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महामारी के दौर में बफर स्टॉक की समीक्षा कितनी जरूरी?

संजीव मुखर्जी /  April 03, 2020

पिछले दिन का सिरदर्द अनजाने में ही आज का वरदान बन गया है। कोविड-19 महामारी फैलने के पहले अनाजों के ठसाठस भरे जिन गोदामों को वर्षों से विवाद का मुद्दा बनाया जाता रहा है उन्हीं गोदामों ने सरकार को यह सुविधा दी है कि देशबंदी में अपनी आजीविका गंवा चुके गरीबों का पेट भरने में इस अनाज का इस्तेमाल किया जा सके।

अगर केंद्र सरकार चाहे तो वह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत करीब 80 करोड़ लाभार्थियों को अग्रिम तौर पर एक साल से भी अधिक वक्त का राशन दे सकती है। अभी तक उसने इन लोगों को मुफ्त में तीन महीने का राशन एडवांस में देने का फैसला किया है। इसके साथ प्रति परिवार एक किलो दाल भी दी जाएगी।

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के मुताबिक गत 10 मार्च को केंद्रीय पूल में भारत का गेहूं एवं चावल भंडार करीब 7.77 करोड़ टन था जिसमें 1.924 करोड़ टन धान भी शामिल है। अगर पिछले तीन साल के औसत इस्तेमाल को ध्यान में रखें तो एनएफएसए के सुचारु संचालन के लिए सालाना करीब 5.4 करोड़ टन अनाज की जरूरत होती है। यह स्थिति गेहूं खरीद का नया सीजन शुरू होने के पहले की है जो 2020-21 सत्र के लिए 1 अप्रैल से शुरू होने वाला है।

अभी तक इस कानून के सभी लाभार्थियों को महीने में पांच किलो गेहूं या चावल काफी अधिक सब्सिडी पर दिया जाता है। चावल तीन रुपये प्रति किलो, गेहूं दो रुपये प्रति किलो और मोटे अनाज एक रुपये प्रति किलो के दाम पर दिए जाते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की नई घोषणा के बाद इन सभी लाभार्थियों को अगले तीन महीनों तक 10 किलो अतिरिक्त चावल या गेहूं मिलेगा।

भले ही ऐसा इरादतन नहीं हुआ है लेकिन इस कदम से गेहूं की नई फसल को रखने के लिए खाली गोदाम की जरूरी जगह भी पैदा हो सकेगी। हालांकि कोविड-19 के चलते मजदूरों की भारी किल्लत होने से इस सीजन की गेहूं कटाई का काम देर से ही हो पाएगा।

यह मानकर चलते हैं कि अप्रैल महीने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से खाद्यान्न का उठाव फरवरी 2020 के स्तर पर ही बना रहेगा। एक आकलन से पता चलता है कि सामान्य स्थितियों में करीब 93 लाख टन गेहूं और चावल की सार्वजनिक भंडारगृहों से निकासी होती। आवंटन को दोगुना करने के सरकारी फैसले के बाद करीब 1.9 करोड़ टन अनाज गोदामों से बाहर निकलने की संभावना है।

अनाज भंडार की अच्छी स्थिति होने और केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों की तरफ से भी गरीबों के लिए नि:शुल्क राशन देने की घोषणाओं के बाद एक बार फिर वह बहस खड़ी हुई है कि क्या भारत को कोविड-19 महामारी जैसे संकटपूर्ण हालात से निपटने के लिए अपने तिमाही अनाज भंडार मानकों को बढ़ाने की जरूरत है? इस बात को लेकर लंबे समय से अलग-अलग राय रही है। दरअसल बड़ा बफर स्टॉक बनाए रखने की ऊंची लागत और अधिक भंडारण की वजह से होने वाले नुकसान जैसे मुद्दों को लेकर मतभेद रहे हैं। यह स्थिति नकदी की भारी कमी से जूझ रही सरकार के लिए वास्तव में एक चिंता की बात है। एफसीआई ने अपना परिचालन जारी रखने के लिए पहले ही लघु बचत पूल से उधारी लेने का अप्रत्याशित कदम उठाया हुआ है।

