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व्यावसायिक स्तर पर सूअर पालन में छिपी हैं अपार संभावनाएं

सुरिंदर सूद /  March 22, 2020

पशुधन के क्षेत्र में सूअर पालन सबसे आकर्षक क्षेत्रों में से एक है। इसके कई कारण हैं। सूअर को उर्वरक नस्ल कहा जा सकता है क्योंकि ये एक बार में छह से लेकर 14 तक बच्चों को जन्म देते हैं। एक बार में 8 से 12 बच्चे देना आम बात है। मादा सूअर आठ या नौ महीने की उम्र में ही बच्चे देने के लिए तैयार हो जाती है और अगर इनका बेहतर प्रबंधन किया जाए तो ये एक वर्ष में दो बार गर्भधारण कर सकती हैं। उनके पालन-पोषण की लागत अपेक्षाकृत कम है क्योंकि वे विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों, जैसे क्षतिग्रस्त अनाज, अप्रयुक्त सब्जियां एवं फल, रसोई का कचरा और विभिन्न प्रकार के चारे तथा गन्ने पर जीवनयापन कर सकते हैं। इसके अलावा, वे खाद्य पदार्थ को मांस में बदलने का बेहतर कौशल रखते हैं और 7 से 10 महीनों में 60-90 किलोग्राम वजन के हो जाते हैं। इसलिए, वाणिज्यिक स्तर पर सूअर पालन में निवेश पर प्रतिफल जल्द मिलना शुरू हो जाता है। एक सूअर के बच्चे से शुरू करके इन्हें बहुत जल्दी झुंड के आकार में बदला जा सकता है।

 

इसके बावजूद भारत में वाणिज्यिक स्तर पर सूअर पालन पूरी क्षमता के साथ विकसित नहीं हुआ है। इसके लिए सूअर पालन तथा उसका मांस खाने से जुड़ी धार्मिक तथा सामाजिक मान्यताएं आंशिक तौर पर जिम्मेदार हैं। इसके अलावा इसके प्रसार के लिए अपर्याप्त प्रयास और ढांचागत एवं सेवा संबंधी बाधाओं जैसे कारकों को भी दोष दिया जाए। इसके चलते सूअर पालन ग्रामीण समाज के सामाजिक-आर्थिक स्तर पर भी निचले गरीब घरों तक सीमित रह गया है। हालांकि हाल ही में उद्यमियों ने सॉस, हैम, बेकन तथा सलामी जैसे लोकप्रिय पाक उत्पादों के उत्पादन के लिए वाणिज्यिक सूअर फार्म तथा पोर्क प्रसंस्करण उद्योग स्थापित करने के लिए निवेश शुरू किया है। 

हाल के वर्षों में केरल, पंजाब तथा गोवा जैसे कुछ राज्यों में मध्यम से लेकर बड़े स्तर के सूअर फार्म बनाए गए हैं। होटल, रेस्त्रां और घरेलू क्षेत्रों में संसाधित एवं मूल्य वर्धित पोर्क उत्पादों की मांग का एक बड़ा हिस्सा अब तक आयात के जरिये पूरा किया जाता रहा है। चिकन फीड के तौर पर इस्तेमाल करने तथा वसा, पेंट एवं कॉस्मेटिक उत्पादों को बनाने के लिए सूअर की चर्बी की मांग में आई हालिया तेजी से वाणिज्यिक स्तर पर सूअर पालन को बढ़ावा मिलने की संभावना है। 

भारत में सूअर पालन पर व्यवस्थित शोध 1970 के दशक की शुरुआत में कृषि विश्वविद्यालयों तथा पशुधन अनुसंधान केंद्रों के उद्भव के साथ शुरू हुआ। इस दौरान, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने असम, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में अपने केंद्रों के साथ सूअरों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना शुरू की। 

हालांकि वर्ष 2012 में प्रोटीन सप्लीमेंट पर राष्ट्रीय मिशन की स्थापना के साथ सूअर पालन अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में तेजी आई। इस मिशन के तहत विभिन्न राज्यों में 16 सूअर प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए जिनमें से प्रत्येक केंद्र के पास अपनी स्वयं की प्रजनन इकाइयां हैं। इन केंद्रों ने प्रजनन उद्देश्यों से किसानों को वितरण करने के लिए उच्च नस्ल के नर सूअरों का उत्पादन किया।

सूअरों की कई नई नस्लों को स्थानीय तथा विदेशी नस्लों के प्रजनन से विकसित किया गया है। वर्ष 2012 की पशु जनगणना से पता चला है कि विदेशी तथा क्रॉस-ब्रीड सूअरों की आबादी अब लगातार बढ़ रही है, जबकि घरेलू सूअरों की संख्या में कमी आ रही है। हालांकि अभी भी कुल संख्या में मामले में स्थानीय सूअर, विदेशी या क्रॉस-ब्रीड सूअरों से काफी अधिक हैं। घरेलू सूअरों की संख्या में आ रही गिरावट चिंता का कारण है क्योंकि देसी नस्लों के सूअरों में कई वांछनीय विशेषताएं होती हैं जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता होती है।

इन्हें आईसीएआर द्वारा प्रकाशित 'स्वाइन जेनेटिक रिसोर्सेज ऑफ इंडिया' में दर्ज किया गया है। अपनी तरह के इस पहले प्रकाशन में विदेशी सूअरों के मुकाबले देसी नस्ल के सूअरों के लाभ के बारे में भी बताया गया है। स्थानीय सूअर यहां की गरम तथा नम जलवायु के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित होते हैं, बीमारियों के खिलाफ उच्च प्रतिरक्षा होती है और कम लागत तथा खराब प्रबंधन में भी जीवित रह सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में, विशेष तौर पर पूर्वोत्तर में मांस के बेहतर स्वाद के कारण देसी सूअरों को ही पसंद किया जाता है। 

सूअरों पर प्रकाशित इस संग्रह में सिफारिश की गई है कि क्रॉस-ब्रीड नस्ल में विदेशी वंशानुक्रम 50 प्रतिशत तक सीमित होना चाहिए और असाधारण मामलों में यह 75 प्रतिशत तक जा सकता है। इसके अलावा, बेहतर परिणाम के लिए प्रजनन कार्यों में जमाकर रखे हुए वीर्य के स्थान पर जीवित जानवरों का उपयोग किया जाए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, इसमें सभी देसी सूअर प्रजातियों के संरक्षण तथा पंजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया है जिसमें उनकी विशेषताओं का विस्तार से उल्लेख किया जाए।
Keyword: livestock, pig, meat, grain, vegetables, fruit, livelihood,
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