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मीडिया उद्योग के लिए अस्तित्व का सवाल

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  03 29, 2020

कोरोनावायरस संकट से प्रिंट, रेडियो, फिल्म या डिजिटल फर्मों पर कितना असर पड़ेगा, यह तीन बातों पर निर्भर करता है।

पहली बात यह है कि उनकी वित्तीय स्थिति कितनी मजबूत है और नकदी प्रवाह कैसा है। उदाहरण के लिए, देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन पीवीआर सिनेमाज ने पिछले साल शेयर बेचकर 500 करोड़ रुपये जुटाए थे। यह संयोग ही है कि कोरोनावायरस संकट से कुछ ही महीने ऐसा हुआ। हालांकि कंपनी की स्थिति पहले से काफी मजबूत थी लेकिन पूंजी जुटाने से वह कारोबार बंद होने से उत्पन्न अनिश्चितता का मुकाबला कर पाएगी। 3,118 करोड़ रुपये राजस्व के साथ पीवाआर देश की दस सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक है। इनमें डिज्नी-स्टार, टाइम्स ग्रुप, गूगल इंडिया और दूसरी कई कंपनियां शामिल हैं। लंबे समय तक कामबंदी, कर्मचारियों को बनाए रखने और निर्धारित लागत को वहन करने के मामले में कंपनी बेहतर स्थिति में है। लेकिन एक या दो स्क्रीन चलाने वाली छोटी कंपनियों के लिए धंधा चौपट होने के कारण कर्मचारियों को वेतन, किराया और अन्य निर्धारित लागत को वहन करना मुश्किल होगा। अधिकांश कंपनियों के पास एक या दो महीने के लिए नकदी होगी। उद्योग के जानकारों का कहना है कि सिनेमाघर चलाने वाली मझोले आकार की कंपनियां लंबे समय तक इस स्थिति का मुकाबला कर सकती हैं लेकिन घबराहट में वे अपना कारोबार बेच सकती हैं।

देश में मीडिया और मनोरंजन का बाजार 1,67,400 करोड़ रुपये का है और इससे जुड़ी सभी छोटी-बड़ी कंपनियों के राजस्व में ठहराव या गिरावट आ सकती है। इसकी वजह केवल वायरस नहीं है। इसकी शुरुआत पिछले साल आर्थिक सुस्ती से हुई थी। विज्ञापन से होने वाली कमाई की वृद्धि दर पहले ही एक अंक में पहुंच गई थी और इस साल की शुरुआत में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और इसके बाद दिल्ली में दंगों ने अर्थव्यवस्था को और झकझोर दिया। वित्त वर्ष 2020 में अधिकांश कंपनियों की विज्ञापनों से होने वाली आय में गिरावट आई है या उसमें ठहराव आ गया है।

मीडिया कंपनियों के विज्ञापन राजस्व में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा मूल्यवद्र्धन से आता है। ये इवेंट, ब्रांड ऐक्टिवेशन या सॉल्यूशन सेलिंग के रूप में हो सकता है। इसका मतलब है कि विज्ञापनदाताओं को ऐसे पैकेज की पेशकश करना जिसमें प्रसारण या प्रकाशन के साथ किसी मॉल आदि में कोई आयोजन या ब्रांड ऐक्टिवेशन शामिल है। उदाहरण के लिए, रेडियो मिर्ची चलाने वाली कंपनी एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया के 635 करोड़ रुपये की राजस्व में ईवेंट और डिजिटल से होने वाली आय का एक-तिहाई हिस्सा है। कोरोनावायरस के कारण सामाजिक दूरी और बंदी से ईवेंट पूरी तरह बंद हो गए हैं। हजारों लोग इस पेशे से जुड़े हैं। इन सेवाओं से जुड़ी अधिकांश कंपनियों का कामकाज बेहद लचीला होता है लेकिन छोटी कंपनियों के पास कोई परिसंपत्ति नहीं होती है और लंबा क्रेडिट चक्र होता है। ध्यान देने वाली बात है कि हॉलीवुड में कंपनियों का राजस्व घटने से 1,20,000 लोगों की नौकरी छिन गई थी। इन कंपनियों ने घटते राजस्व और अपनी लागत में तालमेल बिठाने के लिए कर्मचारियों की छंटनी कर दी।

अब हम दूसरे कारण की बात करते हैं जो यह तय करेगा कि किसी कंपनी, उसके कर्मचारियों, उपभोक्ताओं और समाज पर कितना असर होगा। यह है कि संकट कितना लंबा चलेगा।

चीन में शुरुआती कुछ मामले दिसंबर 2019 में आए थे और जनवरी में वहां लॉकडाउन हुआ था। अब जाकर वहां स्थिति सामान्य हो रही है। अगर हम दो से चार महीने को मानक मानकर चलें तो ऐसा लगता है कि यहां जून या जुलाई में सामान्य स्थिति बहाल हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि स्थिति तुरंत उस स्तर पर पहुंच जाएगी जहां पहले थी। अधिकांश विशेषज्ञों का कहना है कि अर्थव्यवस्था को पुरानी स्थिति में पहुंचने में 18 से 24 महीने का समय लगेगा।

इसमें तीसरा कारण अनियमित है। उन कंपनियों पर वायरस का अप्रत्यक्ष परिणाम जो सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के संपर्क में नहीं आते हैं। उदाहरण के लिए परिवहन की व्यवस्था नहीं होने के कारण कुछ शहरों में अखबार नहीं बांटे जा रहे हैं। या बंदी के कारण टीवी धारावाहिक और फिल्मों की शूटिंग नहीं हो पा रही है। अधिकांश बड़ी प्रसारक कंपनियां रोज चलने वाले धारावाहिकों पर निर्भर हैं और उनके पास कुछ ही दिन की प्रसारण सामग्री बची है। धारावाहिकों की शूटिंग 17 मार्च को बंद हो गई थी, यानी किसी भी दिन मनोरंजन चैनल पुराने कार्यक्रमों को फिर से दिखाना शुरू कर सकते हैं। इसका मतलब है कि विज्ञापनदाता भी अनुबंधों को संशोधित करेंगे। इसका मतलब है कि सिनेमाघर चलाने वाली छोटी कंपनियों की तरह सैकड़ों प्रोडक्शन हाउसों का भविष्य में अनिश्चित है।

भारत में टीवी की 83.6 करोड़ लोगों तक पहुंच है, देश में करीब 900 चैनल हैं और यह देश में मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। टीवी उद्योग के लिए मौजूदा स्थिति अच्छी नहीं है। उद्योग से जुड़ी अधिकांश तबकों ने छोटी कंपनियों को राहत देने के लिए वस्तु एवं सेवा कर को स्थगित करने सहित कई अन्य उपायों की मांग की है। यह एक लंबी लड़ाई होगी जिसमें केवल वही कंपनियां अपना अस्तित्व बचा पाएंगी जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी।

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