बिजनेस स्टैंडर्ड - शासन और राजनीति का आपसी रिश्ता
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शासन और राजनीति का आपसी रिश्ता

नितिन देसाई /  March 31, 2020

भारत के लिए न तो विकास का नेहरू युगीन तौर तरीका सही है और न ही चीनी मॉडल। हमें निजी क्षेत्र के लिए जगह बनानी होगी। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं नितिन देसाई

अच्छे शासन के लिए अच्छी राजनीति की आवश्यकता होती है और फिलहाल हमारे यहां उसकी काफी कमी है। आज हमारी राजनीतिक प्रक्रिया घृणास्पद भाषणों से भरी हुई है जो समुदायों को बांटते हैं और उनके बीच हिंसा को बढ़ावा देते हैं। राजनीतिक दलों के बीच कटु रिश्ते और केंद्र तथा राज्य के बीच के मतभेद इसी वजह से हैं। सरकार कोरोनावायरस से निपटने के लिए जो उपाय अपना रही है वे देश को एकजुट करने में मददगार हो सकते हैं। परंतु प्रमाण यही सुझाते हैं कि जब संकट समाप्त हो जाए तो हम दोबारा उसी खेल में उलझ जाएंगे।

हमारी राजनीति विभिन्न विषयों पर निर्णय लेने और हितों के टकराव के बीच व्यापक सहमति कायम करने में नाकाम रही है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में किसी एक समुदाय, एक भाषा अथवा एक क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया नाकाम है।

चीन में एक दल की तानाशाही है। चीन में उइघर और तिब्बती जैसे अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ मसले हैं लेकिन चीन की आबादी का 92 फीसदी एक ही जातीय समूह हान से संबंधित है जिसकी भाषा और संस्कृति साझा है। हमारा देश अलग है। हम जातीयता, भाषा, धर्म और संस्कृति में विविधता वाले हैं और हमारे यहां इनके हितों का प्रतिनिधित्व विभिन्न राजनीतिक दल करते हैं।

इससे केंद्र-राज्य संबंध और जटिल हो जाते हैं। इसलिए क्योंकि आर्थिक के साथ-साथ सांस्कृतिक रिश्तों को भी सुसंगत बनाना होगा। चीन के उलट भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां चीजें बंद पार्टी बैठकों में नहीं बाहर तय होती हैं। हमारी राजनीतिक निष्क्रियता निकट भविष्य में दूर होती नहीं दिखती।

इस निराशाजनक परिदृश्य को देखते हुए भारत नेहरूयुगीन उद्यमिता वाले राज्य या चीन के राज्य समर्थित आर्थिक विकास की राह नहीं अपना सकता। हमें ऐसी शासन व्यवस्था पर भरोसा करना होगा जो सरकार के विवेकाधीन अधिकारों को सीमित करे और निजी बचत पर अपने मसौदे को सीमित करे ताकि निजी क्षेत्र की वृद्धि की गुंजाइश बन सके।

शासन की सबसे तात्कालिक समस्या है लोकलुभावनवाद का प्रबंधन करना। चुनावी राजनीति की प्रतिस्पर्धी प्रकृति को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें लोकलुभावन खर्च पर जोर देती हैं ताकि मतदाताओं को रियायती दर पर अधिकतम लाभ दिया जा सके। सुशासन के लिए आवश्यक है कि पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए और अच्छे बुरे के बीच भेद किया जाए। पहली आवश्यकता तो यही है कि लाभकारी आपूर्ति व्यवस्था व्यवस्थित तरीके से शुरू की जाए ताकि संसाधनों और क्रियान्वयन के क्षेत्र में जरूरी संसाधन चिह्नित किए जा सकें। चुनावी लाभ के लिए बड़े लक्ष्यों की घोषणा और बाद में उन्हें हासिल करने की कोशिश करना बरबादी की ओर ले जाता है। दूसरी जरूरत है वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था का सावधानीपूर्वक विश्लेषण। शायद नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजित बनर्जी और एश्टर डफलो द्वारा सुझाई गई राह पर चलकर ऐसा किया जा सकता है। परंतु सबसे अहम आवश्यकता है घाटे को लेकर कड़े प्रवर्तन का। हकीकत में अब शायद वक्त आ गया है कि सरकारी क्षेत्र की ऋण आवश्यकता की सीमा तय की जाए।

