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उपभोक्ता फोरम में जा सकते हैं निर्माण श्रमिक

एमजे एंटनी /  March 22, 2020

भवन एवं अन्य संनिर्माण कानून के तहत पंजीकृत निर्माण कामगार इसके तहत बनाई गई योजना का लाभार्थी है और वह उपभोक्ता मंच (फोरम) में जा सकता है क्योंकि वह एक उपभोक्ता है। उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह यह व्यवस्था दी। यह फैसला अहम है क्योंकि कर्मचारी भविष्य निधि जैसी सभी वैधानिक कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी इसके दायरे में आएंगे। इस मामले से पता चलता है कि कैसे आम लोगों का उत्पीडऩ किया जाता है। उनसे दर्जनों दस्तावेज मांगे जाते हैं जो अमूमन उनके पास नहीं होते हैं। संयुक्त श्रम आयुक्त बनाम केसर लाल वाद में कामगार ने फीस का भुगतान करके श्रम लाभार्थी पहचान पत्र हासिल किया था। जब उसने अपनी बेटी की शादी के लिए वित्तीय मदद मांगी तो श्रम आयुक्त ने नौ महीने बाद खामियों की एक लंबी सूची के साथ आवेदन को खारिज कर दिया। आयुक्त का कहना था कि इसमें वैध जन्मतिथि नहीं थी, हलफनामा सही नहीं था, आवेदन पत्र में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी और योजनाकार का प्रमाणपत्र नहीं लगाया गया था। निर्माण कार्यों में लगे 327 कामगारों के आवेदन रद्द करने के बाद मामला उपभोक्ता मंचों में पहुंचा। इन मंचों ने केसर लाल के दावे को स्वीकार कर लिया और आयुक्त की अपील को खारिज कर दिया।  

मध्यस्थता अपील के मामलों में क्षेत्राधिकार

मध्यस्थता पंचाट के फैसले के खिलाफ किस अदालत में अपील की जाए, यह सवाल एक बार फिर उच्चतम न्यायालय में समक्ष आया और उसने मामले को हरियाणा के फरीदाबाद से दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया। हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाम एनएचपीसी लिमिटेड वाद में फरीदाबाद की विशेष वाणिज्यिक अदालत ने फैसला दिया कि इसका क्षेत्राधिकार फरीदाबाद होगा। अनुबंध के मुताबिक इसमें दिल्ली के साथ-साथ फरीदाबाद की अदालतों का क्षेत्राधिकार होगा क्योंकि दोनों पक्षों ने फरीदाबाद में अनुबंध किया था। विवाद की शुरुआत वहीं हुई और सबसे पहले मामला फरीदाबाद अदालत में ही पहुंचा। मध्यस्थता एवं सुलह कानून की धारा 42 का मकसद विशेष तौर से एक अदालत में मध्यस्थता के संबंध में सभी मध्यस्थ कार्यवाही पर पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार की व्यवस्था करके अदालतों के क्षेत्राधिकार पर टकराव को टालना है। अगर अदालत के क्षेत्राधिकार के बारे में अनुबंध में साफ उल्लेख है तो कोई समस्या नहीं है। लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब अनुबंध में क्षेत्राधिकार या मध्यस्थता की जगह के बारे में स्पष्टï प्रावधान नहीं होता है और विवाद कई राज्यों से जुड़ा हो। इस मामले में मामला पहले फरीदाबाद की अदालत में पहुंचा लेकिन उच्चतम न्यायालय ने 2019 में एनएचपीसी से जुड़े अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय अपील पर सुनवाई करेगी।  

झारखंड में कोयले की ई-नीलामी सही

उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह झारखंड उच्च न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें कुसुंडा इलाके से निकाले गए कोयले की ई-नीलामी को निरस्त कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने नए सिरे से ई-नीलामी का आदेश दिया था और सतर्कता विभाग को मामले की जांच के आदेश दिए थे। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड बनाम एएमआार देव प्रभा वाद में सी1 इंडिया लिमिटेड ने टाटा कम्युनिकेशंस लिमिटेड के तकनीकी सहयोग से नीलामी की थी। तकनीकी गड़बड़ी के कारण ऑनलाइन बोली के एक चरण में व्यवधान पैदा हुआ था और इसके कारण नीलामी की अवधि बढ़ाई गई थी। आखिरकार आरके ट्रांसपोर्ट कंपनी को ठेका दे दिया गया। बोली लगाने वाली प्रतिद्वंद्वी कंपनी एएमआर देव प्रभा ई-नीलामी को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया। कोयला कंपनी ने इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। शीर्ष अदालत सीमित बैंडविड्थ जैसी तकनीकी समस्याओं में नहीं गई और कहा कि ये तथ्य से जुड़े सवाल थे। सर्टइन और टीसीएल जैसी विशेषज्ञ तकनीकी कंपनियों और सीवीसी की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि कोई तकनीकी मुश्किल नहीं थी।  

