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कोविड-19 से जंग में किस मुकाम पर भारत?

अतनु विश्‍वास /  March 30, 2020

महामारी की तीव्र वृद्धि दर ने अस्पतालों एवं बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं को नाकाफी साबित कर दिया है। भारत में तो अभी यह अपने शुरुआती चरण में है। बता रहे हैं अतनु विश्वास

जहां दुनिया घातक कोरोनावायरस से निपटने की जद्दोजहद में लगी है, वहीं उस 'वक्र' को लेकर काफी चर्चा हो रही है जो आने वाले समय में कोविड-19 की चपेट में आने वाले लोगों की अनुमानित संख्या बताने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। घंटी के आकार वाला यह वक्र वास्तविक संख्या के बारे में न होकर पूर्वानुमान है। संक्रमण की दर पर निर्भर यह वक्र अत्यधिक तीव्र हो सकता है जिसमें यह वायरस बहुत तेजी से फैलेगा और संक्रमण के मामले बहुत तेजी से चरम पर पहुंच जाएंगे। उसके बाद यह उतनी ही तेजी से नीचे भी गिरेगा। चौतरफा इस बात को लेकर चर्चा है कि इस वक्र को चपटा करने की जरूरत है। हम इटली में जैसा देख रहे हैं, इस महामारी की तीव्र वृद्धि दर ने अस्पतालों एवं बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं को बेहद कम समय में नाकाफी साबित कर दिया है जिसकी वजह से तमाम मरीजों का इलाज भी नहीं हो पा रहा है। इस तरह वक्र को समतल करने से महामारी के प्रसार में कमी आएगी और वक्र का उठाव भी नीचे आएगा। इसके लिए सामाजिक रूप से दूर-दूर रहने (सोशल डिस्टेंसिंग) की कवायद को आक्रामक ढंग से लागू करना होगा।

एक चपटे वक्र में भी संक्रमित लोगों की संख्या उतनी ही होगी लेकिन उसकी अवधि लंबी होगी। संक्रमण की धीमी दर होने से इलाज से वंचित रहने वाले मरीजों की संख्या कम हो जाएगी। इससे अस्पतालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, पुलिस, प्रशासन और वैक्सीन तैयार करने में जुटे वैज्ञानिकों को भी संकट से निपटने के लिए अधिक वक्त मिल जाएगा। संक्रमण की ज्वारीय लहर को फैला देने से निश्चित रूप से अधिक जिंदगियां बच सकेंगी। इस तरह वक्र के उभार के बारे में समझ पैदा करना एवं उसका प्रबंधन और उसे नीचे लाने के लिए की जाने वाली कवायद किसी भी महामारी के खिलाफ जंग का एक अहम हिस्सा है।

इसकी प्रभावोत्पादकता का उदाहरण एक सदी पहले कहर बरपाने वाली महामारी स्पैनिश फ्लू (1918) के रूप में देखा जा सकता है जिसने दुनिया भर के करीब 50 करोड़ लोगों को अपनी चपेट में लिया था। अमेरिका के फिलाडेल्फिया शहर ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी को अनसुना कर दिया था जिसकी कीमत उसे छह महीनों में 16,000 निवासियों की जान देकर चुकानी पड़ी थी। वहीं अमेरिका का ही एक अन्य शहर सेंट लुई सोशल डिस्टेंसिंग की रणनीति को तत्काल लागू कर इस वायरस के वक्र को समतल करने में कामयाब रहा था। इस वजह से सेंट लुई में स्पैनिश फ्लू की वजह से 2,000 लोगों की ही मौत हुई।

एक महामारी का अहम संकेतक पुनरुत्पादन संख्या होती है जो दर्शाती है कि एक संक्रमित व्यक्ति आगे चलकर औसतन कितने लोगों को संक्रमित कर सकता है। अगर पुनरुत्पादन संख्या एक से अधिक है तो संक्रमण बहुत तेजी से एक महामारी में तब्दील हो जाता है। वहीं इस संख्या के एक से कम होने पर संक्रमण धीरे-धीरे कम होता जाता है।

इस तरह पूरी संकल्पना इस सोच पर टिकी है कि इस संख्या को जितना संभव हो सके उतना नीचे लाया जाए। सिलिकन वैली के मशहूर मार्कटिंग गुरु टॉमस पुएओ की तरफ से पेश अवधारणा 'हथौड़ा और नृत्य' काफी लोकप्रिय है। पुएओ कहते हैं कि 'हथौड़े' जैसे सख्त उपायों को शुरुआत में अपनाना चाहिए ताकि पुनरुत्पादन संख्या को जितनी जल्दी हो सके, शून्य के करीब ले जाया जाए ताकि महामारी पर काबू पाया जा सके। चीन के वुहान में जो पुनरुत्पाद संख्या 3.9 थी, वह लॉकडाउन होने के बाद घटकर महज 0.32 रह गई। जहां तक 'नृत्य' चरण का सवाल है तो वह छोटी लहरों का प्रतीक है और पुएओ के मुताबिक इस चरण में प्रवेश करने के बाद आपको सिर्फ पुनरुत्पादन संख्या को एक से नीचे रखने की कोशिश करनी होती है।

