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भारत को एक व्यापक स्वास्थ्य कानून की जरूरत

गीतिका श्रीवास्तव /  March 22, 2020

बॉलिवुड गायिका कनिका कपूर हाल में कोरोनावायरस (कोविड-19) से संक्रमित पाए जाने के बाद सुर्खियों में आ गई क्योंकि उन्हें कई हाई-प्रोफाइल पार्टियों में शामिल हुई थीं। वह लंदन से लौटी थीं लेकिन कथित तौर पर उन्होंने 14 दिनों तक अलग-थलग रहने की आवश्यकता को नजरअंदाज कर दिया। केंद्र सरकार ने कोविड-19 से संक्रमित लोगों को दो सप्ताह तक अलग-थलग रहने का सुझाव दिया था।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में लोगों को स्वैच्छिक तौर पर खुद को अलग-थलग रहने के लिए कहा गया है। अधिकतर मामलों में इस महामारी का संक्रमण फैलने का मुख्य कारण लोगों द्वारा अनिवार्य तौर पर खुद को अलग-थलग रखने को नजरअंदाज करना और भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाना रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के वकील निपुण सक्सेना ने कहा, 'कोरोनावायरस से संक्रमित होने के लक्षण वाले लोगों को अनिवार्य तौर पर अलग-थलग रहने के लिए फिलहाल कोई कानून नहीं है। इसलिए यह संक्रमण तेजी से फैल रहा है।' यह महज एक बानगी है कि भारत में वैश्विक महामारी जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा संबंधी कानूनों की क्या स्थिति है।

भले ही सरकार कोविड-19 वैश्विक महामारी से निपटने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है लेकिन इसके लिए बुनियादी कानून महामारी रोग अधिनियम, 1897 करीब 123 साल पुराना है। भारत में आपात परिस्थितियों की आपात सेवाएं इसी कानून से शासित होती हैं। औपनिवेशिक काल के इस कानून को बंबई में फैली प्लेग महामारी से निपटने के लिए बनाया गया था। इसकी चार धाराओं को महज तीन पृष्ठों में दिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे में इस वैश्विक महामारी से जूझ रहे प्रशासन के लिए यह एक बुनियादी समस्या है। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्यों की सूची में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का जिक्र किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार राज्यों को कानूनों और विनियमों को लागू करने के लिए केवल सलाह दे सकती है और वह उसे अनिवार्य नहीं बना सकती। सक्सेना ने कहा, 'इस कानून के तहत केंद्र सरकार को दी गई शक्तियां काफी सीमित हैं और इस संबंध में उपयुक्त विनियम तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार को दी गई है।' कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए सभी राज्य सरकारों ने कोई उपयुक्त कानून नहीं बनाया है। उन्होंने कहा, 'जिन राज्यों ने इस प्रकार का कानून बनाया है उसने इसे अधिसूचित करने से पहले खूबियों और खामियों पर पर्याप्त मंथन किया है।'

हालांकि सरकार को पता है कि भारत में इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है और इसलिए उसने आपदा प्रबंधन कानून के तहत इस बीमारी को एक 'अधिसूचित आपदा' करार दिया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को विनियमित करने वाले ऐसे किसी कानून से भारत को कोविड-19 वैश्विक महामारी से निपटने में काफी मदद मिल सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन से संबद्ध एक वैश्विक स्वास्थ्य वकील कशिश अनेजा ने कहा कि महामारी अधिनियम संविधान की धारा 19 और 21 के तहत बताई गई सीमाओं को पूरा नहीं करता है। उन्होंने कहा कि इस कानून में चार प्रमुख खामियां हैं। इनका संबंध स्वास्थ्य सेवा कर्मियों, यात्रा प्रतिबंधों, निजी अधिकारों और स्वास्थ्य सेवा संबंधी चुनौती से निपटने के लिए आवश्यक निवेश से है। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत स्वास्थ्य सेवा संगठन के अंतरराष्टï्रीय स्वास्थ्य विनियम (आईएचआर) पर हस्ताक्षर करने वाला देश है लेकिन घरेलू कानून की तमाम खामियों को दूर करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, वाणिज्यिक उड़ानों पर पूरी तरह प्रबंध को आईएचआर की धारा 43 के साथ संबंद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके उतने ही जोखिम का भी उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार किसी रोगी की निजता और उनकी चिकित्सा जानकारियों के खुलासे में आम लोगों की जरूरत के साथ संतुलन बनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कानून के तहत इस प्रकार के किसी संतुलन को बरकरार रखने का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे किसी विशेष कानून में इस प्रकार की परिस्थितियों से निपटने के लिए एक आपात कोष बनाने का भी प्रावधान हो सकता है। लखनऊ के राष्टï्रीय विधि विश्वविद्यालय के शोधकर्ता शाश्वत अवस्थी ने कहा, 'मौजूदा ढांचे के तहत निगरानी, टीकाकरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति कार्रवाई पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है।'

दुनिया भर में देशों ने कोरोनावायरस जैसी महामारी से निपटने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा कानूनों पर विशेष जोर दिया है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया के संविधान के अनुच्छेद 51 में सरकार को संकमित व्यक्तियों को अलग-थलग रखने के अधिकार दिए गए हैं। आईएचआर के प्रति ऑस्ट्रेलिया की प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने के लिए राष्टï्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम एवं समझौता नाम से कानून तैयार किया गया है।

अमेरिका में स्वास्थ्य एवं मानव सेवा (एचएचएस) ने स्वास्थ्य संकट के दौरान राज्यों को मदद देने और संक्रामक बीमारियां रोकने के लिए विशेष दिशानिर्देश जारी किए हैं। द रॉबर्ट टी स्टैटफोर्ड ऐक्ट का इस्तेमाल कर वहां राष्टï्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने आपात स्थिति की घोषणा की है। फेडरल फूड, ड्रग ऐंड कॉस्मेटिक ऐक्ट के तहत एचएचएस सचिव आपात स्थिति में गैर-प्रमाणित दवाओं, टीकों और स्वास्थ्य संबंधी अन्य उपायों के इस्तेमाल को जाजज ठहरा सकता है। भारत में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है।

यूरोपीय संघ में यूयू डिसिजन 1082/13 एक अहम प्रावधान है। इसमें आईएचआर के अनुपालन पर जोर दिया गया है। आईएचआर और डिसिजन 1082/13 कानूनों पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को महामारी से जुड़ी तैयारियों के लिए राष्टï्रीय योजनाएं तैयार करना जरूरी है। कई देशों ने ऐसे प्रावाधान तैयार किए हैं, जिनके तहत जबरन एकांतवास या वस्तुओं एवं जायदाद जब्त किए जा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूरोपीय संघ इन योजनाओं को समर्थन देने के लिए कानूनी ढांचे के इस्तेमाल पर भी जोर दे रहे हैं। 

स्पेन में महामारी के मद्देनजर सभी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया है। भारत में ऐसे कदम मुमकिन नहीं दिख रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक-निधि साझेदारी से जुड़े दिशानिर्देशों पर जरूर कयास लगा रहे हैं।
Keyword: Coronavirus, china, Covid-19, Kanika Kapoor, Health Law,
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