बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकों को उबारने की नीति पर विचार करने की जरूरत
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बैंकों को उबारने की नीति पर विचार करने की जरूरत

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  March 19, 2020

येस बैंक संकट से कुछ ऐसे प्रश्न खड़े हो गए हैं, जिन्हें अब कोई नहीं पूछ रहा है। ये सभी प्रश्न 21वीं शताब्दी के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैं और बैंकों के पतन, इससे निपटने के उपाय और जिन्हें इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है, उनसे संबंधित हैं। मेरे विचार से इन प्रश्नों का जवाब खोजना अहम है। पिछली शताब्दी के दूसरे हिस्से से हम इस सोच के साथ काम कर रहे हैं कि करदाताओं को बैंकों को रसातल में जाने से बचाना चाहिए। इससे ऐसी धारणा को बल मिला है कि बैंक घरों की तरह ही सुरक्षित हैं। हालांकि ऐसी सोच क्यों है कि बैंक जोखिम मुक्त हैं और लोग जितनी चाहे उतनी रकम इनमें रख सकते हैं। क्या केवल इसलिए कि बैंक जमाकर्ताओं को उनकी रकम पर ब्याज देते हैं? दूसरा प्रश्न यह है कि यह झूठी अवधारणा किसने आगे बढ़ाई है? यह कब और किस उद्देश्य से आई? 

यह सोचना बिल्कुल बचकाना होगा कि किसी वित्तीय लेनदेन में जोखिम नहीं होता है। जोखिम तो हमेशा बना रहता है। यह तब भी होता है जब आप बैंक में रकम डालते हैं और इस पर सरकार की पूरी गारंटी मिली होती है। लिहाजा, जब किसी बैंक का कारोबार किसी भी वजह से ठप होता है तो कम से कम तीन प्रश्न अवश्य पूछे जाने चाहिए। क्या 'सावधान ग्राहक' जैसी वैधानिक चेतावनी जमाकर्ताओं के मामले में भी लागू होती है? किसी अन्य कारोबार की तुलना में बैंकों की अधिक जिम्मेदारी क्यों होनी चाहिए? अगर वित्तीय उत्तरदायित्व के लिए धन करदाताओं को देना है तो यह कितना उचित है?

इस संदर्भ में एक उदाहरण पर विचार किया जा सकता है। म्युचुअल फंड कंपनियां अपने ग्राहकों को बाजार जोखिमों के बारे में बताती हैं और इसके लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। यह भी सच है कि यह औपचारिकता से अधिक नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बैंकों के लिए भी ऐसी चेतावनी क्यों जारी नहीं होती है? मेरा मानना है कि न केवल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को नियमित रूप में इस बारे में विज्ञापन देना चाहिए बल्कि प्रत्येक बैंक को अपनी चेकबुक पर यह चेतावनी छापनी चाहिए। अंशधारकों को ही नहीं बल्कि ग्राहकों को भी बैंकों से जुड़े जोखिमों के बारे में पता होना चाहिए। मैं मजाकिया लहजे में बिल्कुल भी ऐसा नहीं कह रहा हूं। मामला कुल मिलाकर सिगरेट की तरह ही है और आने वाले समय में हालात और बदतर होंगे। अब यह माना जाने लगा है कि बैंकों को दूसरे कारोबारों के मुकाबले अधिक उत्तरदायित्व के साथ काम करना चाहिए। लेकिन यह कितना विरोधाभासी कथन है। अनिश्चितता के कारण एक जवाबदेह बैंक का ऋण खाता (लोन बुक) शून्य होगा।

नियम कायदे एवं अनुपालन अपनी जगह दुरुस्त हैं, लेकिन तकनीकी बातों का भी ध्यान रखना होगा। इन चीजों से आपको यह मालूम नहीं होगा कि उधार लेने वाला व्यक्ति गैर-जिम्मेदार है या चीन एक बार फिर वुहान जैसे हालात दुनिया पर थोपने वाला है। अनिश्चितताएं कुछ ऐसी ही होती हैं। जब जोखिम अधिक होता है तो बैंक अधिक ब्याज वसूलते हैं, लेकिन ऊंची जमा दर के संदर्भ में देखें तो बैंक अपने ग्राहकों को संकेत देते हैं कि वे अधिक जोखिम ले रहे हैं। 

तीसरी अहम बात यह है कि अगर ढांचागत वित्तीय स्थिरता पर किसी एक बैंक के पतन का असर होता है तो करदाताओं, जो किसी अनुबंध का हिस्सा नहीं हैं, को क्यों अंशधारकों को बचाना चाहिए? कुल मिलाकर बात नैतिक जोखिम के इर्द-गिर्द ही घूमने लगती है। इसका आशय एक ऐसी स्थिति से है, जिसमें कोई बीमित व्यक्ति अधिक जोखिम लेने के लिए तैयार हो जाता है, क्योंकि उसे पता होता है कि इस जोखिम के लिए भुगतान किसी दूसरे को करना होता है। यह परंपरागत चेतावनी को भी धता बता देता है। हालांकि इसके बाद भी हम बैंकों को उबारने का जिम्मा करधारकों के माथे पर डाल देते हैं।

वर्ष 1907 में जे पी मॉर्गन ने इस मान्यता को बढ़ावा दिया कि बैंक खास संस्थान होते हैं, इसलिए उनके साथ अलग व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्होंने आपात परिस्थितियों के लिए एक 'संकट मोचक' बैंक का प्रस्ताव दिया और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के गठन में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फेडरल रिजर्व की स्थापना मुख्य रूप से अमेरिकी बैंकों के अंशधारकों को बचाने के लिए की गई थी। मॉर्गन ने सोचा कि बैंक के जमाकर्ता जोखिम उठा सकते हैं, लेकिन अंशधारक कोई जोखिम नहीं ले सकते हैं। 

दूसरी तरफ यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) का गठन मुद्राएं छापने और सरकार को उधारी देने के लिए किया गया था। इन पर अक्सर निजी नियंत्रण रहा। इनमें बैंक ऑफ इंगलैंड (बीओई) दूसरा सबसे पुराना बैंक था, जिस पर 1946 तक निजी नियंत्रण था, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक भी 1949 तक निजी नियंत्रण में था। कुछ देशों में वे अब निजी नियंत्रण में हैं। 1970 तक दो तरह के बैंक थे। इनमें एक वे थे, जिन्होंने सरकार को बचाया था और दूसरे वे थे, जिन्होंने अन्य बैंकों को डूबने से बचाया था। तब से वे दोनों को ही बचाते आ रहे हैं और करदाता इसका भुगतान करते हैं। 

हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जमाकर्ता भी करदाता ही होते हैं। एक जमाकर्ता भी कर भुगतान करता है। एक जमाकर्ता के रूप में वह जो भी अर्जित करता है उसे करदाता के रूप में इसे खोना पड़ सकता है। बैंकों को किसी भी सूरत में बचाने का चलन राजनीतिक दबाव में और अधिक विकृत हो गया है। लोगों के मन में यह बात डाल दी गई है कि बैंकों  को नहीं बचाने से पूरे आर्थिक ताने-बाने पर असर पड़ सकता है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। सरकार को उसी समय हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए जब चीजें बिगड़ जाती हैं? यही वजह है कि मुझे लगता है कि बैंकों को उबारने की पूरी नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जब सरकार के पास रकम रहती है तब तक यह कवायद चल सकती है, लेकिन आर्थिक मंदी मंडराने के समय में क्या उसके पास ऐसी क्षमता होगी?

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