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भारत में मंदी की संभावना नहीं, 2020-21 की दूसरी तिमाही से अर्थव्यवस्था में होगा सुधार

इंदिवजल धस्माना /  March 30, 2020

बीएस बातचीत

केंद्र सरकार की ओर से 1.7 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा को कोविड-19 से उपजे संकट को देखते हुए पर्याप्त नहीं माना जा रहा है और इसकी आलोचना हो रही है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने इंदिवजल धस्माना से बातचीत में कहा कि पैकेज देने के तरीके का इस्तेमाल किया गया है और अगर जरूरत पड़ी तो और भी पैकेज के बारे में विचार हो सकता है। प्रमुख अंश..

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज सहित कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सरकार का पैकेज पर्याप्त नहीं है। क्या आपको लगता है कि और ज्यादा की जरूरत है और वह आएगा?

अगर आप भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पैकेज को भी शामिल कर लें तो कुल राशि करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये है। दोनों पैकेजों को एक साथ करके देखा जाना चाहिए क्योंकि राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां साथ साथ काम करती हैं। कुल पैकेज देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2 प्रतिशत है। वित्त मंत्री (निर्मला सीतारमण) ने साफ कहा है कि हमने वगीकृत दृष्टिकोण अपनाया है। अगर और ज्यादा की जरूरत होगी तो सरकार उसके मुताबिक काम करेगी। वगीकृत दृष्टिकोण में साधारण रूप से राजकोषीय सदाचार बनाए रखने की कवायद की जाती है और नियमों से इतर हटकर कुछ नहीं किया जाता है। यह वर्गीकृत दृष्टिकोण है, जरूरत पडऩे पर आगे और कदम उठाए जा सकते हैं।


कर्ज की मांग बहुत कम है, ऐसे में क्या रिजर्व बैंक के नकदी बढ़ाने के तरीके का फायदा होगा?

रिजर्व बैंक की इस बात के लिए आलोचना हो रही थी कि वह पर्याप्त नकदी की व्यवस्था नहीं कर रहा है। ्हम यह है कि रिजर्व बैंक ने रिवर्स रीपो रेट घटाकर बैंकों को कर्ज देने के लिए प्रोत्साहित किया है और कर्जदाताओं को किस्त राहत दी है। नकदी के हिसाब से देखें तो रिजर्व बैंक के पास प्राथमिक हथियार है। जब मांग बढ़ेगी तो बैंक इस स्थिति में होंगे कि वे अग्रिम दे सकें। कर्ज की मांग में सुस्ती हमेशा नहीं बनी रहने वाली है। उम्मीद है कि यह कम अवधि की बात है। इसके पहले बैंकों से कर्ज लिए जाने की रफ्तार तेजी से कम हुई और यह धारणा उलटने की जरूरत है। अब रिजर्व बैंक ने ऐसे कदम उठाए हैं कि स्थिति में बदलाव आए और यह कुछ तिमाहियों में नजर आएगा। जबतक यह लॉकडाउन रहता है कर्ज की पूछताछ बहुत ज्यादा रहेगी, कर्ज लेने वो कम रहेंगे। नीति आयोग ने ऐसा कई मौकों पर पाया है।


लेकिन रिजर्व बैंक के ज्यादातर कदम सिर्फ 3 महीने के लिए हैं?

इनका कभी भी विस्तार हो सकता है।


तमाम अनुमान आ रहे हैं, जिसमें 2020-21 या कैलेंडर वर्ष 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति निराशाजनक रहने का अनुमान लगाया गया है। उदाहरण के लिए मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने 2020 में वृद्धि तीन दशक के निचले स्तर 2.5 प्रतिशत पर रहने का अनुमान लगाया है। आपका क्या अनुमान है?

