बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोनावायरस और बाजार की मार
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कोरोनावायरस और बाजार की मार

आकाश प्रकाश /  March 19, 2020

वित्तीय बाजारों के लिए यह महीना कितना खराब रहा है? हमने हाल ही में वैश्विक इक्विटी बाजार को अब तक की सबसे बड़ी गिरावट से जूझते देखा है। महज कुछ हफ्तों में ही अमेरिकी प्रतिभूतियों में सबसे बड़ी उछाल और तेल कीमतों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट भी देखने को मिली है। डर और उठापटक का माहौल फैलता जा रहा है। वित्तीय बाजार अव्यवस्थित हो चुके हैं। बाजार पर डर के असर को परखने वाला वीआईएक्स सूचकांक वर्ष 2008 के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। 

शुरुआती दौर में एक क्षेत्रीय संकट के तौर पर देखी जा रही यह आपदा वैश्विक महामारी का रूप ले चुकी है। पश्चिमी जगत के अधिक उन्नत देश कोविड-19 वायरस की मार कहीं ज्यादा झेल रहे हैं। वे बेपरवाह और असावधान होने के साथ ही इससे निपटने के लिए तैयार भी नहीं थे और अब इसके संक्रमण पर काबू पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। जहां चीन ने इस घातक वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्सों को बंद करने की गंभीर आर्थिक पीड़ा उठाने से गुरेज नहीं किया, वहीं पश्चिमी देशों ने आसान विकल्प आजमाए। उनकी चिंता वित्तीय प्रणाली और इक्विटी बाजारों को बचाए रखने को लेकर कहीं अधिक दिखी। यूरोपीय संघ (ईयू) और अमेरिका ने कोविड-19 का फैलाव होता देख शुरुआती दौर में ब्याज दर की कटौती और तरलता समर्थन पर ध्यान दिया जबकि इस घातक वायरस से संक्रमित लोगों की पहचान एवं उन्हें अलग-थलग रखकर इलाज करने पर ध्यान देना चाहिए था। अमेरिकी प्रतिक्रिया का नेतृत्व फेडरल रिजर्व कर रहा था, न कि बीमारी नियंत्रण केंद्र (सीडीसी)।

चीन इस बीमारी के नए संक्रमणों पर काबू पाने में काफी हद तक सफल रहा है। उसने वायरस के मुख्य केंद्र हुबेई प्रांत और कुछ अन्य इलाकों को पूरी तरह से बंद कर दिया। सिंगापुर, ताइवान और दक्षिण कोरिया सघन जांच, संदिग्धों को अलग रखने और उनके इलाज के जरिये इस वायरस का प्रसार रोकने में कामयाब रहे हैं।

वायरस का प्रसार इटली तक होने और बहुत तेजी से संक्रमण फैलने के बाद यह साफ हो गया कि यूरोप के पास ऐसे सामाजिक ढांचे, कानून, संस्थागत क्षमता या संसाधन नहीं हैं कि वह सिंगापुर या दक्षिण कोरिया में सफलतापूर्वक आजमाए जा चुके तरीकों को लागू कर सके। इटली और बाकी यूरोपीय देशों के पास अब चीन जैसा सख्त कदम उठाने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया है। उन्हें भी देश के बड़े हिस्सों को बाहरी संपर्क से पूरी तरह अलग रखना और एक जगह लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाना होगा। ऐसा नहीं होने पर उनकी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली धराशायी हो जाएगी। अमेरिका को भी 10-15 दिन बाद यही कदम उठाने होंगे। वैसे चीन में यह देखा जा चुका है कि किसी शहर या इलाके को पूरी तरह बंद करने की आर्थिक लागत काफी भयावह होगी। चीन में नए मामले काफी कम हो जाने के बावजूद वहां के अधिकांश कारखाने अभी तक अपनी पुरानी क्षमता के 65 फीसदी स्तर तक ही पहुंच पाए हैं। अनुमान है कि 2020 की पहली तिमाही में चीन की आर्थिक वृद्धि ऋणात्मक रहेगी। लेकिन इतनी बड़ी आर्थिक लागत के बावजूद इस वायरस के तीव्र संक्रमण एवं 1-3 फीसदी मृत्यु दर को देखते हुए इस पर काबू पाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाना सामाजिक स्तर पर अस्वीकार्य है। इंसानी जिंदगी के संदर्भ में भी इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी होगी, अगर सभी सामाजिक संपर्कों पर रोक लगाने के कदम फौरन नहीं उठाए जाते हैं।

