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डिजिटल लर्निंग से बदल रही है स्कूली शिक्षा

विभु रंजन मिश्रा /  March 22, 2020

हममें से कई लोग दिल की धड़कन के इलेक्ट्रॉकार्डियोग्राम से वाकिफ हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि किसी देश की शिक्षा के दिल की धड़कन कैसी दिखती होगी? खासकर छात्रों के सीखने का ग्राफ कैसा होगा?

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राज्यों के प्रयासों से छात्रों और शिक्षकों के लिए क्यूआर कोड आधारित लर्निंग प्लेटफॉर्म ने इसे रियल टाइम में ग्राफ के रूप में मापना बहुत आसान कर दिया है। क्याआर यानी क्विक रिस्पान्स कोड एक द्विआयामी बारकोड है जिसमें विशेष जानकारी होती है और इसे डिजिटल तरीके से पढ़ा जा सकता है। 

नंदन निलेकणी की एकस्टेप फाउंडेशन द्वारा लर्निंग कंटेंट बनाने के लिए विकसित ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म सनबर्ड मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दीक्षा परियोजना के जरिये स्कूली बच्चों को सशक्त बना रहा है। जब भी कोई छात्र किताबों में दिए गए क्यूआर कोड को दीक्षा ऐप के जरिये स्कैन करता है तो उसकी सीखने की वरीयताओं और रुझान बैकेंड पर रिकॉर्ड हो जाता है। 

ऐप केंद्रीय डैशबोर्ड के जरिये 30 दिन की अवधि का लर्निंग डेटा कैप्चर करता है और इस बारे में जानकारी देता है कि किस तरह की सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही यह विभिन्न विषयों की लोकप्रियता के बारे में भी बताता है। यह छात्रों की सीखने की क्षमता को समझने में मदद करता है कि वे कुछ विषयों में अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं करते हैं और उसके मुताबिक डिजिटल लर्निंग सामग्री को दुरुस्त करता है।  

देशभर में दीक्षा की पहुंच

दीक्षा को 2017 में केवल पांच राज्यों में शुरू किया गया था और आज इसे 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में किसी न किसी रूप में राज्यों से मान्यताप्राप्त स्कूलों में दसवीं कक्षा तक लागू किया जा रहा है। सीबीएसई भी डिजिटल लर्निंग कंटेंट के लिए पहली से दसवीं कक्षा तक की किताबों में क्यूआर कोडिंग पर विचार कर रहा है। इसके अलावा सीबीएसई 100 से अधिक स्कूलों से कंटेंट लेकर छात्रों और शिक्षकों को संसाधन के रूप में तैयार कर रहा है। इनमें अध्याय योजना, पावर पॉइंट्स और पढ़ाने-समझाने के वीडियो जैसे शिक्षण संसाधन तथा प्रयोगात्मक लर्निंग वीडियो, बहुवैकल्पिक प्रश्न तथरा दीर्घ एवं लघु उत्तर जैसे छात्र संसाधन शामिल हैं। 

दीक्षा परियोजना मानव संसाधन विकास मंत्रालय के दिमाग की उपज है जिसे सीबीएसई लागू कर रहा है। इसका मकसद छात्रों और शिक्षकों को सशक्त बनाने के लिए डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म मुहैया कराना है। वे दीक्षा ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं, अध्याय के अंत में दिए गए क्यूआर कोड को स्कैन कर सकते हैं और टेक्स्ट, ऑडियो तथा वीडियो की मल्टीमीडिया सामग्री तक पहुंच सकते हैं। दीक्षा की खूबी यह है कि इसमें कंटेंट बनाने की आजादी है, यह छात्रों और शिक्षकों की जरूरत पर निर्भर करता है और इसे अकादमिक सत्र के बीच में अपडेट किया जा सकता है। 

उदाहरण के लिए माध्यमिक बोर्ड की परीक्षाएं सिर पर हैं और कर्नाटक का विद्यालयी शिक्षा विभाग क्यूआर कोड के जरिये छात्रों को संभावित सवाल और उनके जवाब मुहैया कर रहा है। हर अध्याय के अंत में कोड दिया गया है, लेकिन विभाग अब उन्हें करीब 40-45 सवालों और उनके सर्वश्रेष्ठï उत्तरों के साथ लिंक कर रहा है। 

सीबीएसई की चेयरपर्सन अनीता करवल कहते हैं, 'एक राज्य द्वारा विकसित कंटेंट का इस्तेमाल दूसरा राज्य आसानी से कर सकता है। उन्हें केवल सबटाइटल देना होगा या वॉइस ओवर करना होगा और वे इस वीडियो को अपने क्यूआर कोड में डालकर इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा खूब हो रहा है।' 

सनबर्ड का इस्तेमाल 

क्यूआर कोड आधारित डिजिटल लर्निंग प्रौद्योगिकी एक ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म है जिसे सनबर्ड नाम दिया गया है। शुरुआत में एकस्टेप फाउंडेशन ने इस विकसित किया था। यह यूएडीएआई के पूर्व चेयरमैन और इन्फोसिस के सह संस्थापक नंदन निलेकणि और उनकी पत्नी रोहिणी द्वारा संचालित गैर-लाभकारी संस्था है। सनबर्ड एक ऐसी डोर है जिस पर भारी मात्रा में डिजिटल लर्निंग कंटेंट विकसित किया गया है। पाठ्य पुस्तकों पर प्रकाशित क्यूआर कोड के जरिये छात्रों को इसकी पेशकश की जा रही है। 

