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कोविड-19: राहत पैकेज का स्वागत मगर और कदमों की दरकार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 27, 2020

देश भर में कोविड-19 महामारी के प्रकोप से निपटने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन को देखते हुए आर्थिक राहत पैकेज को लेकर उम्मीदें काफी अधिक थीं। इन आसमान छूती उम्मीदों के ही चलते गुरुवार को सरकार की तरफ से घोषित 1.7 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज को लेकर एक तरह की निराशा का भाव भी देखा जा रहा है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा आर्थिक राहत पैकेज का यह ऐलान एक स्वागत-योग्य एवं बेहद जरूरी कदम है। राहत देने के लिए उठाए गए इस पहले कदम से लॉकडाउन में करोड़ों गरीब भारतीयों को पेश आ रहीं मुश्किलें कुछ हद तक कम होने की उम्मीद है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बुधवार से शुरू हुए तीन हफ्तों के लॉकडाउन में लोगों को राहत देने के लिए अभी बहुत कुछ और किए जाने की जरूरत है और आने वाले हफ्तों में राहत देने वाले ऐसे कई अन्य फैसलों की भी जरूरत होगी। इसकी वजह है कि आने वाले दिनों में ही कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन का आर्थिक असर अधिक साफ हो पाएगा।

इस राहत पैकेज को लेकर बड़ी उम्मीदें जगाने वाले पहलुओं को लेकर कोई गलती न करें। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे जिन्होंने गत 19 मार्च को कोरोनावायरस के मसले पर पहली बार देश को संबोधित करते हुए कहा था कि वित्त मंत्री की अध्यक्षता में एक कार्यबल बनाया गया है जो इस महामारी से निपटने के लिए जरूरी आर्थिक कदमों के बारे में फैसला करेगा।

उसके बाद से ही हर कोई यह अनुमान लगा रहा था कि सरकार के इस राहत पैकेज का आकार एवं स्वरूप कैसा होगा?

इस पैकेज के बारे में अगले चार दिनों तक कोई प्रगति देखने को नहीं मिली। फिर 23 मार्च को सीतारमण ने एक संवाददाता सम्मेलन कर कुछ आर्थिक कानूनों एवं प्रावधानों के अनुपालन में ढील देने की घोषणा की। राहत पैकेज के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने सिर्फ  इतना ही कहा था कि इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है और जल्द ही इसकी घोषणा की जाएगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने उसी शाम को एक बार फिर देश को संबोधित किया लेकिन उसमें भी आर्थिक पैकेज का कोई जिक्र नहीं हुआ। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े उपकरणों के लिए 15,000 करोड़ रुपये देने की घोषणा जरूर की थी। देश भर में 14 अप्रैल तक के लिए लॉकडाउन करने का फैसला एकदम सही था लेकिन इसके आर्थिक दुष्प्रभावों का भी अंदाजा सबको था। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही आर्थिक पैकेज की घोषणा न होना यह दर्शाता है कि इस विपदा से कितने खराब ढंग से निपटा जा रहा है?

इस बीच पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए न्यूनतम 5 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज दिए जाने की चर्चा शुरू कर दी। अगर ऐसा होता तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2 फीसदी से थोड़ा अधिक ही होता।

दरअसल अमेरिका ने हाल में 2 लाख करोड़ डॉलर के वित्तीय राहत पैकेज की घोषणा की है जो उसके जीडीपी का 10 फीसदी है। लिहाजा, अमेरिका और भारत में घोषित कोविड-19 राहत पैकेजों की तुलना फौरन शुरू हो गई। अगर भारत सरकार अमेरिका की तर्ज पर अपना राहत पैकेज घोषित करती तो उसका आकार कितना होता? क्या इसका आकार 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक होता? लेकिन यह बात भी तो है कि हमारी तुलना में अमेरिका इस महामारी की चपेट में कहीं अधिक है। इसके अलावा अमेरिका से भारत की तुलना करना भी उचित नहीं है। लेकिन गुरुवार को घोषित कुल राहत पैकेज भारत के जीडीपी के एक फीसदी से भी कम है। यह अमेरिका के राहत पैकेज या चिदंबरम द्वारा सुझाए गए आंकड़े के आसपास भी नहीं है। इस तरह की तुलनाएं और पैकेज घोषित करने में लगा सात दिनों का वक्त ही शायद इस बात के लिए जिम्मेदार है कि अधिकतर लोग इससे खुश नहीं हैं और अब अगले दौर के पैकेज की मांग कर रहे हैं।

वैसे इस पैकेज को लेकर दो अन्य बिंदुओं पर भी गौर करना चाहिए। पहला, यह पैकेज केवल गरीब लोगों की चिंताओं का ध्यान रखता है, मसलन, प्रवासी मजदूर, छोटी फर्मों एवं निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले संगठित कामगार, महिलाएं, किसान और स्वास्थ्य कर्मचारी। अर्थव्यवस्था के अन्य वर्गों- खासकर विनिर्माण क्षेत्र और सेवा-प्रदाता कंपनियों पर लॉकडाउन का असर बहुत अधिक होगा। इन क्षेत्रों के लिए भी एक आर्थिक पैकेज के ऐलान की तत्काल जरूरत है।

दूसरा, आर्थिक पैकेज स्वास्थ्य देखभाल का ढांचा खड़ा करने या उसे सशक्त करने की जरूरत को लेकर चुप नहीं रह सकता है। देश में जल्द ही परीक्षण सुविधाएं बड़े स्तर पर शुरू करने और कोरोना का प्रसार होने पर इसकी चपेट में आने वाले लोगों के समुचित इलाज की जरूरत है। साफ है कि दो अन्य आर्थिक राहत पैकेज की जरूरत है। गुरुवार को घोषित हुआ राहत पैकेज काफी नहीं होगा।

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