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कोविड-19 महामारी के दूसरे खतरे भी कम हानिकारक नहीं

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  March 31, 2020

महामारी, इसके आर्थिक दुष्परिणाम और उनसे निपटने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की प्रकृति दुनिया भर के समाजों एवं राजनीति को प्रभावित करेगी। यह तो तय है लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि वे किस तरह असर डालेंगे। यह कहना कहीं बेहतर है कि इसका असर अनिश्चित है। महामारी के चलते होने वाले बदलाव और उनका बेहतर या बदतर होना इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम इससे जुड़े खतरों को लेकर जागरूक हैं?

संकट हमेशा परिवर्तन लेकर आते हैं। अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 को हुए आतंकी हमले ने दुनिया के बड़े हिस्से को 'आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध' की तरफ धकेला था। उस समय भू-आर्थिक व्यवस्था की भिन्नताओं को कायम रहने दिया गया क्योंकि एक नतीजे के तौर पर उन्हें नजरअंदाज किया गया और हर जगह नागरिक स्वतंत्रताएं बाधित की गईं। 2008 के वित्तीय संकट के बाद सरकारें एवं केंद्रीय  बैंक अधिक सक्रिय हुए, अभिजनवाद-रोधी और विशेषज्ञता एवं अर्थशास्त्र के लिए तिरस्कार बढ़ा और उदारवादी व्यवस्था को चुनौती देने के लिए चीन को मिसाल के तौर पर पेश किया जाने लगा।

लेकिन यह संकट पहले जैसा नहीं है। इसमें कोई स्पष्ट खलनायक नहीं है, चाहे वह जिहादी आतंकवादी या वित्तपोषक हो और पिछली महामारी में सकुशल बच निकले लोग भी अब शायद ही जीवित हैं। वर्ष 1918 में दुनिया में कहर बरपाने वाली फ्लू महामारी तत्कालीन इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध के बाद ही उभरी थी। करीब 2 करोड़ लोगों की जान लेने वाले विश्व युद्ध को तत्कालीन विश्व में फैली अशांति, विस्थापन एवं नैतिक पतन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, न कि इससे दोगुनी संख्या में जान लेने वाली फ्लू महामारी को। लिहाजा हमारे पास महामारियों के असर को लेकर पूर्वानुमान लगाने का कोई ठोस आधार नहीं है।

फिर भी ऐसे संकटपूर्ण हालात में कुछ बातें अक्सर घटित होती हैं और असल में वैसा होने भी लगा है। पहली बात, राजनीतिक विज्ञानी इसे 'रैली अराउंड द फ्लैग' प्रभाव कहते है: संकट के क्षणों में, खासकर अगर संकट की उत्पत्ति विदेश से मानी जा रही है तो घरेलू नेतृत्व के लिए समर्थन बढ़ जाता है। दुनिया भर में अलग तरह के नेताओं के लिए जन-समर्थन तेजी से बढ़ा है। एक सर्वे के मुताबिक, फ्रांस के 50 फीसदी से अधिक लोग उदारवादी इमैनुअल मैक्रों के कदमों का समर्थन कर रहे हैं। उनके जैसे दूसरे लोकलुभावन नेताओं की भी रेटिंग में खासी उछाल देखी गई है। यहां तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रति समर्थन भी बढ़ा है।  संकट की स्थिति में ऐसा होना असामान्य नहीं है लेकिन विगत संकटों के निहितार्थों से हुआ संपर्क हालात को काफी खतरनाक बना देता है। वर्ष 2008 के बाद से ही दुनिया भर में लोकलुभावन नेताओं की संख्या बढ़ी है और 9/11 के बाद से नागरिक स्वतंत्रता को कमजोर करने की कोशिशें भी होती रही हैं और ये दोनों बातें इस महामारी से उपजे डर के साथ अरुचिकर गठजोड़ बना सकती हैं। हरेक मजबूत नेता, हरेक लोकलुभावन नेता, हरेक सर्वाधिकारवादी और बहुसंख्यकवादी निरंकुश शासक के पास एक जैसा मौका है: समाज में बढ़ी घबराहट का फायदा उठाते हुए खुद को अधिक सशक्त बनाना। फिलीपींस के राष्ट्रपित रोड्रिग दुतेर्ते और थाईलैंड के प्रच्युत चानओचा ने तो आपातकाल की घोषणा कर भी दी है जबकि हंगरी के विक्टर ऑर्बन ने आपातकाल की अवधि बढ़ाने की मांग की है।

हमें इसे एक खास तरह के नेता के महज उभार के संदर्भों में भी नहीं देखना चाहिए। घबराहट में होने पर नागरिक अपनी स्वतंत्रताओं पर लगाई जाने वाली पाबंदियों या अवरोधों को भी यह मानकर स्वीकार कर लेते हैं कि यह अस्थायी होगा लेकिन वे स्थायी बन जाते हैं। मसलन, 9/11 हमले के बाद फोन-टैपिंग बहुत आसान बात हो गई है। लेकिन एक महामारी के बाद निजता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर पैदा होने वाले संस्थागत खतरे काफी गंभीर हो सकते हैं। एक सरकार के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा के समय आपकी आवाजाही पर नजर रखने लायक बनना अच्छा है लेकिन अगर इस ढांचे का दुरुपयोग बाद में दूसरे मकसद के लिए किया जाए तो क्या होगा? अगर वायरस एवं संक्रमण का डर यात्रा करने वालों पर स्थायी नियंत्रण या सार्वजनिक स्थलों तक प्रवेश के बारे में मनमाने निर्णय लेने का बहाना बन जाता है।

फिर निगरानी एवं निजता का मुद्दा भी है। फाइनैंशियल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में युआल नोआ हरीरी ने इस बात को लेकर आगाह किया है कि यह महामारी निगरानी रखने वाले राज्य के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है। हरीरी कहते हैं, 'इसकी वजह यह नहीं है कि अभी तक निगरानी के व्यापक उपकरणों को नकारते आ रहे देशों में भी इनका इस्तेमाल सामान्य बात हो सकती है। इसकी वजह यह है कि यह 'ओवर द स्किन' निगरानी के बजाय 'अंडर द स्किन' निगरानी का नाटकीय बदलाव धारण कर लेगा।' सामाजिक नियंत्रण के दुष्प्रभाव काफी परेशान करने वाले हैं। हरीरी की मानें तो, 'कफ की पहचान करने वाली तकनीक का ही इस्तेमाल लोगों की हंसी को पहचानने में भी किया जा सकता है। अगर कंपनियां एवं सरकारों ने हमारे बायोमेट्रिक डेटा का व्यापक उपयोग करना शुरू कर दिया तो वे हमारे बारे में हमसे कहीं बेहतर ढंग से जानने लगेंगी। फिर वे न केवल हमारे मनोभावों का अनुमान लगा सकेंगी बल्कि हमारी भावनाओं को प्रभावित भी कर सकेंगी और जिस वस्तु या नेता को चाहें, हमें बेच सकती हैं।' महामारी अपने-आप में एक अभूतपूर्व खतरा है। अगर हम सजग नहीं हैं तो हम अपनी गलतियों के लिए एक पीढ़ी तक इसकी कीमत चुकाएंगे। अगर हम सजग नहीं हैं तो हम बड़ी मुश्किल से हासिल अधिकारों को भी गंवा बैठेंगे। और अगर हम बुद्धिमान नहीं हैं तो हम उन्हीं नेताओं के प्रति भरोसा जताएंगे और उन्हें आगे बढ़ाएंगे जिन्होंने इस महामारी से निपटने के लिए देरी से कदम उठाए हैं।

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