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अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त पर कोरोनावायरस का प्रभाव

एके भट्टाचार्य /  03 26, 2020

कोरोनावायरस के कारण फैले घातक संक्रमण कोविड-19 का एक पीड़ि‍त ऐसा भी है जिस पर देश के नीति निर्माताओं का ध्यान नहीं गया है। यह है वर्ष 2020-21 का आम बजट।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को बजट पेश किया था। उस वक्त देश की अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का पूरा असर नजर नहीं आ रहा था। भारत में कोविड-19 का पहला मामला 30 जनवरी को सामने आया। उस समय चीन में रोजाना फ्लू जैसे लक्षण वाले 1,500 मामले सामने आ रहे थे। उस वक्त न तो भारत में और न ही दुनिया के किसी अन्य देश में इस बीमारी के वैश्विक प्रसार और आर्थिक प्रभाव को लेकर कोई आशंका जताई गई थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पहली बार इसके विपरीत आर्थिक प्रभाव पर 22 फरवरी को वक्तव्य दिया।

आश्चर्य नहीं कि आम बजट में भी देश की वृद्धि पर इसके प्रभाव का कोई जिक्र नहीं था। इसके बजाय सन 2020-21 में देश की नॉमिनल वृद्धि 10 फीसदी रहने की बात कही गई जो 2019-20 के 7.45 फीसदी से बहुत अधिक था। सकल राजस्व के 12 फीसदी की दर से बढऩे की बात कही गई और विनिवेश प्राप्तियों में 233 फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया गया। वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 3.5 फीसदी रहने की बात कही गई थी जबकि 2019-20 में यह 3.8 फीसदी था।

संसद में केंद्रीय बजट 23 मार्च को राजस्व और व्यय के आंकड़ों में बिना किसी बदलाव के पारित हुआ। इसमें दो राय नहीं कि कोविड-19 इन आंकड़ों में संशोधन पर मजबूर करेगा। ऐसे में अगले वर्ष के राजकोषीय घाटा लक्ष्य में भी बदलाव करना होगा। इस महामारी की शुरुआत के पहले ही यह स्पष्ट था कि वर्ष 2019-20 के कर राजस्व के आंकड़े अतिरंजित हैं। अनुमान यह था कि वर्ष 2019-20 के आखिरी तीन महीनों में सरकार पूरे वर्ष के कर संग्रह का 36 फीसदी जुटाएगी। पिछले दो साल के अंतिम तीन महीनों में यह औसतन 30-32 फीसदी रहा।

सरकार ने संसद में मार्च के आरंभ में जो वक्तव्य दिया था उसके मुताबिक फरवरी 2020 के अंत तक सकल कर संग्रह 17.4 लाख करोड़ रुपये अनुमानित था। यानी 2019-20 के लिए 21.6 लाख करोड़ का संशोधित लक्ष्य हासिल करने के लिए अकेले मार्च में सरकार को 4.2 लाख करोड़ रुपये जुटाने थे।

लक्ष्य हासिल करना अपने आप में कठिन था। परंतु मार्च के पहले सप्ताह में कोविड-19 के गंभीर हो जाने के बाद देश में आर्थिक गतिविधियां धीमी होने लगीं। कर माफी योजना से कुछ अतिरिक्त  राजस्व हासिल होने की आशा थी लेकिन वह प्रक्रिया भी आशा के अनुरूप नहीं रही। अब इस योजना की अंतिम तिथि को बिना किसी जुर्माने के बढ़ाकर 31 मार्च से आगे कर दिया गया है तो जो भी लाभ मिलना था वह अगले वर्ष ही सामने आएगा।

यहां तक कि वर्ष 2019-20 में 65,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ विनिवेश लक्ष्य भी कल्पना बनकर रह गया क्योंकि गत छह सप्ताह में शेयर बाजार 38 फीसदी गिरे हैं। उत्पाद शुल्क में इजाफे और पेट्रोलियम उत्पादों पर उपकर से होने वाला लाभ चालू वित्त वर्ष में करीब 2,000 करोड़ रुपये रहेगा।

ऐसे में 2019-20 में सरकारी राजस्व के संशोधित अनुमानों में काफी कमी करनी होगी। इससे सरकार के 2020-21 के लक्ष्य पर दबाव बनेगा। अब वृद्धि पर कोविड-19 के प्रभाव के बाद राजस्व लक्ष्य हासिल करना और मुश्किल हो जाएगा। यदि आर्थिक वृद्धि अगले वर्ष भी प्रभावित होती है तो 12 फीसदी की लक्षित जीडीपी दर कैसे हासिल होगी? अब तो विनिवेश लक्ष्य भी बहुत महत्त्वाकांक्षी लग रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी भी सरकार के आयात बिल को कम करने तथा पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी को कम करने में मदद नहीं करेगी। आर्थिक वृद्धि में गिरावट के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की खपत भी कम बनी रहेगी। ऐसे में उत्पाद शुल्क बढऩे के बावजूद शुद्ध लाभ 2020-21 के बजट में उल्लिखित 8 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने के लायक नहीं रहेगा।

आर्थिक वृद्धि में अनिश्चितता बरकरार है और बजट अनुमान की परिस्थितियां अब नाटकीय ढंग से बदल चुकी हैं। ऐसे में सरकार क्या कर सकती है? इतना ही नहीं सरकार के व्यय के बोझ में आने वाले दिनों में भारी इजाफा हो सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने और स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए भारी तादाद में धन और प्रोत्साहन पैकेज की आवश्यकता होगी।

बजट के आंकड़ों में बड़े पैमाने पर बदलाव करना होगा। प्रशासनिक कारणों की बात करें तो शायद सोमवार को बजट पारित करना आवश्यक रहा होगा क्योंकि उसके बाद ही कोविड-19 को देखते हुए दोनों सदनों को स्थगित किया गया और उसके बाद पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की गई। परंतु संकट के समय सरकार क्या कदम उठाने जा रही है इसे लेकर जनता में भरोसा पैदा करना होगा। यदि सरकार ने सुधार पैकेज साथ-साथ घोषित किए होते तो शायद ज्यादा बेहतर होता।

यह पंद्रहवें वित्त आयोग के लिए भी एक अवसर है। आयोग को अक्टूबर के अंत तक अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करनी थी जिससे यह पता चलता कि केंद्र और राज्यों को देश के सामने मौजूद स्वास्थ्य तथा अन्य चुनौतियों से निपटने के लिए किस प्रकार के वित्तीय समायोजन करने होते। कोविड-19 अर्थव्यवस्था में जीएसटी के आगमन से मची उथल-पुथल से कम समस्या नहीं पैदा करेगा। आयोग से कहा गया था कि वह सरकार की वित्तीय व्यवस्था पर जीएसटी के प्रभाव का खासतौर पर आकलन करे और जरूरी अनुशंसाएं करे। सरकार को अब आयोग से कहना चाहिए कि वह इस बात का परीक्षण करे कि अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त पर कोरोनावायरस के असर को देखते हुए क्या कदम उठाने की आवश्यकता है।

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