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देशबंदी ने ताजा कर दीं नोटबंदी की यादें

इंदिवजल धस्माना /  03 31, 2020

बीएस बातचीत

बेल्जियम में जन्मे भारतीय अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का कहना है कि विस्थापित मजदूर सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण वे घर जाने को तत्पर हैं। इंदिवजल धस्माना से बातचीत में उन्होंने कहा कि मजदूरों को अपने घरों में रहने का आदेश लागू करना कठिन होगा। संपादित अंश ...

आप ऐसा क्यों कह रहे हैं कि लॉकडाउन लागू करने की उचित योजना नहीं बनाई गई?

लॉकडाउन शब्द भ्रमित करने वाला है। यह कफ्र्यू या कफ्र्यू की कवायद की तरह है। प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को बहुत कुछ कहा। कुछ देेशों ने ही इस तरह कड़ा लॉकडाउन किया है। योजना न होने की वजह से स्थितियां बदतर हो रही हैं। लॉकडाउन की घोषणा के समय किसी राहत की घोषणा नहीं की गई। विस्थापित मजदूरों के संकट ने भी सरकार को आश्चर्यचकित कर दिया है। योजना के बिना फौरी तौर पर नुकसान की भरपाई की कोशिश ने हमें नोटबंदी की याद दिला दी है। उसे भी खराब स्थिति है।


क्या सरकार ने श्रमिकों व गरीबों की आवाजाही के मसले का सही प्रबंधन नहीं किया? क्या श्रमिकों को अपने घर में ठहरने की अपील और राज्योंं की ओर से कड़े कदम उठाने के निर्देश प्रभावी होंगे?

साफ कहें तो बहुत कम लोगों ने विस्थापितों की समस्या की कल्पना की थी। विस्थापित मजदूरों को उनके घर जाने का वक्त दिया जाना चाहिए था, या उन्हें जहां रह रहे हैं वहां सुविधाएं दी जानी चाहिए थी। केंद्र सरकार ने न इसके मानवीय पहलू पर विचार किया, न स्वास्थ्य संकट पर। विस्थापित मजदूरों के साथ जोर जबरदस्ती की गई, इससे स्थिति और खराब हुई है और अब उनकी तरफ से सहयोग मिलना मुश्किल हो गया है। नए आदेश को लागू करना कठिन होगा।


सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये का पैकेज दिया है, यह  अपर्याप्त कैसे है?

पहली बात तो यह है कि यह 1.7 लाख करोड़ रुपये का पैकेज नहीं है। जब आप छूट और आंकड़ों की बाजीगरी पर विचार करें तो यह 1 लाख करोड़ रुपये पर आ सकता है। दूसरे गरीब परिवारों को हस्तांतरण बहुत कम लोगों तक है। बगैर राशनकार्ड वाले परिवारों को सिर्फ 500 रुपये प्रति माह मिलेंगे, अगर वे जनधन योजना खाते में पैसे पा जाते हैं। इतने पैसे में एक परिवार का जिंदा रह पाना असंभव है। तीसरा, पैकेज में आफातकालीन राहत का प्रावधान नहीं है, चाहे वह विस्थापित मजदूरों की बात हो, या इस दायरे में आने वाले अन्य लोगों का। यह इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।


क्या सार्वजनिक वितरण प्रïणाली (पीडीएस) से जुड़ा मसला भी है?

बड़ा मसला पीडीएस के रुक जाने को लेकर है। इस समय अर्थव्यवस्था ठहर गई है। राज्य के अधिकारी तनाव में हैं और सरकारी कर्मचारी संक्रमण को लेकर डरे हुए हैं। ऐसे में पीडीएस का काम करना या सही तरीके से चलना कठिन हो सकता है। अगर इस शृंखला में कहीं भी बाधा पहुंचती है तो बड़ी संख्या में लोग भूखे रह जाएंगे। एक और समस्या यह है कि बड़ी संख्या में गरीब लोग अभी पीडीएस से बाहर हैं।


नकद अंतरण में क्या मसला है?

इस स्थिति में नकद अंतरण से मदद मिल सकती है, लेकिन ज्यादातर लोग पैसे पहुंचाने की चुनौतियों को कम करके आंक रहे हैं। मैंने इस मसले पर गंभीर चर्चा नहीं देखी। गरीब लोगों के पास सामान्यतया पेडीएम जैसी फैंसी भुगतान प्रणाली नहीं होती, यहां तक कि एटीएम कार्ड भी नहीं होते। वे नकद निकासी के लिए बैंक शाखाओं या बिजनेस करेस्पांडेंट्स पर निर्भर हैं। लेकिन बिजनेस करेस्पॉन्डेंट की व्यवस्था इस समय स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या बन गई है क्योंकि यह ङ्क्षफगर प्रिंट से प्रमाणन से जुड़ी व्यवस्था है। अगर बिजनेस करेस्पॉन्डेंट काम नहीं करते तो लॉकडाउन से राहत मिलने पर बैंंक शाखाओं में भीड़ जमा होगी। बैंक में नोटबंदी जैसी स्थिति बन जाएगी। और अगर लोग पैसे निकाल नहीं सकते तो उनके खाते में पैसे डालने का कोई मतलब नहीं है। बेहतर योजना बनाकर इस समस्या से कुुछ हद तक निपटा जा सकता है, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि सरकार इस पर कुछ कर रही है।


पैकेज से इतर क्या हो सकता है?

वित्त मंत्री के राहत पैकेज में आपातकालीन सहायता की कोई व्यवस्था नहीं है, जो भूख के जोखिम को लेकर हो। ज्यादातर कदम लॉकडाउन के बाद प्रभावी होंगे। अगर आपातकालीन व्यवस्था नहीं की गई तो लाखों लोग भुखमरी की स्थिति में होंगे। यहां तक कि लॉकडाउन के बाद भी तमाम लोग राहत पैकेज से बाहर होंगे क्योंकि उनके पास राशन कार्ड या आधार से जुड़ा बैंक खाता नहीं है। आपातकालीन सहायता का प्रारूप अलग होगा, जिसमें खाना खिलाने के केंद्रों, घर ले जाने का राशन देने, ग्राम पंचायतों के आपातकालीन फंड आदि जैसे कदम होते। तमाम राज्य इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें केंद्र के सहयोग की जरूरत है।

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