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कोविड और उसके बाद

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 03, 2020

किसी भी वृद्धि वक्र के तीन चरण होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इन दिनों कोविड-19 के मामले में देखने को मिल रहा है। सबसे पहला चरण वह है जहां नए मामले रोज स्थिर या तेज गति से बढ़ते हैं। दूसरा चरण वह जब वृद्धि दर में तो गिरावट आने लगती है लेकिन कुल मामलों की तादाद अब भी बढ़ रही होती है और वक्र सपाट हो जाता है। तीसरा चरण वह है जब नए मामलों की तादाद कम होनी शुरू हो जाती है। दुनिया भर में कोविड-19 के 10 लाख से अधिक मामलों में से 80 प्रतिशत दुनिया के जिन 10 शीर्ष देशों में हैं उनमें से सात में यह दूसरे या तीसरे चरण में है। केवल अमेरिका, ब्रिटेन और तुर्की अपवाद हैं। बाकी देखा जाए तो लगभग पूरी दुनिया कोविड-19 के वक्र के पहले चरण के अंत में है।

भारत भी उसी स्थिति में है या शायद तबलीगी जमात वाली घटना नहीं होती तो वह उसी स्थिति में होता। यदि हम मानकों का पालन करें और 14 मार्च को जब देश में कोविड के 100 मामले हुए, तब से इसका विस्तार देखें तो 9 दिन में यह 500 तक पहुंचा। लॉकडाउन के बाद के शुरुआती 10 दिन में यह पांच गुना बढ़कर 2,500 हो गया। यदि लॉकडाउन के शेष 11 दिन में यह एक बार फिर पांच गुना हो जाता है तो अप्रैल के मध्य तक देश में कोविड-19 के कुल 12,000 मामले होंगे। अगर हम लॉकडाउन के बावजूद तब तक दूसरे चरण की ओर निर्णायक ढंग से नहीं बढ़े तो वाकई बुरी खबर होगी। आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की बात कही है।

अच्छी बात यह है कि शायद हम कभी आबादी और मामलों के उस अनुपात पर न पहुंचे जिस अनुपात पर पश्चिमी यूरोप के देश हैं। यूरोप में हर पांच-छह करोड़ की आबादी पर एक लाख मामले हैं। यदि उस स्थिति को भारत के बारे में रखकर देखें तो 20 लाख मामलों के आसपास ठहरेगा। जबकि अभी पूरी दुनिया में कुल मिलाकर 10 लाख मामले सामने आए हैं। इसके बावजूद हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधा बुनियादी ढांचे की कमी जल्द उजागर हो सकती है। सरकार की प्रतिक्रिया में हमारी और आपकी भूमिका सर्वाधिक है जबकि सरकार की ओर से परीक्षण और राहत पैकेज काफी कम हैं। बल्कि संपूर्ण लॉकडाउन के कारण फैक्टरियां बंद हुईं, आय का नुकसान हुआ, प्रवासियों के लिए संकट उत्पन्न हुआ। ऐसे में लॉकडाउन के साथ व्यापक भुगतान की तत्काल घोषणा की जानी चाहिए थी। कोई कदम उठाने के पहले समग्र सोच विचार नहीं करना आदत बनती जा रही है। सन 2016 में नोटबंदी के बाद नई मुद्रा की कमी हो गई थी। हालात तब और बिगड़ गए जब अलग-अलग आकार के नोटों के कारण एटीएम को नए सिरे से व्यवस्थित करना पड़ा। अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर हो रहा है? शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि पिछले महीने इसका बहुत गहरा असर हुआ। इसे पहले की मंदी से जोड़कर देखें तो वाहनों की बिक्री में 50 फीसदी कमी आई, वस्तु एवं सेवा कर राजस्व में 20 फीसदी गिरावट, पेट्रोल और डीजल की खपत में 20 फीसदी कमी और बिजली की खपत में 30 फीसदी कमी आई। पूरे वर्ष का प्रत्यक्ष कर राजस्व दो वर्ष पहले के स्तर पर है जबकि उस वक्त अर्थव्यवस्था आज से 15 फीसदी कमतर थी। कुछ आंकड़े 2008 के वित्तीय संकट से भी बुरे रह सकते हैं।

राजस्व के आंकड़े कमजोर पडऩे और संकट से निपटने के लिए व्यय बढऩे पर राजकोषीय तनाव बढ़ेगा। ऐसे में हम तीन दशक पुरानी राजकोषीय स्थिति में पहुंच सकते हैं। वित्त मंत्री के पास एक उपाय था वह बजट में उल्लिखित पूंजीगत व्यय को कम कर सकती थीं लेकिन चूंकि अब वह जीडीपी का बहुत मामूली हिस्सा है इसलिए उससे भी मदद नहीं मिलेगी। हमें एक या दो तिमाही प्रतीक्षा करनी होगी जब अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी और उसके बाद धीमी गति से सुधार की शुरुआत होगी। धीमी इसलिए क्योंकि बंद पड़ी फर्म को दोबारा काम शुरू करने में वक्त लगेगा, राजकोषीय तंगी बनी रहेगी और कारोबारी माहौल भी अनुकूल नहीं होगा। छंटनी और कटौती के कारण आम परिवारों की क्रय शक्ति कमजोर होगी और निवेश पर भी इसका असर होगा। दोहरे घाटे की समस्या एक बार फिर खड़ी हो जाएगी। मांग में कमी ने पहले ही जिंस कीमतों को प्रभावित किया है और वे 25 से 30 फीसदी तक गिर गई हैं। भारी कारोबारी कर्ज भी वित्तीय क्षेत्र का तनाव बढ़ा सकता है। नई सदी का पहला दशक संकट में समाप्त हुआ। दूसरा दशक भी धीमी वृद्धि के साथ उसी हालत में रहा। तीसरे दशक का उत्तरार्द्ध तो बीते दो दशकों से भी बुरा साबित होता दिख रहा है। कृपया अंधेरा होने पर अपने दीये जला लें।

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी,
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