करें तो अलग-अलग आवाजों में भी उसका मूल स्वरूप बरकरार रहता है। इसमें इस बात से सहयोग मिलता है कि वह चाहे जो कहें या करें, उनके लोग और उनके मूल मतदाता उनकी हर बात पर यकीन करते हैं। यदि वह कुछ गड़बड़ भी करते हैं, जैसा कि नोटबंदी के दौर मेंं हुआ, तो भी प्रशंसक उनको क्षमा कर देते हैं। पिछले दिनों हुई मन की बात को याद कीजिए कैसे उन्होंने देश के गरीबों से असुविधा के लिए माफी मांगी थी और लाखों दिल पसीज गए थे।

वह कभी यह नहीं बताते कि वह लोगों के लिए क्या कर रहे हैं। पिछले चार भाषणों जिनमें राष्ट्र के नाम दो संबोधन, मन की बात और शुक्रवार का दीया जलाने वाला संदेश शामिल था, उन्हें याद कीजिए। वह लोगों के लिए क्या कर रहे हैं यह बताने के बजाय वह उन्हें बताते हैं कि लोगों को अपने लिए और खुद उनके लिए क्या करना चाहिए। स्वच्छ भारत से लेकर एलपीजी सब्सिडी त्यागने तक, नोटबंदी से लेकर अब कोविड-19 तक उन्होंने जितनी पहल की शुरुआत की है, हर बार उन्होंने आम जन से कुछ न कुछ करने को कहा। यह बात लोगों को जवाबदेह बनाती है। भला कौन नहीं चाहता कि उसे गंभीरता से लिया जाए। वह भी इतने महत्त्वपूर्ण नेता द्वारा।

कोरोनावायरस से जुड़े भाषणों में उन्होंने यही किया। पहले भाषण में उन्होंने कहा कि वह लोगों से जीवन का एक सप्ताह मांग रहे हैं, लेकिन बात वहीं रह गई। शायद वह आने वाले समय के लिए जनता को तैयार करने का नुस्खा था।

उन्होंने एक दिन के जनता कफ्र्यू की मांग की और हममें से कई ने अंदाजा लगा लिया था कि यह एक लंबे लॉकडाउन के पहले की प्रक्रिया है। उन्होंने चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस तथा अनिवार्य सेवाओं से जुड़े अन्य लोगों के लिए तालियां बजाने और उनका उत्साह बढ़ाने की बात कही। उन्होंने घंटियां बजाने और थाली बजाने का मशविरा देकर लोगों को और उत्साहित किया। आप भले ही इस बात पर कितना भी हंसें। देश भर के करोड़ों लोगों ने ऐसा किया और प्रसन्न भी हुए। कई लोगों ने ऐसा करते हुए हद पार कर दी। जहां तक वायरस की बात है, वह तो जिंदा वस्तु तक नहीं है तो वह भला शोर से क्यों परेशान होगा। मोदी ने भी कोई वादा नहीं किया था, न ही इससे कुछ हुआ। मोदी के माफी मांगने में भी एक खास रुझान महसूस किया जा सकता है। नोटबंदी के बाद जब पूरा देश हलाकान था तब गोवा में उन्होंने ऐसा ही एक भाषण दिया था। रुंधे गले से उन्होंने कहा था कि अगर उनके इरादों या उनके कदमों में कोई खामी हो तो वह देश द्वारा दिया जाने वाला कोई भी दंड भुगतने को तैयार हैं। जाहिर है इतने विनम्र नेता को भला कौन दंडित करेगा। नोटबंदी वैसी ही बड़ी भूल थी जैसी माओ द्वारा चीन मेंं गौरेयों के खिलाफ हमला। परंतु यहां एक ताकतवर प्रधानमंत्री था जिसने नेक इरादों से यह बड़ा जोखिम उठाया था। वह लोगों से उनके और देश के हित में मामूली त्याग करने को ही तो कह रहा था।

