बिजनेस स्टैंडर्ड - नकदी की प्रचुरता
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नकदी की प्रचुरता

संपादकीय /  March 29, 2020

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कोविड-19 की चुनौती को देखते हुए मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक जल्द आयोजित कर तथा वित्तीय बाजारों के समर्थन के लिए कई उपायों की घोषणा करके बेहतर कदम उठाया है। आरबीआई गवर्नर ने यह संकेत दिया है कि केंद्रीय बैंक हरसंभव कदम उठाने तथा तमाम पारंपरिक तथा गैर पारंपरिक तरीके अपनाने को तैयार है। इससे पहले आरबीआई की आलोचना की गई थी कि वह ऐसे वक्त में ज्यादा जरूरी कदम नहीं उठा रहा है जबकि दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक इस अकल्पनीय संकट से जूझने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। एमपीसी ने नीतिगत रीपो दर में 75 आधार अंकों की कमी की थी। रिवर्स रीपो दर में 90 आधार अंकों की कटौती की गई थी और यह 4 फीसदी रह गई थी। इसके पीछे मूल विचार है बैंकिंग तंत्र को केंद्रीय बैंक के पास अतिरिक्त नकदी जमा करने से हतोत्साहित करना। ऐसा करने से व्यवस्था में ऋण प्रवाह सुधारने में मदद मिलेगी। ऐसे में नकदी के उपायों के साथ-साथ असल बात है रीपो दर में 75 आधार अंक से अधिक की प्रभावी कटौती का समायोजन करना। केंद्रीय बैंक ने नकद आरक्षित अनुपात में भी 100 आधार अंक की कटौती की है। इससे करीब 1.37 लाख करोड़ रुपये की नकदी व्यवस्था में आएगी। इसके अलावा वह एक लाख करोड़ रुपये तक के लंबी अवधि के लक्षित रीपो ऑपरेशंस (टीएलटीआरओ) को भी अंजाम देगा जो ऐसी फ्लोटिंग दर पर होगी जो नीतिगत दर से संबद्ध होगी। इसे निवेश श्रेणी के कॉर्पोरेट बॉन्ड में लगाया जाएगा। इसे परिपक्वता तक बरकरार रखने के लिए वर्गीकृत किया जाएगा। हालांकि आरबीआई अन्य केंद्रीय बैंकों मसलन अमेरिकन फेडरल रिजर्व आदि की तरह सीधे कॉर्पोरेट बॉन्ड नहीं खरीद रहा है लेकिन टीएलटीआरओ इस श्रेणी में दबाव कम करने में मदद करेगा। फरवरी में एमपीसी की बैठक के साथ मिलाकर देखें तो व्यवस्था में जो नकदी डाली गई है वह सकल घरेलू उत्पाद के 3.2 फीसदी के बराबर है। यह सही है कि केवल नकदी डालने से समस्या हल नहीं होगी लेकिन इससे वित्तीय बाजारों का कामकाज सहज होगा। आरबीआई को कम रेटिंग वाले बॉन्ड की समस्या भी हल करनी होगी।

हालांकि केंद्रीय बैंक व्यवस्था में भरपूर नकदी डाल रहा है, लेकिन बॉन्ड बाजार अभी भी अनिश्चितता से दो-चार है। उदाहरण के लिए यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार की ऋण योजना अगले वित्त वर्ष में कितना बदलेगी। अर्थशास्त्रियों ने वर्ष 2010-21 के वृद्धि अनुमान को काफी कम कर दिया। कम वृद्धि का असर राजस्व संग्रह पर पड़ेगा और सरकार इस स्थिति में नहीं होगी कि वह व्यय में कटौती कर सके। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। नकदी की स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्रीय बैंक कितना हस्तक्षेप करने में सक्षम रहेगा। ऐसे मसलों पर स्पष्टता से पारेषण में सुधार होगा।

एक अन्य बड़े हस्तक्षेप में आरबीआई ने नियमित अंतराल पर चुकाए जाने वाले तमाम तरह के ऋण के भुगतान को तीन महीने तक स्थगित करने की इजाजत दे दी है। इसके अलावा कंपनियां कार्यशील पूंजी ऋण के ब्याज भुगतान को भी स्थगित कर सकती हैं। ये तमाम उपाय कर्जदारों को जरूरी राहत प्रदान करेंगे लेकिन ये बैंकों की बैलेंस शीट को प्रभावित करेंगे। सरकार को ऐसी चिंताओं को दूर करना होगा। वृहद आर्थिक मोर्चे पर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति और वृद्धि अनुमानों से दूर रहा है। देशव्यापी लॉकडाउन का वृद्धि पर लाजिमी तौर पर असर पड़ेगा। यह देखना भी महत्त्वपूर्ण है मांग और आपूर्ति को लगा यह झटका मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित करता है। हालांकि आरबीआई का अनुमान है कि आगे चलकर परिस्थितियां सहज होंगी। स्पष्ट है कि वृहद नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि यह वायरस कितनी जल्दी नियंत्रित होता है और हालात कब सामान्य होते हैं। हर दिन महत्त्वपूर्ण है।

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