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सोशल मीडिया पर दिख रही फर्जी खबरों की बाढ़

नेहा अलावधी /  March 29, 2020

कोरोनावायरस को लेकर देश भर में फैले दहशत और अफरा-तफरी के माहौल के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपनी अलग ही समस्या से जूझ रहा है। ऐसे दौर में फर्जी खबरों में तेजी आई है और हाल में जब प्रधानमंत्री ने लोगों से यह आग्रह किया था कि इस वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज में जुटे लोगों की सराहना करतल ध्वनि से की जाए तो इसे हवा को शुद्ध करने और रक्त प्रवाह में सुधार जैसे संदेशों के तौर पर व्हाट्सऐप पर साझा किया गया। इसके अलावा यह तरह की फर्जी खबरें भी फैलीं कि भारतीय लोग किस तरह कोरोनावायरस से बचने के लिए आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक उपायों पर जोर दे रहे हैं और वायरस की उत्पत्ति से जुड़े षड्यंत्र सिद्धांतों से जुड़ी कई खबरें भी साझा की

सब चीजें बंद हो रही हैं इस बीच फर्जी खबरों के उद्योग में काफी हलचल है। सबसे खराब बात यह है कि कोई भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है। उदाहरण के लिए कई मशहूर हस्तियों ने ट्वीट किया कि प्रधानमंत्री ने जानबूझकर करतल ध्वनि से सराहना का वक्त शाम 5 बजे को चुना था क्योंकि उनके मुताबिक डॉक्टरों की तारीफ के लिए जब ताली बजाई जानी थी उस वक्त देश एक विशेष नक्षत्र प्रभाव में था जो ताली बजाने जैसी प्रक्रिया से विशेष चमत्कारी शक्ति पैदा कर सकता है जिससे कोरोनावायरस से लडऩे में मदद मिलेगी। मशहूर हस्तियों के सैकड़ों हजारों फॉलोअर ने पोस्ट को साझा किया और उसे रिट्वीट भी किया जिसके बाद ट्विटर और पीआईबी हैशटैग चलाकर इस तरह की धारणाओं को खारिज कर दिया। यह तो महज एक शुरुआत ही थी। कोरोनावायरस के घरेलू उपायों से जुड़े संदेश भी व्हाट्सऐप पर घूम रहे हैं जिसमें यह दावा किया गया है कि वायरस को मारने का यह आजमाया तरीका है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने सोशल मीडिया मंचों को लिखा कि वे 'अपने उपयोगकर्ताओं को सूचित करें कि वे सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली किसी भी जानकारी साझा करने, उसे दिखाने, अपलोड, संशोधित,  प्रसारित करने, अपडेट या साझा न करें।'

मीडिया मंचों के लिए यह अच्छा वक्त है। चिंता के इस दौर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल ज्यादा होता है और ऐसे वक्त में जानकारियों के सभी पहलू की सत्यता की जांच करना मुश्किल है। वर्तमान संकट को देखते हुए कुछ नहीं करना विकल्प नहीं है क्योंकि इन मंचों ने भी पिछले साल का अधिकांश हिस्सा देश में भरोसा कायम करने के अभियान चलाने में बिताया है।

इस समस्या से लडऩे की रणनीति के तहत मंचों ने भरोसे की समस्या को आउटसोर्स करने का फैसला किया है। वे इस सोशल मीडिया हैंडल को उन विशेषज्ञों को देना चाहते हैं जो फॉरवर्ड को बेहतर बना सकते हैं।

चीन की कंपनी बाइटडांस के स्वामित्व वाले टिकटॉक ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ गठजोड़ किया है। डब्ल्यूएचओ जानकारीपूर्ण वीडियो पोस्ट करता है और यह कोविड-19 पर आधारित दो लाइवस्ट्रीम 17 और 19 मार्च को कर चुका है। इसे करीब 70 बाजारों के लगभग 350,000 उपयोगकर्ताओं ने देखा था। ट्विटर पर कोविड-19  या कोरोनावायरस (और अन्य संबंधित जानकारी) से जुड़ी जानकारी के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडल्ब्चू) या डब्ल्यूएचओ से जुडऩा होता है।

फेसबुक और इंस्टाग्राम ने भी अब ऐसा ही विकल्प दिया है। गूगल ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ करार किया है और कोरोनावायरस से बचने के लिए प्रमुख सावधानियां बरतने के लिए एक अभियान 'डू दि फाइव' शुरू किया। इसने इस जानकारी को देश में एंड्रॉयड और आईओएस (ऐपल) के उपयोगर्ताओं के गूगल ऐप पर भी नोटिफिकेशन के जरिये देने की बात कही है।

यूट्यूब पर गूगल के होमपेज पर एक प्रमोशनल कार्ड है जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट से जुड़ता है ताकि रोजमर्रा की सूचनाएं मिलती रहें।

यहां सर्च नतीजे में कोरोनावायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ जैसे विश्वसनीय स्रोत से मिलने वाली सूचनाएं और वीडियो भी दिखते हैं। इसके अलावा कुछ घर से काम करने वाले लोगों के लिए वायरस संक्रमण को रोकने जैसे विषयों पर कुछ प्लेलिस्ट भी दिखाया जा रहा है।

फेसबुक के स्वामित्व वाली कंपनी व्हाट्सऐप ने इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ साझेदारी की है ताकि वायरस से जुड़ी चिंताओं के लिए एक चैटबॉट शुरू किया जा सके। इसने वैश्विक स्तर पर भी डब्ल्यूएचओ के साथ ऐसा किया है।

पिछले हफ्ते माइगव कोरोना हेल्पडेस्क भी शुरू किया गया जो आईवीआर जैसे इंटरफेस पर काम करता है जो यूजरों को सूचनाएं चुनने की अनुमति देता है जो वे दिए गए विकल्पों में से चुन सकते हैं।

ट्विटर और टिकटॉक पर पोस्ट किए जाने वाले अभियानों और चुनौतियों को डब्ल्यूएचओ भी समर्थन दे रहा है और स्थानीय सरकार भी इसके लिए समर्थन दे रही है। हालांकि बड़े ब्रांड की मार्केटिंग टीमों ने भी कुछ पहल की है। कुछ पहल वैश्विक स्तर की है जिसमें सेफहैंड हैशटैग वाली चुनौती। इनमें से कुछ को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है जबकि कुछ का समर्थन बड़े ब्रांड कर रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सोशल मीडिया मंचों ने संवाद पर नियंत्रण करते हुए प्रोटोकॉल का पालन कर रही है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह इतना पर्याप्त है?

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