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आपातकालीन पैकेज

संपादकीय /  March 23, 2020

दुनिया भर की सरकारें कोविड-19 के खिलाफ चल रही लड़ाई के कारण मची उथलपुथल और उससे होने वाले आर्थिक नुकसान से निपटने की तैयारी शुरू कर चुकी हैं। अमेरिका, जहां हाल के दिनों में संक्रमण तेजी से बढ़ा है और जहां की स्वास्थ्य सेवाओं में यूरोप से अधिक खामियां हैं, वहां आर्थिक पैकेज भी उसी अनुपात में भारी-भरकम है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक लैरी कडलो ने कहा है कि पैकेज का तीसरा चरण, जिस पर अभी चर्चा चल रही है, वह एक लाख करोड़ डॉलर के मूल विधेयक से ज्यादा हो सकता है, यानी तकरीबन 2 लाख करोड़ डॉलर के आसपास। बल्कि यह अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद के 10 फीसदी तक पहुंच सकता है।

 
अन्य देशों ने भी अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दी है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने यूरो क्षेत्र में बैंक ऋण के लिए सहायता देने की बात कही है। इस दौरान वह पूंजी आवश्यकता को शिथिल करेगा और बैंकों को दीर्घावधि का ऋण देगा। यूरोप की विभिन्न सरकारों ने भी इसमें दखल दिया है। जर्मनी में चांसलर एंगेला मर्केल अपने चिकित्सक के कारण कोरोनावायरस के संपर्क में आने के बाद स्व-पृथक्करण में चली गई हैं। जर्मनी ने अपने प्रमुख सरकारी बैंक को कंपनियों को 600 अरब डॉलर से अधिक राशि देने के लिए अधिकृत किया है। फ्रांस में छोटे कारोबारों के लिए इससे करीब आधे आकार का पैकेज तैयार किया जा रहा है। अन्य देशों में भी ऐसे ही लक्षित कदम उठाए हैं। दक्षिण कोरिया ने विशेष ध्यान खींचा है। उसने छोटे कारोबारों और छंटनी किए गए कर्मचारियों के लिए 10 अरब डॉलर के भीतर का पैकेज जारी किया है।
 
भारत ने देरी से कदम उठाया है जबकि देश में कोरोनावायरस का प्रभाव उसके सामने काफी समय पहले से ही स्पष्ट था। आर्थिक क्षति के आकार को लेकर भी भारत में कोई व्यापक सोच देखने को नहीं मिल रही है। जबकि प्राथमिक तौर पर हमें आम परिवारों और कॉर्पोरेट क्षेत्र को होने वाली नकदी की बाधा से निपटना होगा। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि करीब 5 लाख करोड़ रुपये का पैकेज दिया जाना चाहिए। यह राशि जीडीपी के 2.5 फीसदी के बराबर है। परंतु यह न्यूनतम पैकेज होना चाहिए। यह तो अनिवार्य रूप से किया ही जाना चाहिए। इस पैकेज को बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया जाना चाहिए ताकि यह उन लोगों के लिए सब्सिडी में तब्दील न हो जाए जिन्हें वास्तव में सब्सिडी की आवश्यकता ही नहीं है। क्योंकि यह वैसी ही गलती होगी जैसी कि अमेरिका में हो रही है और इसी के कारण उसका भारी भरकम प्रोत्साहन पैकेज कांग्रेस से पारित होने में दिक्कत हो रही है। भारत में नोटबंदी का अनुभव यह दर्शा चुका है कि कैसे अर्थव्यवस्था के संवेदनशील तबके को सुरक्षित किया जाना आवश्यक है। इस तबके में असंगठित क्षेत्र, दैनिक मजदूर और शामिल हैं। ये किसी भी तरह पैकेज से बाहर न रह जाएं।
 
चीन की सरकार ने सन 2008 की तरह किसी बड़े वित्तीय पैकेज की घोषणा नहीं की है लेकिन उसने कुछ औपचारिक कारोबारों के लिए बैंक ऋण की अवधि बढ़ाकर मदद की है। इसके अलावा किराये जैसे अन्य जरूरी भुगतान को निलंबित किया गया है। सरकार को इस व्यवस्था पर नजर रखनी चाहिए ताकि औपचारिक क्षेत्र को बचाया जा सके। जबकि उसे यह भी तय करना चाहिए कि पैकेज की अधिकांश राशि असंगठित और कमजोर तबके पर खर्च हो। सरकार को न केवल बड़ा सोचने की आवश्यकता है बल्कि उसे अपनी योजना को लचीला रखना होगा ताकि जरूरत के मुताबिक तेजी से बदलाव लाया जा सके।
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