बिजनेस स्टैंडर्ड - केवाईसी से केवाईबी तक का सफर जरूरी
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केवाईसी से केवाईबी तक का सफर जरूरी

तमाल बंद्योपाध्याय /  April 02, 2020

बैंकों में जमा धन की सुरक्षा को लेकर आशंकित ग्राहकों को आश्वस्त करने के लिए जरूरी है कि बैंक उन्हें अपनी वित्तीय सेहत के बारे में सही जानकारी दें। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

पिछले कुछ समय से सरकार के स्वामित्व वाले बैंकों के लिए काम कर रहे अधिकतर वरिष्ठ बैंकर एक तरह के डर के माहौल में जी रहे हैं। अब यह भय कई निजी बैंकों में अपने पैसे जमा करने खाताधारकों को भी अपनी चपेट में ले चुका है, हालांकि इसके कारण अलग हैं। बैंकर जांच एजेंसियों की तरफ से पूछताछ होने के डर से नए कर्ज बांटने से परहेज कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर यह कर्ज फंस जाता है तो एजेंसियां उनसे पूछताछ करने लगेंगी। वहीं बैंकों के प्रति जमाकर्ताओं का भरोसा कम होता जा रहा है क्योंकि उनकी नजर में इन बैंकों के पास रखा उनका पैसा अब सुरक्षित नहीं रह गया है।

बैंक किसी जमाकर्ता या उधारी लेने वाले को अपना ग्राहक बनाने के पहले अपने 'ग्राहक को जानोÓ यानी केवाईसी मानकों का पालन करते हैं ताकि यह पता चल सके कि जमा खाते में रकम कहां से आ रही है और उधारी लेने वाले के बारे में यह सुनिश्चित हो सके कि पैसा कहां जाने वाला है? यह एक थकाऊ प्रक्रिया है लेकिन कोई भी इससे बच नहीं सकता है। लेकिन अब समय आ गया है कि बैंकों के ग्राहक खासकर उनके जमाकर्ताओं को भी अपने बैंक के बारे में समुचित जानकारी मिले।

कोई भी बैंक जमाओं के रूप में रकम जुटाता है और उस पैसे को कर्ज के रूप में बांटता है और बॉन्ड में निवेश भी करता है। मोटे तौर पर कहें तो फंड जुटाने की लागत और ऋण एवं अन्य निवेशों से हुई आय का फर्क ही परिचालन लागत को हटाने के बाद उस बैंक का मुनाफा होता है। हरेक सौ रुपये की जमा पर बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के तौर पर चार रुपये रखता है और सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के तहत न्यूनतम 18.25 रुपये सरकारी बॉन्ड में निवेश करता है। यह रकम अचानक जमाओं को निकालने की दर बढऩे जैसी स्थितियों में काफी काम आती है। बाकी जमाओं एवं पूंजी का इस्तेमाल कर्ज बांटने में किया जाता है जिसमें 40 फीसदी हिस्सा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों का होना चाहिए। वास्तव में, एक बैंक को अपनी अल्पकालिक देनदारियां पूरी करने के लिए अच्छी-खासी तरल परिसंपत्ति रखने की जरूरत होती है।

बैंकों के लिए दोनों तरह के हालात मुफीद हो सकते है: जब ब्याज दर बढ़ती है तो वे अपने कर्ज पोर्टफोलियो से पैसे कमा सकते हैं और दरें गिरने पर बॉन्ड में निवेश के जरिये कमाई कर सकते हैं। लेकिन यह तो महज सिद्धांत की बात है। बैंकिंग की वास्तविक दुनिया काफी जटिल होती है।

सवाल है कि कोई व्यक्ति किसी बैंक के बारे में किस तरह जानकारी जुटा सकता है? किसी को भी किसी बैंक के बारे में किन मानदंडों पर गौर करना चाहिए? सबसे पहले बैंक की लाभपरकता पर नजर डालनी चाहिए लेकिन यह उसकी वित्तीय सेहत का एकमात्र लक्षण नहीं है। बैंक परिसंपत्तियों की गुणवत्ता भी अहम है। उस बैंक के कुल ऋण आवंटन में फंसे कर्जों के प्रतिशत पर भी गौर करना जरूरी है। कोई कर्ज उस समय फंस जाता है जब लेनदार तीन महीनों तक उसकी किस्तें चुकाना बंद कर देता है। फंसे हुए कर्ज खराब इसलिए माने जाते हैं कि ऐसे कर्जों पर बैंक को कोई भी ब्याज नहीं मिलता है और उसे फंसे कर्ज के लिए अलग से फंड का भी इंतजाम करना पड़ता है। इस वजह से बैंकों की मुनाफा कमाने की क्षमता पर असर पड़ता है।

यहां तक कि सबसे अच्छे बैंकों के पोर्टफोलियो में भी फंसे कर्जों का कुछ हिस्सा होता है। उनके कारोबार की प्रकृति ही ऐसी है। जब तक कोई बैंक अच्छी तरह संचालित हो रहा है और उसके पास पर्याप्त पूंजी है तब तक फंसे कर्ज को लेकर अधिक घबराने की जरूरत नहीं है। आरबीआई मानकों के मुताबिक मौजूदा पूंजी का जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात 10.875 फीसदी है जो मार्च के अंत तक 11.5 फीसदी तक जा सकता है। कर्ज परिसंपत्तियों के विभिन्न समूहों का जोखिम अलग-अलग होता है। सरल शब्दों में कहें तो एक बैंक को हरेक 100 रुपये की जोखिम-भारित परिसंपत्ति के लिए 10.875 रुपये पूंजी की जरूरत होती है। वहीं छोटे वित्त बैंकों के लिए यह जरूरत कहीं अधिक यानी 15 रुपये की होती है।

