बिजनेस स्टैंडर्ड - ....क्योंकि कल हमेशा आता है
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....क्योंकि कल हमेशा आता है

शेखर गुप्ता /  March 29, 2020

कोरोनावायरस के इस दौर में हम दो व्यापक स्वीकार्य सत्य सामने रखने का साहस कर रहे हैं। पहला, कल कभी नहीं आता इसलिए काल करे सो आज कर। दूसरा सत्य जिसका श्रेय अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस को दिया जाता है और जिसे डॉ. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के दौरान संसदीय बहस में दोहराया था: अंत में हम सभी को मरना है। माहौल में इतनी निराशा है कि आशावादी बातें करने पर असंवेदनशील कहलाने का जोखिम है।

पिछली दो पीढिय़ों में सामने आया सबसे खतरनाक वायरस दुनिया भर में घूम रहा है। उसे न वीजा चाहिए और न पासपोर्ट, वह दूसरों के टिकट पर सफर कर रहा है। चूंकि यह वायरस नया है इसलिए इससे कोई सुरक्षित नहीं है, न राजा और न ही रंक। यह सबको एक समान प्रभावित कर रहा है, बेशक यह प्रसिद्ध और ताकतवर लोगों को वरीयता देता दिखता है। प्रिंस चाल्र्स, बोरिस जॉनसन, सोफी ट्रडो, टॉम हैंक्स और भारतीय मूल के सलेब्रिटी शेफ फ्लोएड कार्डोज समेत ऐसे अनेक नाम हैं। यदि यह केवल अमीर और ताकतवर लोगों पर असर डालता तो ज्यादातर लोग इसे परपीड़ा सुख लेने का जरिया बना लेते। परंतु ऐसा नहीं है। यह सब पर असर डाल रहा है। कई देशों में विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हम इसका टीका नहीं बना लेते या प्रतिरक्षा तंत्र विकसित नहीं कर लेते तो 50 से 80 फीसदी लोग इससे संक्रमित हो जाएंगे। परंतु यह प्रतिशत अप्रासंगिक है। यह एक और तरह का फ्लू है जो बना रहेगा और हमें इससे निपटना सीखना होगा। हममें से ज्यादातर लोग कभी न कभी इसके शिकार होंगे। 10 में से 8 लोगों को साधारण सर्दी-जुखाम से ज्यादा कुछ महसूस नहीं होगा लेकिन कुछ लोगों की जान भी जाएगी। इससे संक्रमित लोगों में से 98 फीसदी जीवित रहेंगे। यहां पर पहले सत्य का जिक्र आता है: काल करे सो आज कर। आलसी, किस्मत के भरोसे रहने वाले और निराशावादी लोगों पर लोग ताना कसते हैं: आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों। परंतु कल आएगा। ऐसे में उसकी तैयारी भी रखनी होगी। अब कींस की बात करते हैं। यह सही है कि एक न एक दिन हम सभी को मरना है। परंतु दो सवाल पैदा होते हैं। इस बीच के समय में हम क्या करेंगे? मरने का इंतजार? ज्यादातर लोग इस तरह तो नहीं जीते, मरने का इंतजार करते हुए। बल्कि ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी लंबी बनाने का हरसंभव प्रयास करते हैं। चाहे वह कोई वायरस ही क्यों न हो, जिसे वैज्ञानिक पूरी तरह जीवित भी नहीं मानते। यहां दूसरा सवाल पैदा होता है: यह कौन तय करता है कि हम कितना ज्यादा या कम जिएंगे? इस वायरस से कितने भारतीय प्रभावित होंगे या कितनों की जान जाएगी इससे जुड़े कई परिदृश्य हैं। इन दिनों महामारी विज्ञान चलन में है। अलग-अलग जानकार अलग-अलग तरह के दावे कर रहे हैं। कोई कहता है कि लाखों लोग मारे जाएंगे, कुछ कहते हैं कि जुलाई तक आधा अरब लोग लोग संक्रमित हो जाएंगे। दूसरी ओर हमसे कहा जा रहा है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। गर्मी का मौसम आते ही यह वायरस समाप्त हो जाएगा। कुछ लोगों का कहना है कि हमारा मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र इस वायरस पर भारी पड़ेगा। यह कहना उचित लग सकता है कि सच इन दोनों के बीच कहीं होगा लेकिन ऐसा है नहीं। क्योंकि यह मानकर चला जा रहा है कि देश के 1.36 अरब लोग अपने सामूहिक और व्यक्तिगत भविष्य को बचाने के लिए कुछ नहीं करेंगे। कोई मुल्क आंकड़ों से खेलने वालों के ऐसे मनमाने अनुमानों पर काम नहीं करता जो मानव और सरकार के हस्तक्षेप को शून्य मानकर निकाले जाते हों। मैं उस पीढ़ी का हूं जिसने तीन जंग देखी हैं। इनमें 1962 की शर्मनाक हार और 1971 की महान जीत शामिल हैं। हमने अकाल देखा है, हरित क्रांति, राशन की कतारें, लाल अमेरिकी गेहूं भी जिसके बारे  में मेरी मां की शिकायत थी कि उसकी रोटी नहीं बनती। हमने चेचक देखा, पूर्वोत्तर में चार-चार उपद्रवों का उभार और शमन देखा, पंजाब का आतंकवाद देखा, कश्मीर समस्या देखी, बाबरी मस्जिद प्रकरण देखा, उदारीकरण के पहल दशकों तक धीमी आर्थिक वृद्धि देखी, आर्थिक सुधार देखे, बजाज स्कूटर की 16 साल लंबी प्रतीक्षा सूची देखी, हीरो को दुनिया का सबसे बड़ा दोपहिया निर्माता बनते देखा, चंडीगढ़ में स्थानीय सांसद (पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय कृष्णकांत) से शादी के तोहफे के रूप में एलपीजी कनेक्शन के लिए पर्ची लिखवाई और एक ऐसा भारत भी देखा जहां करीब 10 करोड़ लोगों को ये कनेक्शन नि:शुल्क दिए गए। हालांकि बता दूं कि मुझे वह गैस कनेक्शन नहीं मिला क्योंकि सांसद का कोटा पहले ही समाप्त हो चुका था। मेरी पीढ़ी ने वह दौर भी देखा है जब विदेश जाने वाले भारतीयों को 20 डॉलर का कोटा हासिल करने के लिए दर्जन भर फॉर्म भरने पड़ते थे। युद्ध की कवरेज के लिए विदेश जाने वाले संवाददाताओं को 165 डॉलर का दैनिक भत्ता लेने की मंजूरी की चाह में रिजर्व बैंक के आगे कतार लगानी पड़ती थी। हमने आज का भारत भी देखा है जहां आप विदेशों में आराम से 2.5 लाख डॉलर व्यय कर सकते हैं। एक बात तो तय है कि हमारा देश परिवर्तनशील है। यह उत्तर कोरिया नहीं है कि यह स्थिर हो जाए। उस देश का अपमान न करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि हम उतने अनुशासित नहीं हैं। बात करते हैं बीमारियों और महामारियों की। हमारे माता-पिता ने प्लेग की महामारी देखी। हमारा समय आते-आते उससे निजात मिल चुकी थी। सन 1994 में जरूर सूरत में इसे लेकर थोड़ी अफरातफरी मची थी। मेरी पीढ़ी के लोगों के बाजुओं और नितंब पर चेचक के टीकों के दो-तीन निशान होंगे। सन 1980 में इसका उन्मूलन हो गया। उसके बाद जन्मे लोगों को पता भी नहीं कि वह क्या होती थी। मेरी पीढ़ी और व्यक्तिगत रूप से मैं, खसरा, गलगंड, टायफाइड समेत तमाम तरह की बीमारियां झेल चुके हैं। छोटे शहरों में तो लोगों ने जाने क्या-क्या झेला होगा जहां एक भीड़ भरे कमरे में एमबीबीएस चिकित्सक बुखार की दवा भी देता, हड्डी पर प्लास्टर भी करता, कुत्ता काटने की भी दवा करता और आपकी मां के हाथ पर हुई खराश को हर्पीज जोस्टर के रूप में पहचान कर उसका भी इलाज करता। हर्पीज जोस्टर की बात करने के लिए आपकी उम्र इतनी तो होनी चाहिए कि आप चिकन पॉक्स झेल चुके हों। इसलिए क्योंकि हर्पीज वायरस इसके साथ ही आता है। यह दशकों तक आपके शरीर में बना रहता है और फिर आपकी प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर या आपके बुजुर्ग हो जाने पर सर उठाता है। संभावना तो यही है कि आज 30 से कम उम्र के किसी भारतीय को कभी इसका सामना न करना पड़े क्योंकि टीका लगने के कारण उन्हें चिकन पॉक्स नहीं हुआ।

