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मोंटेक के साथ आर्थिक नीति-निर्माण का सफर

शंकर आचार्य /  March 20, 2020

मोंटेक सिंह आहलूवालिया की बहुप्रतीक्षित किताब 'बैकस्टेज' पिछले महीने प्रकाशित हुई। इस किताब की शुरुआती पंक्तियों में मोंटेक कहते हैं कि यह कोई संस्मरण न होकर भारत का आर्थिक यात्रा-वृत्तांत है। उसी तरह की साफगोई के साथ मैं यह कह सकता हूं कि यह लेख कोई पुस्तक समीक्षा नहीं है बल्कि एक अहम एवं पढ़ी जाने लायक किताब पर मेरे कुछ विचार भर हैं।

मोंटेक पिछले 55 वर्षों से मेरे दोस्त हैं जिसकी शुरुआत 1960 के दशक में ऑक्सफर्ड में पढ़ाई के दौरान हुई थी। उसके बाद सत्तर के दशक में मैकनेमारा के विश्व बैंक में एक युवा पेशेवर के तौर पर हम आठ साल साथ रहे। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हम 15 साल भारत सरकार का हिस्सा भी रहे जिनमें 1990 के दशक में शुरू हुए आर्थिक सुधार के साल भी शामिल हैं।

मोंटेक निस्संदेह प्रतिभाशाली एवं प्रतिबद्ध 'आर्थिक नीति-विशेषज्ञों' के एक छोटे समूह के अग्रणी सदस्य हैं जिन्होंने आजादी के बाद से भारत में आर्थिक नीति के पालन में आर्थिक विवेक का अंश शामिल कराने के लिए कड़ी मेहनत की है। राजनीति, नौकरशाही, मनोदशा और चौतरफा फैली आर्थिक निरक्षरता के चलते पैदा होने वाली चुनौतियों को दरकिनार करते हुए ये नीति-विशेषज्ञ ऐसा कर पाए हैं। इस ख्यातिलब्ध समूह में एल के झा, आई जी पटेल, मनमोहन सिंह, सी रंगराजन, विजय केलकर, विमल जालान और वाई वी रेड्डïी के नाम भी शामिल हैं। नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों की संकल्पना से लेकर उनके सफल क्रियान्वयन तक में इस चुनिंदा समूह के दिग्गजों की किसी-न-किसी रूप में सरकार के भीतर अहम पदों पर मौजूदगी रही। प्राथमिक तौर पर कहा जा सकता है कि हमारी मौजूदा आर्थिक दुर्दशा का एक कारण पिछले कुछ वर्षों में इस सामथ्र्य एवं अनुभव वाले आर्थिक विशेषज्ञों के नीति-निर्माण से दूर रहना भी है।

यह किताब पिछले 40 वर्षों में भारत की आर्थिक नीतियों का एक दिलचस्प ब्योरा देता है। इसे राष्ट्रीय स्तर के एक प्रमुख नीति-निर्माता के नजरिये से लिखा गया है जिसने असाधारण रूप से लंबी एवं उत्पादक पारी खेली थी। इस किताब में वृद्धि, वित्त एïवं व्यापार के वृहद आयामों से लेकर कृषि, उद्योग, आधारभूत ढांचे, दूरसंचार, डिजिटल एवं सामाजिक सेवाओं जैसे तमाम अहम क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इन सबमें समान बात सुधारों की पहल है या हर पल बदलते राजनीतिक परिदृश्य, पुरानी सोच एवं विचारधारा और निहित स्वार्थों के जमीनी हालात के संदर्भ में कम-से-कम हालात बेहतर करने की कवायद है। कहानी को सजीव ढंग से, साफगोई और पूरी निष्ठा के साथ बयां किया गया है जिसमें हास्य एवं व्यंग्य का भी पुट है। इसमें कोई निंदा या गुस्से का भाव नहीं है। इस किताब को पढऩे पर लेखक की विलक्षणता, उठाए गए मुद्दों पर उनकी महारत और वृद्धि एवं आर्थिक कल्याण को लेकर प्रतिबद्धता का भाव झलकता है। आर्थिक नियंत्रण के निष्क्रिय हो चुके उपायों को उदार बनाने और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारत की उत्पादक संबद्धता को बढ़ाने पर खास जोर दिया गया है।

इस किताब में दिए गए तमाम हास्यपूर्ण किस्सों में से उदाहरण के तौर पर मैं लोक सेवकों से संबंधित किस्से का उल्लेख करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूं। जब वी पी सिंह ने दिसंबर 1989 में प्रधानमंत्री पद संभाला था तो बी जी देशमुख और मोंटेक को क्रमश: प्रमुख सचिव एवं विशेष सचिव के पदों पर बने रहने को कहा गया था। इस पर मोंटेक के मन में उपजी दुविधा को दूर करते हुए देशमुख ने कहा था, 'मोंटेक, दिल्ली ऐसा शहर है जहां कप बदलते हैं लेकिन चमचे नहीं।'

