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कोरोनावायरस के दौर में पत्रकारिता

शेखर गुप्ता /  March 22, 2020

आप यदि अपने आलेख का शीर्षक गैब्रिएल गार्सिया मार्केज की मशहूर किताब से चुराते हैं तो इसके लिए आपको लापरवाह, दुस्साहसी और थोड़ा सनकी होना पड़ेगा। सच तो यह है कि हम पत्रकार थोड़े-थोड़े दुस्साहसी, बहादुर और पागल तो होते ही हैं। अगर हमें ऐसी और अन्य गड़बडिय़ों के लिए आमतौर पर माफ भी कर दिया जाता है तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आम तौर पर लोगों को पता होता है कि हम कहां से आ रहे हैं। पत्रकारिता में दशकों का समय बिताने के बाद मैं कह सकता हूं कि मेरे साथ कभी कोई रुखाई से पेश नहीं आया, ऐसे लोग भी जिनके पास नाराज होने की वजह थी। दंगों में, उपद्रवों के दौरान, आपदाओं के वक्त, चुनाव अभियान के दौरान, हम पत्रकारों के साथ अच्छा व्यवहार होता है, बल्कि काफी आदर किया जाता है। कई बार तो ऐसे बदमाश जिन्हें शायद हत्याएं भी करनी पड़ती हों, वे अक्सर पत्रकारों के साथ अपना भोजन साझा करते हैं, आपको सुरक्षित रखते हैं। अपवादों को छोड़ दें तो चोरों में भी सम्मान की भावना होती है।

ऐसा क्यों होता है? इस विविधतापूर्ण देश के एक अरब से अधिक लोगों को किसने बताया कि पत्रकार उनके लिए महत्त्वपूर्ण हैं? कि ये वो अच्छे लोग हैं जिन पर वे अपने जीवन की कहानी और अपने राजनीतिक दृष्टिकोण बताने के लिए भरोसा कर सकते हैं। यदि आप चुनाव प्रचार अभियान के दौरान सफर करें तो आप यह देखकर चौंक जाएंगे कि लोग अनजाने पत्रकारों का भी कितना स्वागत करते हैं और उन्हें लेकर कितने उदार रहते हैं। यह उल्लेखनीय है कि गरीब ग्रामीण महिलाएं भी पत्रकारों से खुलकर बात करती हैं। यह देश की जनता और पत्रकारों के बीच का विशिष्ट सामाजिक अनुबंध है।

इसकी बुनियाद उनकी यह मान्यता है कि हम अपना काम बहुत कर्मठ तरीके से और बहादुरी से करते हैं। यही कारण है कि कई बार जब पुलिस या प्रशासन पीडि़तों की बात नहीं सुनता है तो वे सबसे पहले मीडिया को कॉल करते हैं। आज जब हम कोरोनावायरस के रूप में अपने दौर के बहुत बड़े खतरे का सामना कर रहे हैं तब भी उनकी हमसे यही अपेक्षा है। यह हम पत्रकारों की परीक्षा की घड़ी है। देश की आने वाली पीढिय़ां हमें इस कसौटी पर कसेंगी। प्रथम विश्वयुद्ध की भर्ती के पोस्टर को याद करते हैं जिसमें कहा गया था: पिता, आपने महायुद्ध में क्या किया था?

हमारे लिए भी यह तकरीबन वैसा ही अवसर है। यह एक घातक वैश्विक महामारी है। हर देश अपनी समस्याओं से जूझ रहा है। तमाम लोग परेशान हैं। गत गुरुवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने एक अहम बात कही: आज कोई देश दूसरे की मदद करने की स्थिति में नहीं है।

भारत इसमें अकेला है। हमारा देश जटिल बुनावट वाला है। यहां ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है जो हमसे कम संसाधनों में गुजारा करने वाले और वंचित हैं। भारत में हम पत्रकारों को एक और तोहफा हासिल है और वह है प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता। हमें यह याद रखना होगा कि हमने जिस सामाजिक अनुबंध की बात की वह कहां से आता है। प्रेस की स्वतंत्रता किसी कानून या संविधान में शायद ही संहिताबद्ध है। संविधान का अनुच्छेद देश के हर नागरिक पर समान रूप से लागू होता है और पत्रकारों को कोई विशेष अधिकार नहीं देता। 

इंदिरा गांधी के आपातकाल तक हम स्वतंत्रता को हल्के में लेते रहे। जब आपातकाल में स्वतंत्रता पूरी तरह छिन गई तब कोई राह ही नहीं बची। यहां तक कि हमारी अदालत भी मदद करने की स्थिति में नहीं थी। उस वक्त देश के लोगों को, जो आज से भी ज्यादा गरीब और वंचित थे, यह अहसास हुआ कि इंदिरा गांधी ने उनसे अन्य चीजों के साथ स्वतंत्र प्रेस भी छीन लिया है। ऐसा करना सही नहीं था। कोई प्रतिष्ठान वैसा कदम उठाना नहीं चाहेगा। यह सामाजिक अनुबंध वहीं से पैदा हुआ। यह भारतीय पत्रकारिता के प्रथम संशोधन के समान है, ठीक संविधान की तरह। परंतु यदि उन्होंने हमारी आजादी का इतना मूल्य और संरक्षण किया है तो वे यह निर्णय भी करेंगे कि हम उनके लिए सही हैं या नहीं।

