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बड़े कदम जरूरी

संपादकीय /  March 22, 2020

आज संपूर्ण विश्व कोविड-19 महामारी के कारण उपजी आपदा से जूझ रहा है। दुनिया भर में 11,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लाखों लोग संक्रमित हैं। हालांकि चीन में इस वायरस पर नियंत्रण पाए जाने की खबर है लेकिन भारत समेत दुनिया के अन्य हिस्सों में यह तेजी से फैल रहा है। 

भारत ने रविवार को पूरे देश को बंद करने का निर्णय लिया लेकिन देश के कई हिस्से तो आने वाले कई सप्ताह तक बंद रहेंगे। रेलवे ने उपनगरीय रेल सेवा समेत सभी यात्री ट्रेनों का परिचालन आगामी 31 मार्च तक रद्द कर दिया है। वायरस को रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। इसका आर्थिक गतिविधियों पर भी लाजिमी तौर पर असर होगा। दुनिया भर में सरकारें और केंद्रीय बैंक नुकसान को सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं। अमेरिका में जहां फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को करीब शून्य कर दिया है और वह व्यवस्था में नकदी डाल रहा है, वहीं सरकार भी करीब एक लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज दे रही है। चूंकि अभी नुकसान की व्यापकता का अंदाजा नहीं है इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि क्या दुनिया भर में उठाए जा रहे कदम पर्याप्त होंगे? आर्थिक पूर्वानुमान भी समय के साथ बदलेंगे। भारत पर भी बहुत बड़ा आर्थिक प्रभाव पडऩे जा रहा है। 

सरकार ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अधीन आर्थिक कार्यबल बनाने की घोषणा करके सही किया है ताकि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें। और सक्रियता दिखाने की आवश्यकता है। इससे इतनी व्यापक उथलपुथल मच रही है कि जो उपाय कई महीनों में अपनाने थे उन्हें तेजी से अपनाने की जरूरत है। 

अर्थव्यवस्था पिछली कई तिमाहियों से गिरावट पर थी और सरकार की वित्तीय व्यवस्था पहले ही काफी दबाव में है। अभी प्राथमिक लक्ष्य वायरस पर नियंत्रण करना होना चाहिए। इसके साथ ही साथ सरकार यह सुनिश्चित करे कि अर्थव्यवस्था पर इसके असर को न्यूनतम किया जा सके। केंद्रीय बैंक के साथ-साथ सरकार को भी कई स्तरों पर हस्तक्षेप करना होगा।

उदाहरण के लिए कई कारोबारों को नकदी की समस्या का सामना करना होगा और उनके अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो जाएगा। ढेर सारे छोटे कारोबार शायद नियामकीय नरमी के बावजूद बच नहीं पाएं। इसके अलावा अनेक कारोबारियों ने विदेशों से ऋण लिया होगा और वैश्विक वित्तीय तंत्र में डॉलर की कमी के चलते शायद वे अपने ऋण को रोलओवर न कर पाएं। भारतीय बैंकों की हालत देखते हुए इन कारोबारों को घरेलू स्तर पर वित्तीय मदद दे पाना आसान नहीं होगा। 

भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ कदम उठाए हैं लेकिन उसे आने वाले दिनों में काफी कुछ करना होगा। सरकार को आय को हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए आगे आना होगा। खासतौर पर असंगठित क्षेत्र में। अर्थशास्त्रियों और टीकाकारों ने प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की सिफारिश की है और यह संकट से निपटने का अच्छा तरीका हो सकता है। सरकार को न केवल स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की मदद पर ज्यादा खर्च करना चाहिए बल्कि उसे कम होते कर संग्रह से भी जूझना है।

स्पष्ट है कि राजकोषीय विस्तार अब अपरिहार्य है लेकिन वह बड़ी चुनौती है क्योंकि घाटे में कोई भी अहम इजाफा मुद्रा की लागत बढ़ाएगा और पहले से दबाव झेल रहे कारोबारों को प्रभावित करेगा। देश की वृहद आर्थिक सीमाओं को समझना भी जरूरी है। विकसित देशों के उलट वित्तीय संकट के बाद हमारे यहां राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन ने आर्थिक अस्थिरता को जन्म दिया था। ऐसे में जहां निकट भविष्य में बड़े नीतिगत कदम आवश्यक हैं, वहीं नीति निर्माताओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि मौजूदा संकट से उबरकर देश किसी दूसरे संकट में न उलझ जाए।

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