मन की बात कार्यक्रम में कोरोनावायरस को लेकर मांगी गई माफी में ज्यादा बारीकी निहित थी। वह उस गड़बड़ी के लिए माफी नहीं मांग रहे थे जो उन्होंने उत्पन्न की थी बल्कि वह इस साहसी कदम से हो रही असुविधा की माफी मांग रहे थे। वह बड़ा कदम जो देश को कोरोना से बचाने के लिए उठाया गया था। ध्यान रहे उन्होंने प्रवासी श्रमिकों के जबरिया विस्थापन के संकट का उल्लेख तक नहीं किया।

इससे तीन सबक मिलते हैं: पहला मोदी अपने संदेश में कोई वादा नहीं करते। दूसरा, वह हमेशा आप से अपने लिए और राष्ट्र के लिए कुछ करने को कहते हैं। तीसरा, वह कभी किसी बात का पश्चाताप नहीं करते। वह कभी यह तक नहीं कहते कि हम इस काम को बेहतर ढंग से कर सकते थे।

चौथा सबक, उन्हें अच्छी तरह पता है कि किसे संबोधित करना है, किसकी अनदेखी करनी है, किसकी नहीं करनी है और उसे लाभान्वित करना है। यानी उनकी आलोचना करने वाले, टीकाकार कथित उदारवादी और ऊंचे तबके के बुर्जुआ उनकी बातों का मखौल उड़ाते हैं।  ताली-थाली, दीया-बाती को लेकर बनते मजाक आदि बनाते हैं लेकिन मोदी के भाषण और संदेश उनके लिए नहीं हैं।

दूसरा तबका जिसे वह संबोधित नहीं कर रहे लेकिन जिसकी वह अनदेखी भी नहीं कर सकते वह हैं गरीब। उन्हें बहुमत इन्हीं लोगों से मिलता है लेकिन वे उनकी बहस को संचालित नहीं करते। गरीब लोग चतुर होते हैं, राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होते हैं और सवाल बहुत करते हैं। उन्हें जोखिम में क्यों डालना? मध्य वर्ग का मतदाता इनसे बाहर है और एजेंडा तय करता है। अगर वह सवाल करता तो वह थाली या मोमबत्ती लेकर बालकनी में क्यों आता? गरीबों को मोदी नकदी, एलपीजी, शौचालय, आवास आदि के माध्यम से संबोधित करते हैं। जब पैसे से काम हो रहा हो तो संदेश की जरूरत क्या है। गरीबों को उनकी सीधी मदद पहले की तुलना में बहुत बेहतर रही है। हमें अक्सर यह आलोचना सुनाई देती है कि मोदी देश के लोगों को बचकाना बना रहे हैं। ताली, थाली, मोमबत्ती और गो कोरोना गो जैसी चीजों को भला और क्या कहेंगे? मोदी हमें समझते हैं थाली प्रकरण में हम ऐसा देख चुके हैं। व्हाट्सऐप पर ऐसे संदेश भेजे गए मानो थाली बजाने से वायरस मर जाएगा। गत शुक्रवार को एक जानेमाने चिकित्सक और भारतीय चिकित्सा महासंघ के पूर्व मुखिया ने भी ऐसी ही बेवकूफाना बात की कि इससे कोरोनावायरस खत्म हो जाता है। अगले भाषण में उन्होंने लोगों को बालकनी या सड़कों पर नहीं निकलने को कहा और सामाजिक दूरी बनाने पर जोर दिया। अगर कोई कहता है कि वह मोदी का मस्तिष्क पढ़ सकता है तो वह या तो झूठा है या फिर आइन्स्टीन का अवतार। आप खुद को मोदी की जगह रखकर देखिए। अगर मैं खुद को रखूं तो मुझे ऐसा नजर आता है: ओह! लोग कितने बचकाने हैं। लेकिन आज्ञाकारी बचकाने। आज्ञापालन के क्रम में वे अति कर सकते हैं लेकिन मैं उन्हें सतर्क करता रहूंगा।

मोदी जीत रहे हैं। उन्हें शिकायत क्यों होगी? वह उन आलोचकों की फिक्र क्यों करें जो उन पर आरोप लगाते हैं कि वह मतदाताओं को बचकाना बना रहे हैं। जनता तो बच्चा बन के खुश है।

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