लोकलुभावनवाद को राजकोषीय अनुशासन से जोडऩा पहला कदम होना चाहिए। इस लोकलुभावनवाद की काफी भरपाई शासकीय संपत्ति की बिक्री और संसाधन अधिकार आवंटन से होती है। हमें बजट व्यय और सरकार की भूसंपदा, राजस्व कमाने वाले बुनियादी ढांचे, संसाधन अधिकार और वाणिज्यिक उपक्रमों के बीच दूरी कायम करनी होगी। इन संपत्तियों की बिक्री से हासिल राशि सीधे बजट व्यय के लिए नहीं दी जानी चाहिए। उसका इस्तेमाल निजी उद्यमिता को प्रोत्साहन देने में किया जाना चाहिए। इससे संपत्ति का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित होगा।

निजी क्षेत्र, शासकीय क्षेत्र की तुलना में बेहतर ढंग से विकास कार्य कर सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए निजी और शासकीय क्षेत्र के तालमेल में बदलाव लाना होगा और निजी क्षेत्र के बीच प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना होगा।

इसके लिए ऐसे संस्थागत सुधारों की आवश्यकता होगी जो चुनावी दृष्टि से आकर्षक नहीं होते और अल्पकालिक लाभ की तलाश करने वाली सरकारें जिसकी अनदेखी कर सकती हैं। इसके बावजूद बिना विकास संभावनाओं के हम आगे आने वाली राजनीतिक उथलपुथल से नहीं निकल सकते। शायद नीति आयोग संस्थान इस दिशा में मददगार साबित हो सकते हैं।

सुधार की आवश्यकता सरकार और निजी क्षेत्र दोनों ओर है। सरकारी स्तर पर तीन स्तरों वाला एजेंडा बनाना होगा।

♦ सरकारी वाणिज्यिक उपक्रमों, खासकर वित्तीय संस्थानों को स्वशासित संस्थानों में बदलना जो राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हों और पूंजी बाजार के निर्णयों के अधीन हों।

सरकारी नियंत्रण वाली जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को नीलामी जैसी पारदर्शी प्रक्रिया से आवंटित करना।

प्रतिस्पर्धा और एकाधिकार का नियमन करने वाले कानूनों को मजबूत बनाना और राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त करना।

भारत में कारोबारी जगत आज भी पुरानी प्रबंधन एजेंसी व्यवस्था की तरह काम करता है। कारोबारी जगत वैश्वीकरण और व्यापक प्रसार के बजाय ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता है। भारत की एक बड़ी कंपनी ने पेट्रोकेमिकल से दूरसंचार, खुदरा कारोबार और व्यापक मीडिया तक प्रसार किया है लेकिन इस ढांचे में भी कॉर्पोरेट नीति विशिष्ट फर्म के हित के बजाय सामूहिक हित दर्शाती है।

अच्छी बात है कि ऐसे समूहों को अब नई स्वतंत्र कंपनियां चुनौती दे रही हैं। यह चुनौती बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि, जैव प्रौद्योगिकी, ई-कॉमर्स और वाहन आदि क्षेत्र में सामने आ रही हैं। उदारीकरण के बाद इन क्षेत्रों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। हमें इसी की आवश्यकता है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये कैसे होगा?

इसके उत्तर का एक हिस्सा क्रॉस होल्डिंग तथा एक बड़े समूह की भीतर कंपनियों की वाणिज्यिक व्यवस्था को लेकर बने कानूनों को मजबूत बनाने में भी निहित है। उत्तर का दूसरा हिस्सा जबरन अधिग्रहण(सीधे अंशधारकों से संपर्क करके हिस्सेदारी खरीदना) को आसान बनाना है। परंतु सबसे बड़ा प्रभाव बड़े संस्थागत अंशधारकों की ओर से आ सकता है जो कॉर्पोरेट प्रबंधन में एक हद तक जवाबदेही प्रवर्तित करता है। कंपनियों को प्रवर्तक प्रबंधकों द्वारा चलाना जारी रखा जा सकत है। यह समस्या नहीं है। असली आवश्यकता है कंपनियों को समूह के हितों से अलग करना।

उद्यमिता वाले राष्ट्र से दूरी बनाने का अर्थ यह नहीं है कि विकास में सरकार की कोई भूमिका ही नहीं होगी। बल्कि उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रदूषण प्रबंधन और शहरी विकास में उसकी भूमिका और महत्त्वपूर्ण हो जाएगी। यदि कोई वाम या मध्यमार्गी झुकाव वाला कोई अर्थशास्त्री अब बाजार अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका के खिलाफ तर्क देता है तो ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार दीर्घकालिक नजरिया अपनाना छोड़ चुकी है। वह अल्पकालिक चुनावी लाभ को ध्यान में रखकर काम करती है।

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