अब यह अपरिहार्य ही है कि विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की गिरफ्त में चली जाएगी। बहस केवल इस बात पर है कि क्या यह दो तिमाहियों तक रहने वाली एक तकनीकी घटना है या फिर इससे कहीं अधिक लंबी और गहरी होगी। 
किसी आम मंदी में कंपनियों की आय गिरती है और बाजार 25-30 फीसदी तक लुढ़क जाते हैं। लेकिन कोरोना के चलते पैदा होने वाली मंदी के आम मंदी जैसा रहने की संभावना नहीं है क्योंकि इस महामारी के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अचानक विराम लगा है। खपत लुप्त होने और आपूर्ति शृंखलाओं के ध्वस्त होने से कई क्षेत्र गहरे आघात का सामना करने वाले हैं। हमें कोई अंदाजा नहीं है कि ऐसा कब तक जारी रहेगा? वैश्विक वित्तीय संकट के उलट इस संकट का समाधान केंद्रीय बैंक नहीं कर सकते हैं। इसके लिए सरकारों से ठोस कदम उठाने की जरूरत है। पूरी संभावना है कि संकट खत्म होने के पहले एयरलाइन, आतिथ्य एवं पर्यटन उद्योगों को बेलआउट पैकेज दिए जाएंगे। 
बाजारों में खासा डर देखा जा रहा है क्योंकि कोरोना के चलते दुनिया भर के उच्च-प्रतिफल वाले बाजारों को तगड़ा आघात लगने के आसार हैं। विश्वव्यापी मंदी छाने और तेल कीमतों में तीव्र गिरावट के बीच उच्च-प्रतिफल बाजारों का बड़ा हिस्सा मुश्किल में है क्योंकि नकदी प्रवाह की समस्या है। ऋण विस्तार बढ़ा है लेकिन वर्ष 2008 के स्तरों तक पहुंचने के पहले अभी लंबा सफर तय करना होगा। नए कर्ज बंद होते ही कर्ज चुका पाने में सक्षम कई कंपनियों को भी परिपक्वता जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वे परिपक्व होने वाले बॉन्ड का भुगतान नहीं कर पाएंगी। कम-से-कम एक लाख करोड़ डॉलर के बीबीबी कागजात हैं जिन्हें डाउनग्रेड किए जाने और अ-निवेश श्रेणी के स्तर पर लुढ़कने की आशंका है। यह उच्च-प्रतिफल परिसंपत्ति समूह के आकार के दोगुने से अधिक होगा और इससे प्रतिफल बढ़ेगा क्योंकि इन बॉन्ड को खरीदने के लिए समुचित ग्राहक ही नहीं हैं। हम उच्च-प्रतिफल वाले कई फंड एवं ईटीएफ पर इस शोधन का असर पड़ते हुए भी देख रहे हैं। ये ऋणशोधन चोट पहुंचा रहे हैं क्योंकि बैंकों ने अपने बाजार-निर्माण में कमी की है जिससे तरलता की कमी और कीमतों में गड़बड़ी पैदा हुई है। बेहद कम प्रतिफल को देखते हुए मार्जिन जुटाने के लिए निवेशक आधार के बीच लाभ उठाने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। हालत यह हो गई है कि 50 लाख से 1 करोड़ डॉलर तक के छोटे कारोबार कर पाना भी मुश्किल लग रहा है। हमें करीबी नजर रखनी होगी कि यहां क्या होता है और उसका संभावित संक्रमण कैसा रहता है? यह आसन्न खतरे की चेतावनी हो सकती है। 
नीति-निर्माताओं ने अब पैनिक बटन दबा दिया है। फेड रिजर्व ने ब्याज दरों में कटौती कर दी है और राहत पैकेज अगला कदम है। छोटी एवं मझोली कंपनियों, कंपनियों और अन्य तनावग्रस्त क्षेत्रों में तरलता बनाए रखने और ऋण प्रवाह सुनिश्चित करने के कदम वैश्विक स्तर पर उठाए जा सकते हैं। 
हम कोरोना संकट से बाहर निकलेंगे और बाजार एवं अर्थव्यवस्था दोनों ही सामान्य हो जाएंगी। लेकिन इसमें किसी व्यक्ति को धीरे-धीरे और सोचे-समझे ढंग से खरीद करनी चाहिए। इटली में सामने आने वाले नए मामलों पर नजर रखनी होगी। जैसे ही यह साफ हो जाता है कि इटली कोरोना के प्रसार पर काबू पाने लगा है और हालात नियंत्रण में आने लगे हैं, बाजार को यह लगने लगेगा कि पश्चिम के दूसरे देश भी इस राह पर चल सकते हैं। जहां तक भारत का सवाल है तो अगर हम गर्मी एवं नमी के चलते कहीं बेहतर प्रतिरोधक क्षमता होने और सीमाओं को बंद करने से इस वायरस को काबू में रख पाते हैं तो यह खरीदारी का मौका लेकर आएगा। तेल कीमतों में आई गिरावट और वैश्विक तरलता बढऩे एवं ब्याज दरों के रिकॉर्ड निचले स्तर पर होने से भारत को लाभ होगा। हम एक साल से अधिक समय से सुस्ती के दौर में हैं और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से बाकी देशों जैसा नजदीकी जुड़ाव भी नहीं है। दुनिया के उभरते बाजारों में भारी शोधन का असर भारत पर भी बराबर पड़ा था क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा निष्क्रिय प्रवाह का है। भारत के कुछ जोखिमों पर आखिरकार ध्यान दिया जा रहा है। कंपनी क्षेत्र की साफ-सफाई का काम काफी हद तक पूरा होने के करीब है। मूल्यांकन कहीं अधिक संवेदनशील दायरे में है। अगर भारत में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ते हैं तो फिर समस्या होगी। अन्यथा यह भारतीय निवेशकों के लिए खरीद का मौका लाएगा और लंबे समय तक तेजी का रुख रहेगा।
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