जो लोग ये सालाना जीडीपी वृद्धि के अनुमान लगा रहे हैं, वे बहुत बहादुर हैं, मैं नहीं। यह कहना बेहतर होगा कि वे लोग उतावले हैं, मैं नहीं। घरेलू व वैश्विक बाजार में अनिश्चितता को देखते हुए मुझे लगता है कि 2020-21 की वृद्धि का अनुमान लगाना जल्दबाजी है। यह वारयस जनित संकट के प्रसार और उसकी अवधि पर निर्भर है। मैं इस आपदा के बारे में मौजूदा स्थिति में अनुमान नहीं लगा सकता। एक ही बात मैं कह सकता हूं कि मंदी में भी वैश्विक अर्थवस्था बेहतर रह सकती है, जैसा कि केनेथ रोगोफ ने कहा है। लेकिन जहां तक भारत का प्रश्न है, मैंं उम्मीद कर रहा हूं कि मौजूदा संकट जून के अंत तक खत्म हो सकती है और वित्त वर्ष 21 की दूसरी तिमाही में रिकवरी और वृद्धि हो सकती है। मैं यह उम्मीद नहीं करता कि लगातार दो तिमाहियों में ऋणात्मक वृद्धि रहेगी, जो मंदी की परिभाषा है। इस तरह से मुझे नहीं लगता कि भारत की अर्थïव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है।


इसका मतलब यह है कि अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी में संकुचन होगा?

मैं इसे लेकर निश्चित रूप से कुछ नहींं कह सकता। लेकिन अप्रैल-जून तिमाही पर इस लॉकडाउन का असर रहेगा। मैं अनुमान का जोखिम नहीं उठा रहा हूं।


रोजगार पर बंदी का गंभीर असर है। अगर अर्थव्यवस्था में वित्त वर्ष 21 की दूसरी तिमाही में सुधार होता भी है, तो तत्काल नौकरियों का सृजन नहीं होगा। नौकरियों के सृजन में कितना वक्त लगेगा, जो चली गई हैं?

लॉकडाउन का सबसे ज्यादा असर सेवा क्षेत्र पर पड़ा है, जिनमें अनौपचारिक क्षेत्र भी शामिल हैं। अनौपचारिक क्षेत्र में बहाली की क्षमता उसी तरह से है, जिस तरह से मांग घटने पर बंदी हुई है। आप देख सकते हैं कि कृषि की स्थिति यथावत रहेगी। मुझे लगता है कि सेवा क्षेत्र में तेजी से नौकरियां आएंगी, हो सकता है कि वह पहले के स्तर पर न पहुंचें। इन क्षेत्रों में आतिथ्य सत्कार, पर्यटन और कारोबार शामिल हैं। मैं सेवा क्षेत्र में यू आकार की रिकवरी की जगह वी आकार की रिकवरी देख रहा हूं, जिसका हमारी अर्थव्यवस्था में योगदान 55 प्रतिशत है।


सरकार ने बहुत ज्यादा व्यय किया है और राजस्व नहीं आ रहा है, ऐसे में क्या राजकोषीय घाटे का लक्ष्य चूकेगा, या कोई नया खाका तैयार किया जाएगा?

यह राजकोषीय चुनौतियों पर बात करने का सही वक्त नहीं है। यह इस पर बात करने का वक्त है कि संकट को कितना कम किया जाए और रोजगार को हो रहा नुकसान कम हो और आर्थिक रिकवरी की संïभावना बेहतर हो। इस समय कोई भीदेश राजकोषीय घाटे के बारे में नहीं बात कर रहा है।


राज्यों की सीमाओं पर बड़ी संख्या में विस्थापित मजदूर जमा हैं, जो अपने घर जाना चाहते हैं। क्या इससे वायरस के फैलने की संभावना नहीं है?

यही वजह है कि केंद्र व राज्योंं की सरकारें इस बात पर जोर दे रही हैं, कि जो जहां हैं, वहीं बने रहें। जो लोग दूसरे राज्योंं में जा रहे हैं, वे किसी के लिए मददगार नहीं होने जा रहे हैं।


परिवहन सेवाएं न होने की वजह से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित है, दुकानदारों को डर है कि वे संक्रमण का शिकार हो सकते हैं?

जरूरी सामान के परिवहन के लिए तमाम कदम उठाए गए हैं। किसी व्यक्ति का डर कोई दूसरा नहीं ले सकका। इसके लिए साहस की जररूरत है। प्रधानमंत्री मोदी ने जरूरी सेवाएं मुहैया कराने वाले लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है। बड़ी संख्या में लोग जरूरी सेवाएं मुहैया करा रहे हैं। बेहतर प्रबंधन किया गया है. सरकार हर कदम उठा रही है, जिससे जरूरी सामान एवं सेवाएं हमेशा मिल सकें।

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