हम कोविड-19 के अलग-अलग देशों में उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करते हैं। संक्रमण का संचयी वक्र देखने में अंग्रेजी के 'एस' अक्षर जैसा लगता है। शुरुआत में हर दिन बढऩे वाले मामलों की संख्या कम होती है लेकिन एक मुकाम पर पहुंचने के बाद यह बहुत ही तेजी से बढ़ती है। वक्र का पथ यह निर्धारित करता है कि संक्रमण की संख्या किस हद तक जाएगी? 'बढ़ोतरी की दर' का मतलब रोजाना सामने आने वाले नए मामले से है। महामारी का प्रकोप तब तक जारी रहता है जब तक एक दिन में सामने आने वाले नए मामलों और उससे पिछले दिन सामने आए मामलों के बीच अंतर धनात्मक बना रहता है। जब यह फर्क ऋणात्मक हो जाता है तो वह एक बदलाव का बिंदु होता है और आम तौर पर उसका मतलब यह है कि महामारी अपने मध्य-बिंदु पर पहुंच चुकी है। उसके बाद संचयी वक्र अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार से बढ़ेगा और वह आखिर में क्षैतिज हो जाएगा। हालांकि असल जिंदगी में वक्र इतनी अच्छी तरह बरताव नहीं करते हैं।

चीन ने कथित तौर पर अब कोविड-19 महामारी पर काबू पा लिया है। गत 22 जनवरी से 22 मार्च तक के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि दक्षिण कोरिया ने भी अपनी आक्रामक सोशल डिस्टेंसिंग एवं परीक्षण रणनीति के दम पर काफी हद तक इस वायरस पर काबू पाने में सफलता हासिल की है। दक्षिण कोरिया गत 3-4 मार्च को इस महामारी के बदलाव बिंदु पर पहुंच गया था जब संक्रमणों की संख्या करीब 5,500 थी। लेकिन अब कोरिया इस महामारी के समापन काल में है और 22 मार्च को कुल संक्रमणों की संख्या 8,897 थी। पूरी संभावना है कि करीब 2,500-3,000 नए मामले सामने के बाद दक्षिण कोरिया कोविड-19 महामारी पर पूरी तरह काबू पा चुका होगा। जापान में 22 मार्च तक इस महामारी के 1,086 मामले सामने आए थे और अगर उसने हालात पर शिकंजा बनाए रखा तो अब वह बदलाव बिंदु के करीब पहुंचता दिख रहा है।

लेकिन सिंगापुर का संचयी वक्र कुछ अलग ही तस्वीर दिखाता है। इसने गत 19 फरवरी को ही बदलाव बिंदु की तरफ पहुंचने के संकेत दिखाने शुरू कर दिए थे लेकिन 5 मार्च के बाद इसमें अचानक तेजी आई है और अब भी यह मध्य-बिंदु के आसपास पहुंचता हुआ नहीं दिख रहा है। इटली की दुखद हालत इसी से बयां होती है कि वहां पर 60,000 के करीब मामले अभी तक सामने आ चुके हैं और उसके संचयी वक्र में हो रही तीव्र वृद्धि के चलते बदलाव बिंदु का कोई संकेत नहीं नजर आ रहा है। स्पेन, फ्रांस और अमेरिका में इस महामारी के संचयी वक्र भी इस समय लगातार उफान पर हैं और उनमें बदलाव बिंदु को लेकर कोई स्पष्टता नहीं दिख रही है।

जहां तक भारत का सवाल है तो फिलहाल रूस की ही तरह भारत में भी हालात बेकाबू नहीं हुए हैं लेकिन यह भी तय है कि अभी हम बदलाव बिंदु के आसपास भी नहीं हैं। वैसे कई विशेषज्ञों ने भारत के लिए एकदम अलग हालात रहने का मॉडल अपनाते हुए संक्रमित लोगों की संख्या को लेकर कई पूर्वानुमान लगाए हैं लेकिन मेरा मानना है कि भारत के लिए सटीक मॉडल को लेकर कोई अनुमान लगा पाना असंभव है। इसकी सरल वजह यह है कि हम अभी संचयी वक्र के शुरुआती चरण में हैं और भविष्य को लेकर कोई अनुमान लगा पाने के लिए हमारे पास समुचित आंकड़े नहीं हैं। पिछले छह-सात दिनों में इस वक्र का उठान काफी तीव्र रहा है। उम्मीद है कि देश भर में लॉकडाउन और कफ्र्यू जैसे हालात पैदा कर सामाजिक दूरी कायम करने में हम सफल होंगे और जल्द ही हमें इस महामारी के प्रसार का मध्य-बिंदु देखने को मिलेगा।

(लेखक भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, कोलकाता में सांख्यिकी के प्रोफेसर हैं)

Keyword: Economic, Health, Coronavirus, Lockdown, Covid-19, Pandemic, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, कोविड-19, महामारी, स्वास्थ्य,
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