केंद्र सरकार हरेक पांच साल के बाद खाद्यान्न के बफर स्टॉक संबंधी मानकों की समीक्षा करती है लेकिन ऐसी पिछली समीक्षा वर्ष 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के पहले ही की गई थी। मौजूदा मानकों के हिसाब से सरकार को मोटे तौर पर 4.5 महीने का पीडीएस अनाज हर साल 1 अप्रैल को बफर स्टॉक के तौर पर रखना होता है। 1 जुलाई को यह मात्रा 9.2 महीनों के पीडीएस अनाज की रहती है जबकि 1 अक्टूबर को सात महीने और 1 जनवरी को करीब पांच महीनों का अनाज सरकार को बफर रखना होता है।

बीते दशक में चर्चा का विषय यह रहा है कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिये सीधे लाभार्थी के खाते में अनाज खरीद के लिए पैसे भेज दिए जाएं या फिर उसे पहले की तरह अनाज ही बांटा जाए। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'सरकार ने पिछली बार बफर स्टॉक सीमा बढ़ाने से इसलिए इनकार कर दिया था कि पीडीएस के तहत अनाज के बजाय नकद पैसे देने की तरफ रुझान बढ़ेगा।' लेकिन डीबीटी की तरफ तेजी से नहीं बढऩे से यही लगता है कि बफर स्टॉक की सीमा बढ़ाना ही इकलौता समाधान है। रमेश चंद की अगुआई वाले पैनल ने ही 2013 में बफर स्टॉक की तिमाही सीमा बढ़ाने की अनुशंसा की थी।

कृषि लागत एवं कीमत आयोग के पूर्व चेयरमैन और इक्रियर संस्थान में कृषि के इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी का सुझाव है कि पीडीएस लाभार्थियों को नकदी पैसा देना अब भी अनाज देने से कहीं बेहतर विकल्प है। उनका कहना है कि बफर स्टॉक के मानक इस आधार पर तय किए गए थे कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पीडीएस के जरिये खाद्यान्न का वार्षिक उठाव कितना होगा? इस कानून के तहत पिछले तीन वर्षों में हुआ अनाज उठाव दिखाता है कि यह सोच से काफी कम रहा है। गुलाटी सवालिया लहजे में कहते हैं, 'ऐसी स्थिति में बफर स्टॉक की सीमा बढ़ाने या उसके संशोधन की जरूरत ही कहां रह जाती है?'

गुलाटी की मानें तो 2013 के बफर मानक इस बात को ध्यान में रखते हुए बनाए गए थे कि केंद्र सरकार को सालाना करीब 6.12 करोड़ टन अनाज की जरूरत एनएफएसए के तहत होगी। लेकिन पिछले तीन वर्षों का उठान महज 5.3-5.5 करोड़ टन ही रहा है। इस हिसाब से देखें तो बफर मानकों में सुधार की कोई जरूरत नहीं है।

वह कहते हैं कि मौजूदा हालात में भी अगर किसी व्यक्ति के पास अनाज के बजाय नकदी होती तो वह उससे कहीं पर भी अपना पेट भर सकता था। वह कहते हैं, 'अगर हम उन्हें गेहूं ही दें दे तो वह चक्कियों के नहीं चल पाने पर क्या कर पाएगा।'

सच तो यह है कि भोजन मिल पाना सबसे अहम है। इसीलिए खाद्य एवं कृषि के पूर्व सचिव शिराज हुसैन ने शहरी इलाकों में मजदूरों एवं दैनिक कामगारों के लिए अधिक संख्या में सामुदायिक रसोईघर बनाने की जरूरत पर बल दिया है। ऐसा होने पर शहरी उपभोक्ताओं के लिए प्रसंस्कृत खाद्य के सुचारू संचालन के लिए वितरण नेटवर्क की बाधाएं दूर की जा सकेंगी। हुसैन कहते हैं, 'कोविड-19 किसी की जिंदगी में कभी एक बार आने वाला संकट है। लिहाजा इसके आधार पर कोई योजना बनाना लंबी अवधि में नहीं संभव है। हमें भंडार बढ़ाने के बजाय सुचारु आपूर्ति शृंखलाओं की जरूरत है जो मौजूदा अनाज भंडार का ही सही से वितरण कर सकें।' संक्षेप में, कोविड-19 महामारी से उपजे हालात को आधार बनाकर बफर स्टॉक के मानक बढ़ाना लंबे समय में कोई बढिय़ा सोच नहीं होगी।

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