बैंकों की वित्तीय सेहत का एक और अहम पैमाना प्रावधान कवरेज अनुपात होता है। बैंकों को अपनी अच्छी परिसंपत्तियों के लिए भी 0.40 फीसदी प्रावधान करने की जरूरत होती है। किसी बैंक के पास जोखिम वाली परिसंपत्तियों और प्रावधान कवरेज अनुपात के लिए जितनी अधिक पूंजी होती है और खराब कर्जों का अनुपात जितना कम होता है, वह उतना ही सशक्त होता है। इनमें से किसी भी पैमाने को पृथकता में नहीं देखना चाहिए। जब तक किसी बैंक के पास पर्याप्त पूंजी एवं लाभप्रदता है तब तक उसके फंसे कर्जों को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है, बशर्ते वह बैंक उसे छिपा न रहा हो।

कुछ सार्वजनिक बैंकों ने घाटा उठाया है और उनके पास खराब कर्जों का ढेर भी है लेकिन उनका बहुलांश स्वामित्व सरकार के पास होने से जमाकर्ता खुद को सुरक्षित समझते हैं। सरकार समय-समय पर इन बैंकों में पूंजी डालकर उनकी हालत सुधारती रहती है। वहीं निजी बैंकों को खुद ही अपना ख्याल रखना होता है। पिछले तीन दशकों में किसी भी अधिसूचित बैंक को सरकार ने बंद नहीं होने दिया है। जब भी कोई बैंक पतन की कगार पर होता है तो आरबीआई पहल करता है और इसके जमाकर्ताओं के हितों को सुरक्षित रखने के लिए राहत पैकेज लेकर आता है। हालांकि सहकारी बैंकों के मामले में यह स्थिति नहीं है। कई सहकारी बैंक डूब चुके हैं और उनके जमाकर्ताओं की जमा-पूंजी भी चली गई है।

सहकारी बैंकों समेत तमाम बैंकों को अपने जमाकर्ताओं के पैसे के लिए बीमा कवर खरीदना जरूरी होता है। हरेक जमाकर्ता के लिए यह बीमा कवर अब पांच लाख रुपये का है जिसमें ब्याज भी शामिल है। इसका मतलब है कि अगर कोई बैंक डूबता है तो जमाकर्ता को कम-से-कम पांच लाख रुपये मिलना तय है। अपने परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर पैसे जमा कर इस बीमा कवर को व्यावहारिक तौर पर बढ़ाया जा सकता है।

बहरहाल एक निवेशक का बैंक को देखने का तरीका अलग होता है। अगर कोई निवेशक किसी बैंक का शेयर खरीदना चाहता है तो वह उसके पूंजी आधार एवं फंसे कर्जों के अलावा परिसंपत्ति एवं इक्विटी पर मिलने वाले रिटर्न और जमाओं पर औसत लागत एवं कारोबारी मॉडल को भी ध्यान में रखता है। इसके अलावा प्राइस-टु-बुक अनुपात पर भी गौर करता है जो बताता है कि एक बैंक का बाजार मूल्य उसके बुकिंग मूल्य की तुलना में कितना है। बाजार मूल्य इसके शेयरों की संख्या में एक शेयर के मूल्य से गुणा करने पर पता चलता है जबकि बुकिंग मूल्य इसकी परिसंपत्तियां हैं। भारत में दुनिया के कुछ बेहद मूल्यवान बैंक मौजूद हैं।

आखिरकार, बैंक प्रबंधन की गुणवत्ता और कामकाजी प्रशासन भी उसे दूसरों से अलग करता है। ये सभी पहलू ग्राहकों के मन में भरोसा पैदा करते हैं जो बैंकिंग कारोबार के लिए बुनियादी तत्त्व है। एक समय बैंक अपने ग्राहकों के बीच विश्वास एवं अचंभे का भाव पैदा करते थे। उनके भव्य मुख्यालयों को देखकर लोगों को यह लगता था कि उनका पैसा सुरक्षित जगह पर है। यही वजह है कि एचएसबीसी हॉन्गकॉन्ग स्थित अपने मुख्यालय को दुनिया की सबसे अच्छी बैंकिंग इमारत बनाना चाहता था। विकसित बाजारों में अधिकांश बैंकों के मुख्यालय ऐसे हैं कि वहां के पर्यटक स्थलों में शुमार किए जाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि नए दौर की बैंकिंग में केवल मुख्यालय की भव्य इमारत से ही भरोसा नहीं जगाया जा सकता है। बैंकों को अपनी वित्तीय सेहत से जुड़े प्रमुख मानकों और आरबीआई से मिले लाइसेंस को अपनी शाखाओं में भी दर्शाना चाहिए। ग्राहकों को अपने बैंकों के बारे में जानने का उतना ही अधिकार है जितना बैंकों को अपने ग्राहक के बारे में जानने का।

(लेखक बिजऩेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, एक लेखक एवं जन स्माल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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