बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोनावायरस के दौर में पानी का सवाल
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कोरोनावायरस के दौर में पानी का सवाल

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  March 23, 2020

विश्व जल दिवस 22 मार्च को था। कोरोनावायरस से लडऩे के लिए हमने अर्थव्यवस्थाओं को लॉकडाउन कर दिया है और हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारे लिए साफ, सुरक्षित और सर्वसुलभ का मुद्दा कितना अहम है। आज इस वैश्विक महामारी से बचाव का एकमात्र तरीका यही है कि हम बार-बार अपने हाथ धोएं। हर बार हमें 20 सेकंड तक हाथ धोने की जरूरत है। सच्चाई यह है कि स्वास्थ्य के लिए आज भी साफ पानी दुनिया में सबसे अहम एहतियाती उपाय है। ऐसे में आज जब हम कोरोनावायरस के रूप में नए वैश्विक दुश्मन का मुकाबला कर रहे हैं तो इस लड़ाई में जीत के लिए पानी की उपलब्धता सबसे कारगर हथियार होगा।

 
हममें से अधिकांश लोग इस बात से राहत महसूस करेंगे कि हमें अपने नलों से पानी मिल सकता है और अगर यह पानी साफ नहीं है तो हम बोतलबंद पानी खरीदकर पी सकते हैं। हम पानी की सरकारी व्यवस्था से निजी व्यवस्था का रुख कर सकते हैं। लेकिन इसमें हम दो बातें भूल जाते हैं। पहली यह कि जो पानी हम खरीदते हैं, वह भी अधिकांश मामलों में सरकारी स्रोतों से ही आता है। दूसरी बात यह है कि अगर हम बोतलबंद पानी भी खरीदते हैं तब भी हम मूत्र के रूप में पानी ही निकालते हैं। जितना ज्यादा पानी हम इस्तेमाल करेंगे, उतना ही जलमल हम पैदा करेंगे। अगर हमने इस जलमल को नहीं रोका और इसका शोधन नहीं किया तो इससे जल प्रदूषण बढ़ेगा और जलस्रोतों का क्षरण होगा। इससे दूषित जल के मामले में हम वहीं पहुंच जाएंगे जहां से हमने शुरुआत की थी।
 
जल संकट हमारा स्वास्थ्य संकट है। कोरोनावायरस को ही लीजिए। इसके संक्रमण से बचने और इसके विषाणु को मारने के लिए 20 सेकंड तक हाथ धोने की सलाह दी जा रही है। यानी हर बार हाथ धोने के लिए आपको मोटे तौर पर 1.5 से 2 लीटर पानी की जरूरत है। बार-बार हाथ धोने का मतलब है कि हर व्यक्ति को दिनभर में 15 से 20 लीटर पानी की जरूरत होगी। इस तरह पांच लोगों के परिवार को हाथ धोने के लिए रोजाना 100 लीटर पानी की जरूरत होगी। मान लीजिए कि आप हाथ पर साबुन रगड़ते समय नल खुला नहीं छोड़ते हैं, फिर भी पानी की खपत बहुत ज्यादा होगी। लेकिन विषाणु को दूर रखने और आपके स्वास्थ्य के लिए यह जरूरी है। 
 
यह अपने आप में चुनौती है। भारत और विकासशील देशों में बड़ी संख्या में लोगों की पानी तक पहुंच नहीं है, पीने लायक पानी तो दूर की बात है। तो फिर वे खुद को विषाणु से कैसे बचा पाएंगे? यह वैश्विक महामारी हमारे लिए सबक है कि हम इस शृंखला की सबसे कमजोर कड़ी हैं। इस महामारी से बचने के लिए जरूरी है कि हर किसी की जन स्वास्थ्य तक पहुंच हो ताकि कोई भी इससे वंचित न रहे और विषाणु का वाहक न बने। पानी के साथ भी यही मामला है। अगर लोगों की साफ पानी तक पहुंच नहीं होगी तो फिर वे बीमारी के प्रसार को रोकने में विफल रहेंगे। इस महामारी पर काबू नहीं किया जा सकेगा। इसलिए, साफ पानी तक पहुंच न केवल मौलिक अधिकार है बल्कि बीमारियों को रोकने और थामने के लिए भी यह बेहद जरूरी है।
 
अच्छी खबर यह है कि हमें भली भांति पता है कि हमें क्या करने की जरूरत है। जैसा कि मैं पहले भी कह चुकी हूं कि पानी एक अक्षय स्रोत है और हम सुनिश्चित कर सकते हैं कि बारिश की हर एक बूंद को बचाया जाए, स्थानीय स्तर पर जल भंडारण की व्यवस्थाएं की जाएं, कम पानी की खपत वाली फसलों का उपभोग किया जाए और अपशिष्ट जल की हर बूंद का इस्तेमाल किया जाए। अब हमें इस व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरूरत है। लेकिन मौजूदा वैश्विक महामारी का सबसे बड़ा सबक यह है कि हम यह सुनिश्चित करें कि हर किसी को पानी उपलब्ध हो। इसका मतलब है कि हमें अपनी जल और अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्थाओं में जरूरी बदलाव करने होंगे ताकि वे सभी के लिए किफायती हों। मौजूदा व्यवस्थाएं इतनी महंगी हैं कि कुछ ही लोग इनको वहन कर सकते हैं। पानी लाने के लिए पाइपलाइन जितनी लंबी होगी, आपूर्ति का खर्च उतना अधिक होगा। इससे जल वितरण तंत्र की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि हमारे शहरों में बड़ी संख्या में लोगों के पास नल से जल आपूर्ति की सुविधा नहीं है। उन्हें टैंकरों से पानी मिलता है या वे पेयजल और दूसरी जरूरतों के लिए प्रदूषित जल स्रोतों पर निर्भर हैं। इससे स्वास्थ्य पर उनका खर्च बढ़ जाता है। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती है। पानी की आपूर्ति की लागत जितनी अधिक होगी तो जल निकाय के पास अपशिष्ट जल की निकासी और शोधन के लिए धन नहीं बचेगा। इस तरह गंदा पानी हमारे जल स्रोतों में मिल जाएगा और इसे साफ करने की लागत बहुत अधिक हो जाएगी।
 
हमारे लिए ज्यादा जलमल शोधन संयंत्र बनाने की योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है। हमें आपूर्ति पर नए सिरे से डिजाइन करना होगा ताकि हम पाइपलाइन की लंबाई में कमी कर सकें। इसके लिए हमें स्थानीय स्तर पर पानी के भंडारण की व्यवस्थाओं में निवेश करना होगा। हमें पानी के उपयोग को कम करके मांग को फिर से डिजाइन करना होगा ताकि हम पानी की बरबादी को कम कर सकें। साथ ही हमें अपशिष्ट जल प्रबंधन को फिर से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि हम अपशिष्ट पानी का शोधन करके खाद को जमीन को वापस कर सकें और नदियों में साफ पानी डाला जा सके। लेकिन लब्बोलुबाब यह है कि यह व्यवस्था सभी के लिए सस्ती होनी चाहिए, अन्यथा यह किसी के लिए टिकाऊ नहीं होगी। 
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयरनमेंट से संबद्ध हैं।)
Keyword: Corona virus, china, india, water,,
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