जब मेरे साथी पत्रकार चिंताएं प्रकट करते हैं तो मैं उन्हें सुनता हूं। कोई भी समझदार आदमी पूरी तरह भयमुक्त नहीं होता। भय अच्छी चीज है और खुद को बचाने की भावना बहुत महत्त्वपूर्ण है। पुरानी कहावत है कि जान है तो जहान है। किसी को भी हड़बड़ाने की आवश्यकता नहीं है। उथलपुथल वाले इलाकों में खतरों से जूझते हुए हासिल हुए अनुभव ने मुझे यही सिखाया है। कोई भी अपने साथी पत्रकारों को अवांछित जोखिम में डालना नहीं चाहेगा।

परंतु हम सब पत्रकार हैं। हमारे जीवन की सबसे बड़ी खबर हमारे सामने धीरे-धीरे उद्घाटित हो रही है और एक अरब से अधिक लोग हमसे अधिक आशंकित और कम सुरक्षित हैं। उन्हें हमसे आशा है कि हम आसपास हों नजर रखते हुए, खबर करते हुए, संपादन करते हुए, रिकॉर्डिंग करते हुए और शासन की नाकामी और अन्याय की ओर ध्यान आकृष्टï करते हुए। कोरोनावायरस के कारण उपजी मौजूदा आपदा के वक्त हम पत्रकारों का यह दायित्व है कि हम न्याय और इतिहास को लेकर सबसे पहले प्रतिक्रिया दें। यदि हम ऐसा करने में नाकाम रहे तो यह इतनी बड़ी विफलता होगी कि हम शायद खुद को पत्रकार कहना ही बंद कर दें। ध्यान रहे, हो सकता है हममें से कुछ लोग इस परीक्षण में नाकाम रहें लेकिन हर कोई विफल नहीं होगा। हमारे ही पेशे के कुछ लोग चमकते हुए सामने आएंगे। भविष्य की पीढिय़ां हमेशा इस दौर के कुछ पत्रकारों की सराहना करेंगी। जो लोग पीछे रह जाएंगे उन्हें भी आसानी से नहीं भुलाया जा सकेगा। भले ही उन्हें उस तरह याद नहीं किया जाएगा जैसी कि उन्हें अपेक्षा होगी।

मैंने हमेशा यकीन किया है कि हर चीज उतनी बुरी नहीं होती जितनी कि वह शुरुआत में प्रतीत होती है। एक अवसर को छोड़कर मैं हमेशा सही रहा हूं और वह अवसर था सूनामी। मैं कहूंगा कि सभी इससे बच जाएंगे और हमारे पास ऐसी कहानियां होंगी जिन्हें आगे की उम्र में लोगों को सुना सकेंगे। हम पत्रकार तिलचट्टों की तरह होते हैं, ऐसा कहकर मेरा इरादा इस जीव की बेइज्जती करने का नहीं है। हम भी उनकी तरह हर हाल में जिंदा रहेंगे।

पिछले तनाव भरे सप्ताह में न्यूज रूम में मुझसे एक अच्छा प्रश्न किया गया। क्या होगा अगर हालात वाकई खराब हो जाएं और हममें से कुछ लोग खबर करते हुए मर जाएं तो? उत्तर एकदम आसान है। अगर एकदम विपरीत परिस्थितियों में वैसा होता भी है तो भी कुछ पत्रकार खबर कवर करने के लिए होंगे। पत्रकारिता अपना काम करेगी।

गत गुरुवार को अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने दो बार मीडिया का जिक्र अनिवार्य सेवाओं के रूप में किया, चिकित्सकों, अस्पतालकर्मियों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों के तर्ज पर। साफ कहें तो उसे अनिवार्य सेवाओं के रूप में उल्लिखित किया जाना सुखद बदलाव है। हम जिस दौर में बड़े हुए, हमें महामारी जैसा समझा जाता था।

हमें यह यकीन होना चाहिए कि हम महत्त्वपूर्ण हैं और एक अनिवार्य सेवा देते हैं। हमारा गर्व, हमारी शान, हमारा नियति बोध, सभी एक बात से निकलते हैं कि हम भी मायने रखते हैं। सत्ता के साथ हमेशा हमारे मतभेद रहते हैं और रहेंगे लेकिन ऐसा तो हर लोकतंत्र में होता है।

डॉनल्ड ट्रंप को ही लीजिए जो हमेशा अमेरिका के बेहतरीन पत्रकारों और विश्व के स्तरीय मीडिया संस्थानों की मलामत करते रहते हैं। या फिर बीबीसी से प्रेरणा लीजिए जिसने फॉकलैंड जंग के दौरान मार्गरेट थैचर ने हमला किया था और कहा था कि वह देशभक्त नहीं है और दोनों पक्षों को एक ही तराजू पर तौल रहा है। इस पर बीबीसी रेडियो के तत्कालीन प्रमुख रिचर्ड फ्रांसिस ने कहा था कि बीबीसी को ब्रिटेन की सरकार से देशभक्ति का सबक नहीं सीखना है। उन्होंने कहा कि पोट्र्समाउथ की विधवा और ब्यूनस आयरस की विधवा में कोई अंतर नहीं है।

हम सरकारों से सवाल पूछते रहेंगे और उन्हें खिझाते रहेंगे। वे विरोध करेंगी। यह सिलसिला चलता रहेगा। बस अलग-अलग सरकारों में इसकी तीव्रता अलग-अलग होगी। परंतु मौजूदा संकट जैसे दौर में हमें फिलहाल उन चिंताओं को परे कर देना चाहिए। इसलिए तैयार हो जाइए। कोरोना के दौर में पत्रकारिता एक ऐसी चुनौती है जो पहले कभी नहीं थी।

Keyword: Coronavirus, china, Covid-19, Journalism, Journalist, Media,
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