यह किताब 1980 के दशक में इंदिरा गांधी और उनके बेटे राजीव गांधी के समय शुरू हुए विनियंत्रण एवं आधुनिकीकरण के उपायों के साथ शुरू होती है। मोंटेक राजीव के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके आर्थिक सलाहकार थे। फिर कहानी 1991 की शुरुआत में पैदा हुए भुगतान संतुलन संकट से होकर नरसिंह राव एवं मनमोहन सिंह के दौर में शुरू हुए व्यापक आर्थिक नीतिगत बदलावों को समेटती है।

मोंटेक ने उस समय रिकॉर्ड सात वर्षों तक वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव पद पर रहते हुए दूरगामी नीतिगत कदमों की रूपरेखा तय करने में एक केंद्रीय एवं अपरिहार्य भूमिका निभाई थी। संयुक्त मोर्चा के दो साल के गतिरोधक शासन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने सरकार बनाई थी और ढांचागत क्षेत्र, दूरसंचार, निजीकरण, बीमा, अप्रत्यक्ष कर एवं राजकोषीय जवाबदेही से संबंधित नीतियों में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सुधारों को आगे बढ़ाने का काम किया।

फिर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की साझा अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का एक दशक लंबा दौर आया जिसमें मोंटेक ने योजना आयोग की कमान संभाली थी। इस अवधि में आर्थिक नीतियों के निर्माण का उनका ब्योरा कुछ मायनों में शायद अधिक प्रशंसात्मक है। वह 2003-11 की अवधि में भारत की आठ फीसदी से ऊपर की आर्थिक वृद्धि और उसके चलते गरीबों की संख्या में आई गिरावट का सारा श्रेय तत्कालीन सरकार को ही देते नजर आते हैं। यह उत्पादकता बढ़ाने वाले सुधारों की दिशा में संप्रग के निराशाजनक प्रदर्शन को देखते हुए थोड़ा अनुचित लगता है। दूसरे लेखकों का भी मानना है कि संप्रग के सत्ता में आने के एक साल पहले ही शुरू हुआ यह उल्लेखनीय वृद्धि चक्र 1991 से लेकर 2004 के दौरान उठाए गए तमाम आर्थिक सुधारों का साझा परिणाम था।

इसमें 2002-07 के दौरान की मजबूत वैश्विक आर्थिक वृद्धि का भी योगदान था जिसने कई अन्य विकासशील देशों की किस्मत को भी बदला था। टी एन नाइनन ने भी बिज़नेस स्टैंडर्ड के अपने साप्ताहिक स्तंभ में दुनिया एवं भारत के आर्थिक प्रदर्शन के बीच इस अंतर्संबंध को रेखांकित किया है। भारत वैश्विक आर्थिक संकट के दो साल बाद तक उच्च आर्थिक वृद्धि करता रहा था जिसमें 2009 के आम चुनाव के पहले किए गए भारी-भरकम राजकोषीय व्यय की बड़ी भूमिका थी लेकिन यह पांच वर्षों तक दो अंकों वाली उपभोक्ता मुद्रास्फीति और रिकॉर्ड बाह्य क्षेत्र घाटे की कीमत पर हुआ था।

लेख का समापन मैं आर्थिक नीति-निर्माण के इस दिग्गज शिल्पकार से जुड़े व्यक्तिगत संस्मरण से करना चाहूंगा। मैं कुछ समय विदेश में बिताने के बाद 1993 की शुरुआत में परिवार के साथ दिल्ली लौटा था और मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया था। सरकारी आवास मिलने के कुछ दिनों बाद ही मेरे बरामदे से होकर गुजरने वाली पानी की पाइप लीक होने लगी थी। सरकारी आवासों की देखरेख से संबंधित सीपीडब्ल्यूडी के नियमों से अनजान होने से मैंने सीधे मोंटेक को फोन लगाया और उनसे एक प्लंबर का इंतजाम करने के बारे में सलाह मांगी।

उसके 15 मिनट के भीतर खुद केंद्रीय वित्त सचिव मेरे घर पहुंच चुके थे और पानी का रिसाव रोकने के इंतजाम में लग गए। उन्होंने फौरन एक पेड़ की छोटी टहनी काटी और उसे नुकीला बनाकर पाइप के छेद में घुसाकर रिसाव रोक दिया। इस घटना से दो बातें एकदम साफ हो गई थीं: मेरे विभाग के मुखिया को अपना काम बखूबी पता था और वह किसी भी हद तक मेरा साथ देने वाले थे। बाकी सब मजेदार होने वाला था और ऐसा ही हुआ। 

(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: Monek Singh Ahluwalia, Economy, Backstage, Bank, Yajna Aayog,
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