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बिजली उत्पादन कंपनियों पर कोयले का भारी बकाया

श्रेया जय / नई दिल्ली March 22, 2020

बिजली उत्पादन कंपनियों को कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल), सिंगरेनी कोलरीज लिमिटेड (एसएससीएल) और नेयवेली लिग्नाइट लिमिटेड (एनएलसी) को 22,700 करोड़ रुपये भुगतान करना है। जनवरी 2020 तक के आंकड़ों के मुताबिक इसमें सबसे ज्यादा 12,423 करोड़ रुपये सीआईएल का बकाया है। बिजली उत्पादन कंपनियों (जेनको) पर बकाया पिछले एक साल में 16 प्रतिशत बढ़ा है और कोयला खनन कंपनियों का बकाया बढ़कर 4 साल के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया है। 

राज्यों के हिसाब से देखें तो तमिलनाडु और तेलंगाना का बकाया क्रमश: एनएलसी और एससीसीएल पर सबसे ज्यादा है। एससीसीएल को जहां पिछला 4,092 करोड़ रुपये मिल गया, वहीं मौजूदा बकाया जनवरी तक बढ़कर 6,286 करोड़ रुपये हो गया है। कोयला, स्टील पर बनी संसद की स्थायी समिति को अपनी प्रस्तुति में सीआईएल ने कहा है कि चूक के बावजूद उसने राष्ट्रहित में कोयला आपूर्ति जारी रखी है, जिससे बिजली आपूर्ति प्रभावित न हो। 

इसमें कहा गया है, 'कोल इंडिया ईंधन आपूर्ति समझौते के तहत ग्राहकों को कोयले की आपूर्ति करती है, जो उन्हें कोयला आपूर्ति के लिए अग्रिम भुगतान करते हैं। बहरहाल कई बार राष्ट्रीय हित और बाधारहित बिजली उत्पादन को ध्यान में रखते हुए एसईबी, राज्य की बिजली उत्पादन कंपनियों, सीपीएसयू की ओर से समय से भुगतान न होने पर भी कोयले की आपूर्ति की जाती है। इसकी वजह से बकाया आगे और बढ़ता जाता है।' इनका ज्यादातर बकाया राज्य व केंद्र सरकार की उत्पादन कंपनियों पर है। सीआईएल ने कहा कि देर से भुगतान पर शुल्क लगाने का प्रावधान समझौते में है, जिसका दावा उसने नहीं किया है। 

सरकारी बिजली कंपनियां केंद्र की और निजी बिजली उत्पादन कंपनियों का बकाया भी नहीं कर पा रही हैं। सरकारी बिजली वितरण कंपनियों का केंद्र और निजी बिजली उत्पादन कंपनियों को देयता दिसंबर 2019 के अंत तक 85,407 करोड़ रुपये हो गई है, जो जनवरी 2019 की तुलना में 56 प्रतिशत ज्यादा है। राज्यों को अक्षय ऊर्जा उत्पादकों को भी 9,000 करोड़ रुपये भुगतान करना है। 

राज्य की वितरण कंपनियों का कुल मिलाकर घाटा दिसंबर में 18,316 करोड़ रुपये था। बढ़ते बकाये के बारे में स्थायी समिति ने कोयला कंपनियों से कहा है कि इसकी वसूली के लिए कड़े कदम उठाए जाएं। इसमें कहा गया है, 'समिति चाहती है कि इस मामले को ज्यादा गंभीरता से लिया जाए और अगर जरूरत पड़े दो देरी से भुगतान का अधिभार लगाने पर भी विचार किया जाए।' 
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