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औचक परीक्षण से ही लग पाएगा सामुदायिक प्रसार का पता

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  March 24, 2020

जब भी कोविड-19 जैसी महामारी आती है तो नीति-निर्माताओं को परीक्षण किट, दवाएं, अस्पतालों के बिस्तर और वेंटिलेटर जैसे प्रमुख संसाधनों के आवंटन का सबसे कारगर तरीका ही अपनाना चाहिए। उन्हें इस गंभीर बीमारी के संभावित प्रसार का भी अंदाजा लगाना होता है ताकि यह तय किया जा सके कि किसी इलाके में पूर्ण बंदी कब करनी है और आपातकालीन राजकोषीय एवं मौद्रिक कदम क्या हो सकते हैं? इन नतीजों तक पहुंचने में आंकड़ों की भूमिका अहम होती है और सरकार का नियमित तौर पर असत्य बोलना समस्या को बढ़ा देता है। आधिकारिक आंकड़े संक्रमण एवं बीमारी से होने वाली मौतों के बारे में वास्तविक स्थिति नहीं बताते हैं लेकिन महामारी-विशेषज्ञ किसी महामारी को आंकने के लिए गणितीय तकनीकों का ही इस्तेमाल करते हैं। अधिकांश महामारियों को अमूमन 'घातांकी' घोषित कर दिया जाता है। इसका मतलब है कि एक निश्चित आधार स्तर तक संक्रमण फैल जाने के बाद संक्रमितों की संख्या में जबरदस्त तेजी आएगी और महामारी पर काबू न पाए जाने तक यह सिलसिला जारी रहेगा। घातांक के अनौपचारिक इस्तेमाल से गणितीय समझ धुंधली हो सकती है। संक्रमणों की संख्या 'घातांकीय' स्तर पर न होते हुए भी बढ़ सकती है और संक्रमणों की संख्या दूसरे गणितीय प्रकार्यों से निर्धारित हो सकती है।

 
चरघातांकी वक्र की स्थिति तब बनती है जब एक आधार संख्या का गुणन खुद से ही कई बार होता है। मसलन, कोई संक्रमित व्यक्ति चीन के वुहान से लौटकर दिल्ली आया है। फिर वह दो लोगों को संक्रमित करता है और ये दोनों लोग दो-दो अन्य लोगों को संक्रमित करते है। पहला चरण एक से शुरू होता है और फिर दो, फिर चार, फिर आठ और इसी तरह बढ़ते हुए 14वें चरण में 16,384 लोगों को संक्रमित कर चुका होता है। किसी महामारी का पहला चरण इसी तरह से आगे बढ़ता नजर आता है। जैसे ही महामारी पर काबू पा लिया जाता है, यह वक्र घातांकीय नहीं रह जाता है और संक्रमण स्तर सीमित हो जाता है। इस 'वक्र को समतल करने' की लोकप्रिय उक्ति का मतलब यही है कि किसी भी तरह से महामारी की प्रसार दर पर काबू पाया जाए।
 
एक अहम गणितीय तकनीक में संक्रामक बीमारी का परीक्षण करते समय सामाजिक नेटवर्क का मूल्यांकन भी शामिल है। निश्चित रूप से पहले संक्रमित व्यक्ति के संपर्कों की पहचान करने और उसके संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति का परीक्षण करना जरूरी है। यह इस तरह से डिजाइन किया गया है कि किसी भी व्यक्ति के लगातार संपर्क में रहने वाले परिवार, सहकर्मियों, घरेलू कामगार, पड़ोसियों एवं दोस्तों को चिह्नित किया जा सके। लेकिन परीक्षण में आबादी के बड़े हिस्से में से औचक नमूने भी शामिल किए जाने चाहिए। स्वास्थ्य अधिकारियों को परीक्षण के लिए बिना किसी क्रम के उन लोगों को चुनने की जरूरत है जो किसी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हों। पता लगाया जाए कि महामारी का सामुदायिक प्रसार तो नहीं हुआ है। मान लीजिए, एक बीमार शख्स ने बस या विमान में सफर किया है या किसी धार्मिक समारोह में शामिल हुआ है और एक अनजान शख्स को संक्रमित कर चुका है। ऐसी स्थिति में अगर प्रशासन केवल बीमार के संपर्कों का ही परीक्षण करेगा तो सामुदायिक प्रसार के बारे में पता नहीं चल पाएगा। औचक नमूनों के परीक्षण से ही सामुदायिक प्रसार को परखा जा सकता है। चीन और दक्षिण कोरिया ने भी अपने यहां संक्रमितों की शिनाख्त के लिए औचक नमूना परीक्षण का ही तरीका अपनाया है। 
 