एकस्टेप फाउंडेशन के मुख्य कार्याधिकारी शंकर मारूवाड़ा कहते हैं, 'यह सीखने के लिए लाइनक्स की तरह ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है। लेकिन यह ऐसी प्रौद्योगिकी है जो भारत की विविधता को देखते हुए देश के लिए देश में ही विकसित की गई है। सनबर्ड अपने आप में कोई समाधान नहीं है बल्कि एक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर है जो आपको समाधान की क्षमता देता है। कोई भी इस प्लेटफॉर्म पर जा सकता है और लर्निंग के लिए कंटेंट बनाने में इसका इस्तेमाल कर सकता है। जैसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने दीक्षा के लिए किया है और कई राज्य तथा गैर सरकारी संगठन कर रहे हैं।'

इसके कंटेंट को स्मार्टफोन या पर्सनल कम्प्यूटर के जरिये ऑनलाइन या ऑफलाइन हासिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र सरकार कॉलेज छात्रों के लिए वित्तीय प्रौद्योगिकी पर कंटेट बनाने के लिए सनबर्ड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही है। आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने इस प्लेटफॉर्म पर नैशनल अर्बन लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू करने के लिए एक एजेंसी के साथ करार किया है।  

लर्निंग प्लेटफॉर्म शिक्षालोकम

इन्फोसिस के सह-संस्थापक एसडी शिबूलाल और उनकी पत्नी द्वारा गठित गैर-लाभकारी संगठन अद्वैत फाउंडेशन ने सनबर्ड का इस्तेमाल करके स्कूली शिक्षकों के लिए एक लर्निंग प्लेटफॉर्म बनाया है जिसे शिक्षालोकम नाम दिया गया है। विश्व बैंक ने भी इस सॉफ्टवेयर को पेरू और कोस्टारिका जैसे कई अन्य देशों में ले जाने में दिलचस्पी दिखाई है। लेकिन सनबर्ड का सबसे बेहतर इस्तेमाल दीक्षा परियोजना के जरिये स्कूली शिक्षा में हुआ है। अब तक प्ले स्टोर में 70 लाख से अधिक बार दीक्षा ऐप को डाउनलोड किया जा चुका है और 15 से अधिक भाषाओं में 50 करोड़ से अधिक पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं। मोटे तौर पर करीब 11-12 करोड़ छात्र और 30-40 लाख शिक्षक इससे लाभांवित हो रहे हैं। रोहिणी निलेकणि कहती हैं, 'हम प्रौद्योगिकी को सक्षम लोगों को समक्ष बनाने के एक माध्यम के रूप में देखते हैं और देखते हैं कि इसके जरिये हम समस्याओं का कैसे समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले हमें उस समस्या को समझना होगा जिसका हम समाधान करना चाहते हैं और फिर समाधान के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल होता है जिसे हम सोसाइटल प्लेटफॉर्म थिंकिंग कहते हैं।'

आमतौर पर पाठ्यपुस्तक में हर अध्याय में क्यूआर कोड के 1 से 3 पीस होते हैं। इनमें से हर कोड में 1 से 3 कंटेंट होता है। दीक्षा परियोजना के लिए क्यूआर कोड के साथ छात्रों को संख्या का एक अनोखा सेट दिया जाता है। ये संख्याएं जब दीक्षा वेबसाइट में डाली जाती हैं तो वे क्यूआर कोड से जुड़े कंटेंट में ले जाते हैं। 

कुछ राज्यों ने इस परियोजना के क्रियान्वयन में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए महाराष्टï्र ने आठ भाषाओं में सभी कक्षाओं और विषयों की पाठ्यपुस्तकों के लिए क्यूआर कोड है। आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य शिक्षणों के प्रशिक्षण के लिए भी इस प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल पर काम कर रहे हैं। 

कई राज्य भी हैं जो टेक्स्ट और वीडियो से इतर सोच रहे हैं। तमिलनाडु 3डी कंटेंट के साथ प्रयोग कर रहा है। खासकर हृदय जैसे मानव अंगों की जटिलताओं को समझाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। 

सीबीएसई की पहल

इस साल जनवरी से सीबीएसई ने एक और पहल की है जिसे 'क्रिटिकल ऐंड क्रिएटिव थिंकिंग प्रैक्टिस' नाम दिया गया है। इसके तहत हर सप्ताह दीक्षा पर पांच सवाल डाले जाते हैं। ये सवाल विज्ञान, गणित, अंग्रेजी और हिंदी विषयों से संबंधित होते हैं और छात्र की समझ का इम्तेहान लेते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठï अधिकारी कहते हैं, 'हम दीक्षा पोर्टल और ऐप पर छात्रों का ऑनलाइन मूल्यांकन करेंगे। इस तरह हम मुश्किल बिंदुओं के बारे में जानेंगे और उसके आधार पर इन विषयों के बारे में ओर कंटेंट तैयार किया जाएगा।'
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