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अपने पड़ोस की दुकान ज्यादा काम आई

सुरजीत दास गुप्ता /  03 31, 2020

क्या संकट की इस घड़ी में जरूरी सामान खासकर खाद्य और किराने के सामान के वितरण में ई-कॉमर्स की भूमिका को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया जा रहा है? लॉकडाउन के पहले हफ्ते अधिकांश ई-कॉमर्स कंपनियां पूरे सप्ताह लोगों को सामान की आपूर्ति करने में नाकाम रहीं लेकिन इसके बावजूद देश में कोई गंभीर संकट पैदा नहीं हुआ। इसका श्रेय देशभर में फैली 1.1 करोड़ छोटी-बड़ी दुकानों और 3 लाख से अधिक वितरकों और थोक विक्रेताओं को जाता है। इस तथ्य से साफ है कि देश में ई-कॉमर्स की भूमिका बेहद सीमित है और इसे बढ़ाचढ़ाकर दिखाया जाता है। इसकी वजह साफ है। वैश्विक कंसल्टैंसी फर्म केएसए टेक्नोपैक के मुताबिक ई-कॉमर्स कंपनियां देशभर में सालाना केवल 2.5 अरब डॉलर का खाद्य पदार्थ और परचून का सामान बेचती हैं जो देश में इसके कुल बाजार की तुलना में बेहद मामूली है। 2019-20 में देश में खाद्य और परचून के सामान की सालाना बिक्री 550 अरब डॉलर रही थी।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि शहरी इलाकों में ई-कॉमर्स कंपनियों की बड़ी भूमिका है लेकिन इसे भी बढ़ाचढ़ाकर दिखाया जाता है। केएसए टेक्नोपाक के मुताबिक इन कंपनियों की खाद्य और किराना उत्पादों की 80 फीसदी बिक्री छह महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलूरु और हैदराबाद में होती है जो करीब 2 अरब डॉलर है। खाद्य और परचून के सामान की कुल खपत में इन छह शहरों की हिस्सेदारी इन उत्पादों के कुल सकल माल मूल्य (जीएमवी) के 35 फीसदी यानी करीब 192 अरब डॉलर है। कुल मिलाकर इन छह शहरों में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी खाद्य पदार्थों और परचून के सामान की सालाना बिक्री का महज 1.04 फीसदी है।

केएसए टेक्नोपैक के चेयरमैन अरविंद सिंघल ने कहा, 'देश में ई-कॉमर्स के कुल आकार को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया है जबकि ऐसा नहीं है। इनका बाजार बहुत छोटा है। परचून और खाद्य श्रेणी में तो यह और भी छोटा है। इसमें कोई शक नहीं है कि ई-कॉमर्स की अपनी भूमिका है लेकिन संकट की इस घड़ी में लोगों को जरूरी सामान की आपूर्ति जारी रखने में पड़ोस की छोटी-बड़ी दुकानें अहम भूमिका अदा कर रही हैं।'  केएसए के मुताबिक देश में ई-कॉमर्स का कारोबार महज 20 अरब डॉलर का है जो 2019-20 में देश में मर्केंडाइज की कुल बिक्री का महज 2.4 फीसदी है। कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए देशभर में लागू किए गए लॉकडाउन में लोगों को खाद्य पदार्थों, परचून के सामान और दवाओं की जरूरत होती है। खाद्य और परचून के सामान की आपूर्ति में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी महज 2.5 अरब डॉलर और दवाओं में करीब 10 करोड़ डॉलर है। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक्स, टिकाऊ सामान, मोबाइल (12-13 अरब डॉलर) और परिधान (2-2.5 अरब डॉलर) बाजार में ई-कॉमर्स कंपनियों की उल्लेखनीय भूमिका है लेकिन लॉकडाउन में ये लोगों की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं हैं।

सिंघल कहते हैं कि गुरुग्राम जैसे कुछ उच्च धनाढ्य शहरी इलाकों में आवश्यक सामान की आपूर्ति को लेकर दबाव है क्योंकि योजनाकारों ने पड़ोस की किराना दुकानों के बारे में नहीं सोचा और उनकी जगह मॉल संस्कृति को बढ़ावा दिया। इन मॉल में खाद्य पदार्थों और किराने के बड़े-बड़े स्टोर हैं। लेकिन सभी मॉल बंद होने के कारण बिग बाजार जैसे बड़े संगठित खाद्य एवं किराना स्टोर को भी शटर गिराना पड़ा जिससे उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ गया।

केएसए लॉकडाउन के बाद खुदरा क्षेत्र की क्या स्थिति देखती है? उसे लगता है कि खाद्य और किराना दुकानों की बिक्री पर कोई खास असर नहीं दिखता है। लेकिन कपड़ा निर्यातकों के निर्यात ऑर्डर बड़ी संख्या में रद्द हो रहे हैं और वे इसे छूट के साथ घरेलू बाजार में उतार सकते हैं। इससे किफायती दाम वाले दुकानदारों की बिक्री बढ़ेगी। लेकिन बड़े ब्रांडों और स्टोरों के कारोबार पर पहली तिमाही में व्यापक असर पड़ेगा।

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