युद्ध के खेल रोमांचक होते हैं। खासकर तब जब आप ज्यादा से ज्यादा लोगों के मारे जाने और दुनिया के खत्म होने का दावा करें। जब मरने वाले आपके अपने न हों तो यह और आसान होता है। मैं वैश्विक मीडिया पर ऐसी खबरें पढ़ता और सुनता रहता हूं। पिछले सप्ताह सीएनएन पर रिचर्ड क्वेस्ट ने पूछा था: आखिर भारत में आंकड़ा इतना कम कैसे है? युद्ध इतिहास पढि़ए और आप पाएंगे आखिर क्यों ऐसे ज्यादातर बुद्धिमान गलत साबित हुए। क्योंकि उन्होंने इस बात की अनदेखी कर दी कि दूसरा पक्ष क्या कर रहा है। दूसरा पक्ष हैं हम, हम भारत के लोग, हमारा लोकतंत्र, स्वतंत्र मीडिया, नागरिक समाज, हमारा शोरगुल। हो सकता है आप नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते हों लेकिन मोदी का भारत, माओ का चीन नहीं है जहां लाखों लोग भूख और बीमारी से मर जाएं और उन्हें जमीन में दफन कर दिया जाए। यह भारत आपको सैकड़ों मील दूर अपने घरों की ओर पैदल जा रहे श्रमिकों के हालात तत्काल दिखाएगा, जिसे देखकर आपका दिल टूट जाए और सरकार को कुछ न कुछ करने पर मजबूर होना पड़े। संक्षेप में यही कि आगे चलकर हम सभी को मरना है लेकिन हम मरने का इंतजार नहीं करेंगे, कुछ ऐसा करेंगे ताकि हमारी उम्र बढ़े। हमें आज का इस्तेमाल एक बेहतर भविष्य के निर्माण में करना होगा। शायद हम टीबी, अंधत्व, गर्भाशय के कैंसर और रैबीज जैसी बीमारियों को पूरी तरह समाप्त कर सकें। खेद की बात है कि इनमें हम दुनिया में सबसे आगे हैं।

हमें यह याद रखना होगा कि कल हमेशा आता है।

 
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