अधिकतर लोग 'छोटी दुनिया' नेटवर्क से ही जुड़े होते हैं। इसका मतलब यह है कि हमारी दुनिया काफी हद तक अपने परिवार, दोस्तों एवं पेशेवर सहकर्मियों से बनती है और इनमें से लगभग सारे लोग एक दूसरे को जानते हैं। फेसबुक का कोई भी उपयोगकर्ता यह बात समझता है कि उसके एवं उसके किसी दोस्त के बीच के साझा दोस्तों का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि आप दोनों एक ही 'छोटी दुनिया' नेटवर्क का हिस्सा हैं। आपके कुछ ऐसे जानकार भी हो सकते हैं जो किसी दूसरी छोटी दुनिया का हिस्सा हैं। मसलन, आप अपने सबसे अच्छे दोस्त के चचेरे भाई से शादी में मिले थे लेकिन उसके साथ भी आपका एक दोस्त साझा है। इस तरह उसके पास आपकी छोटी दुनिया में घुसने का एक जरिया आप हैं। हालांकि खुद उसके पास अपनी अलग छोटी दुनिया मौजूद है।
 
इस तरह छोटी दुनिया नेटवर्क में विभिन्न आंतरिक संपर्क होते हैं और दूसरी छोटी दुनिया नेटवर्क में जाने के बेहद थोड़े लिंक होते हैं। इसका मतलब है कि अपनी छोटी दुनिया से बाहर के व्यक्ति से संक्रमित होने की आशंका अपने ही नेटवर्क में संक्रमित होने से काफी कम होती है। अगर आपके दोस्त का चचेरा भाई संक्रमित है तो उससे आपके संक्रमित होने की आशंका बेहद कम है। इसमें एक अहम गणितीय निहितार्थ भी है। अगर एक व्यक्ति संक्रमित है तो उसकी छोटी दुनिया नेटवर्क में हरेक के संक्रमित न होने तक घातांकीय वृद्धि की पूरी आशंका है। लेकिन अगर दूसरी छोटी दुनिया नेटवर्कों से आपका कोई नाता नहीं है तो फिर संक्रमण बहुत जल्द सीमित हो जाता है। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं, विमान, मॉल, सिनेमाघरों, धार्मिक समारोहों को बंद करना अलग-अलग छोटी दुनिया के बीच संपर्क काटने की ही कवायद है। वैसे व्यापक बंदी के व्यापक निहितार्थ होते हैं, लिहाजा किसी भी सरकार को बहुत सोच-समझकर इसे लागू करना चाहिए। 
 
कुछ शोधपत्रों में यह कहा गया है कि छोटी दुनिया की संकल्पना कोविड-19 के मामले में काम कर रही है लेकिन इसकी पुष्टि के लिए समुचित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। जहां तक भारत का सवाल है तो औचक परीक्षणों के अभाव में हमें यह पता ही नहीं है कि कोरोना का सामुदायिक प्रसार किस हद तक है? इतना जरूर है कि सब कुछ बंद किए जाने से महामारी पर जल्द काबू पाया जा सकता है, भले ही उसकी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़े।
Keyword: Corona virus, china, india,,
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