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जीवन रोजगार प्रभावित कर रहा जमीन का विवाद

आदिति फडणीस /  April 02, 2020

जमीन संबंधी मौजूदा विवादों के कारण देश में करीब 65 लाख लोगों का जीवन और आजीविका प्रभावित हुई है। इन विवादों के कारण 21 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन फंसी हुई है। जमीन विवाद से जुड़े 703 मामलों में से 335 में करीब 13.7 लाख करोड़ रुपये का प्रतिबद्ध, चिह्निïत और संभावित निवेश फंसा हुआ है जो 2018-19 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 7.2 फीसदी है। 

गैर सरकारी संस्था लैंड कनफ्लिक्ट वॉच ने इसी महीने एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया। संस्था ने देशभर में जमीन विवाद से जुड़े 703 मामलों पर तीन साल से अधिक समय तक शोध किया। यह रिपोर्ट थॉमस वर्सडेल और कुमार संभव ने तैयार की है। संभव ने कहा कि इस काम में 40 से अधिक शोधकर्ताओं को लगाया गया था जिन्होंने देशभर में विभिन्न संबंधित आर्थिक क्षेत्रों से आंकड़े एकत्र किए। सामाजिक कारकों, संबंधित कानूनों और विवादों में फंसी जमीन की श्रेणी का व्यापक अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं के दल ने इन आंकड़ों को क्षेत्रीय राजनीतिक-आर्थिक सच्चाइयों की कसौटी पर भी कसा। इनमें कुछ क्षेत्रों में नक्सलवाद और जनजातीय बहुल अधिसूचित क्षेत्र शामिल हैं जहां जनजातियों के अधिकारियों के संरक्षण के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए हैं। इस अध्ययन में कहा गया है कि नए भूमि विवादों में बुनियादी क्षेत्र के विस्तार की जरूरत सबसे प्रमुख कारण है। लेकिन अप्रत्याशित आर्थिक गतिविधियों के कारण भी विवाद पैदा हुए हैं। इनमें राज्य के वन संरक्षण और वानिकी के उपाय शामिल हैं। अध्ययन के मुताबिक जमीन विवाद से जुड़े अधिकांश मामले (68 फीसदी) साझा जमीन से संबंधित हैं। इनमें से अधिकांश विवादों की वजह वन अधिकार कानून, 2006 का उल्लंघन या इसे लागू नहीं करना है।

अध्ययन में जिन मामलों का विश्लेषण किया गया उनमें से 104 मामलों में पिछले दो दशक से मुकदमा चल रहा है। इसी तरह 149 मामलों में कम से कम एक दशक से मामला सुलझ नहीं पाया है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि 2013 में भूमि पुनर्वास कानून के पारित होने के बाद स्थिति और बदतर हो गई है। यह कानून 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह लाया गया था। भूमि राज्य का विषय है लेकिन भूमि अधिग्रहण पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। संभव ने कहा, 'लंबे समय तक केंद्र और राज्यों के अधिकांश भूमि अधिग्रहण कानूनों में तालमेल था। हालांकि उनका झुकाव सरकार की तरफ और भूमालिकों के खिलाफ था।' नए कानून के आने से भूमालिकों का मुआवजा बढ़ गया, इसमें जमीन के अधिग्रहण से पहले भूमालिकों की अनुमति लेना अनिवार्य बना दिया और इसमें परियोजनाओं को पहले भूमि अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव का अध्ययन करना जरूरी है। राज्यों के भी केंद्र के कानून के मुताबिक अपने कानून बनाने की उम्मीद है। लेकिन कई राज्य सरकारें इन प्रावधानों को लागू नहीं करना चाहती है। इसलिए राज्यों ने अपने हिसाब से भूमि अधिग्रहण कानून बनाया और उनमें प्रगतिशील प्रावधानों को शामिल नहीं किया गया या उन्हें कमजोर कर दिया गया। कर्नाटक, महाराष्टï्र और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्य भूमि अधिग्रहण कानून बनने के बावजूद अंग्रेजों के जमाने के कानून का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। पुराने कानूनों या राज्यों के नए भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत भूमि अधिग्रहण के कई मामलों में भूस्वामियों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'राज्य सरकारें यह समझने में नाकाम हैं कि किसान और भूमालिक अपनी जमीन की वास्तविक कीमत और सहमति तथा पुनर्वास आदि से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बारे में ज्यादा जागरूक हैं। अगर उन्हें लगता कि कोई भूमि अधिग्रहण सही नहीं है तो वे उसे अदालत में चुनौती देने के लिए तैयार हैं।'

संभव मानते हैं कि उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत भूमि अधिग्रहीत करना ज्यादा महंगा और पेचीदा हो गया है। कई राज्य सरकारों ने अपने हिसाब से भूमि अधिग्रहण कानून और नीतियां बनाने की कोशिश की है ताकि उद्योग को भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों से बचने का मौका मिल सके। लेकिन इस तरह के शॉर्टकट रास्ते से शुरू की गई परियोजनाओं को अदालतों में कानूनी चुनौतियों या विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण मामला पहले से ज्यादा पेचीदा हो गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमि कानूनों में बदलाव के बाद उद्योग और सरकारी संस्थाएं भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे से बाहर सीधे किसानों से जमीन खरीद रही हैं। इससे अधिकांश मामलों में  भूमालिकों को अपनी जमीन की वास्तविक कीमत मिल रही है और डेवलपरों को भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया से बचने में मदद मिल रही है। इस व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या यह है कि आजीविका के लिए जमीन पर निर्भर खेतिहर मजदूरों को मुआवजे या पुनर्वास का फायदा नहीं मिल रहा है जो भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अनिवार्य है। संभव ने कहा, 'कोई भी इस असहज करने वाली सच्चाई के बारे में बात नहीं कर रहा है।'

रिपोर्ट के मुताबिक 703 मामलों में से जिनमें समुदाय एक पक्ष था, उनमें 70 फीसदी विवाद के लिए राज्य की गतिविधियां जिम्मेदार हैं। अन्य 25 फीसदी मामलों में जहां भूमालिकों का उद्योग के साथ विवाद है, उनमें राज्य की संस्थाएं मध्यस्थ्य या नियामक के रूप में पक्ष हैं। तीन फीसदी मामलों में दो या अधिक समुदायों के बीच विवाद है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि आधिकारिक रूप से भारत के 12 फीसदी जिलों को नक्सलवाद से प्रभावित हैं। लेकिन जमीन के कुल विवादों में इनका हिस्सा 17 फीसदी है, विवाद प्रभावित क्षेत्रों में इनकी हिस्सेदारी 31 फीसदी है और विवादों के कारण प्रभावित आबादी में इनकी हिस्सेदारी 15 फीसदी है। अधिसूचित क्षेत्र के तहत देश के केवल 13.6 फीसदी जिले आते हैं लेकिन देश के 26 फीसदी भूमि विवादों इन्हीं जिलों से जुड़े हैं। भूमि विवाद से प्रभावित कुल 65 लाख लोगों में से 28.5 फीसदी इन जिलों के हैं और कुल प्रभावित क्षेत्र में इनका हिस्सा 41 फीसदी है। संभव ने कहा कि अध्ययन से साबित होता है कि कानूनों को लागू नहीं करने की लागत पहले की गई कल्पना से बहुत अधिक है।

Keyword: Land Conflict Watch, Land Dispute, रोजगार, जमीन विवाद, आजीविका, लैंड कनफ्लिक्ट वॉच,
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