वास्तुकार नहीं हैं सभी बिल्डिंग प्लानर

वास्तुकार अधिनियम ऐसे लोगों को वास्तुकार की तरह काम करने और संबंधित गतिविधियां चलाने से नहीं रोकता है जो इसके तहत पंजीकृत नहीं हैं। हालांकि, अगर किसी व्यक्ति को वास्तुकार की उपाधि का इस्तेमाल करना है तो उसके पास वास्तुकला की डिग्री होनी चाहिए और उसे खुद को वास्तुकला परिषद में पंजीकृत कराना होगा। उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह वास्तुकार परिषद बनाम मुकेश गोयल वाद में अपील पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। न्यायालय ने कहा कि कानून की धारा 37 में साफ कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति वास्तुकार परिषद में पंजीकृत नहीं है तो वह वास्तुकार की उपाधि और शैली का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। लेकिन यह गैर पंजीकृत लोगों को भवनों का डिजाइन बनाने, उनके सुपरविजन और निर्माण से नहीं रोकता है। न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में एक वर्ग ने विभागीय वास्तुकारों की प्रोन्नति को चुनौती दी थी। इससे वास्तुकार की व्याख्या करना जरूरी हो गया। कोई सरकारी विभाग वास्तुकार शब्द से बचने के लिए अपना नाम बदल सकता है और शहरी नियोजन तथा निर्माण की सामान्य गतिविधि चला सकता है।  

आईवीपी की चोरी के लिए डाकघर जिम्मेदार नहीं

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि डाक विभाग के अधिकारी उन इंदिरा विकास पत्रों (आईवीपी) का परिपक्वता मूल्य देने के लिए उत्तरदायी नहीं है जो कथित रूप से उनके धारकों से चुराए गए थे। दो लोगों ने शिकायत की कि उनके आईवीपी चोरी हो गए हैं और उन्होंने इस बारे में ओडिशा पुलिस को जानकारी दी थी। जब उन्होंने डाकघर में इस राशि का दावा किया तो अधिकारियों ने उन्हें भुगतान करने से इनकार कर दिया। उनकी दलील थी कि अगर आईवीपी को नकद खरीदा गया था तो खरीदार की पहचान का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था और करेंसी नोटों की तरह सभी आईवीपी धारक प्रतिभूतियां हैं। धारकों ने जब उपभोक्ता फोरम का रुख किया तो उसने डाक अधिकारियों को परिपक्वता मूल्य देने का आदेश किया क्योंकि लंबे समय तक किसी ने भी दावा नहीं किया। लेकिन उनकी अपील खारिज हो गई। डाक विभाग बनाम जंबू कुमार वाद में उच्चतम न्यायालय ने डाक अधिकारियों को किसी भी देनदारी से मुक्त कर दिया।  

डिज्नी को कॉपीराइट संरक्षण

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 130 से अधिक वेबसाइटों पर डिज्नी एंटरप्राइजेज इंक के कॉपीराइट का उल्लंघन करने पर रोक लगा दी है। कंपनी ने अपनी सामग्री के अवैध और अनधिकृत वितरण, प्रसारण, पुनर्प्रसारण और स्ट्रीमिंग की शिकायत की थी। मनोरंजन क्षेत्र की इस दिग्गज वैश्विक कंपनी ने अपनी याचिका में इस मामले में इन वेबसाइटों के आईएसपी को जोड़ा और दूरसंचार विभाग को पक्ष बनाया। कंपनी ने साथ ही एक खोजी एजेंसी की भी सेवाएं ली जिसके मुताबिक इन वेबसाइटों के जरिये मूल फिल्मों, टेलीविजन प्रोग्रामों और ऑडियो-विजुअल सामग्री को डाउनलोड किया जा रहा था और उनकी स्ट्रीमिंग हो रही थी। कंपनी ने साथ ही आरोप लगाया कि ये वेबसाइट पैरामाउंट पिक्चर्स कॉरपोरेशन, कोलंबिया पिक्चर्स, यूनिवर्सल सिटी स्टूडियो एलएलसी और नेटफ्लिक्स एंटरटेनमेंट सर्विसेज इंडिया एलएलपी जैसी मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों की सामग्री उपलब्ध कराने में लगी हैं। यह कॉपीराइट का उल्लंघन है। उच्च न्यायालय ने इन वेबसाइटों पर रोक लगाते हुए कहा कि डिज्नी ने कॉपीराइट के उल्लंघन के मामले को साबित किया है और अगर इस गतिविधि पर रोक नहीं लगाई गई तो उसे अपूरणीय क्षति होगी। जिन वेबसाइटों पर रोक लगाई गई है उन्हें डिज्नी को मुकदमा लडऩे का खर्च देना होगा। 
Keyword: Consumer Forum, House, Building construction, Appeal, Tribunal, labour,
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