बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रोत्साहन पैकेज के लिए उपयुक्त समय नहीं
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प्रोत्साहन पैकेज के लिए उपयुक्त समय नहीं

मिहिर शर्मा /  March 18, 2020

आज की दुनिया की सबसे रहस्यमयी मान्यताओं में यह धारणा भी शामिल है कि सरकारें अर्थव्यवस्था की किसी भी खामी को दूर कर सकती हैं। यह धारणा आम लोगों ने नहीं बनाई है बल्कि अर्थशास्त्रियों, राजनेताओं और बेहतर समझ रखने वाले लोगों ने बनाई है। यह धारणा कम विकट नहीं है क्योंकि मोटे तौर पर इसके बारे में बात नहीं होती है। कोरोनावायरस के बढ़ते प्रकोप के समय अर्थव्यवस्था के लिए प्रोत्साहन पैकेज की मांग के पीछे यही अवधारणा है। 

चीन के वुहान में पैदा हुए कोरोनावायस के कारण फैल रही कोविड-19 गंभीर बीमारी है। यह वैश्विक जन स्वास्थ्य के लिए एक असाधारण चुनौती है। हालांकि कई दूसरी बीमारियों की तुलना में कम भयावह है। उदाहरण के लिए यह चेचक की तुलना में एक तिहाई से भी कम संक्रामक है। खसरा शायद इससे छह गुना ज्यादा संक्रामक है। इस शताब्दी में जानवरों से इंसान में आए दो वायरस मर्स और सार्स ज्यादा खतरनाक थे। मर्स की शुरुआत 2012 में सऊदी अरब से हुई थी और इसमें करीब एक तिहाई संक्रमित लोगों की मौत हो गई थी। मर्स और सार्स स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहे और खासकर मर्स कोविड-19 से कम संक्रामक था। लेकिन सच्चाई यह है कि कोविड-19 संक्रामक और घातक होने से ज्यादा वैश्विक स्तर पर जन स्वास्थ्य के लिए कई दशकों में पहला संकट है। 

इस तरह के किसी भी संकट के व्यापक नतीजे होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 का टीका विकसित होने से पहले उससे बचने का सबसे अच्छा तरीका सामाजिक दूरी है। यानी आपको खुद को अपने तक ही सीमित रखना होगा। इससे बहुत सारे लोगों में एक साथ लक्षण नहीं दिखेंगे और स्वास्थ्य व्यवस्था को नए मरीजों से बेहतर ढंग से निपटने में मदद मिलेगी। 

सामाजिक दूरी का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि लोगों को एकदूसरे से दूर रहना है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था लोगों के घरों से नहीं चलती है। सामाजिक दूरी का मतलब है घर से काम करना, यात्रा करने से बचना, भीड़भाड़ से दूर रहना आदि। जाहिर है कि इन उपायों से उत्पादन में कमी आएगी। अगर दक्षिण चीन जैसे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के प्रमुख केंद्रों में इस वायरस का प्रकोप फैलता है तो इससे उत्पादन में कमी आएगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। नागरिक उड्डïयन जैसे कुछ क्षेत्रों पर इसका व्यापक प्रभाव होगा।

यहीं पर सरकार की कार्रवाई के बारे में छिपी धारणा सामने आती है। इस धारणा के मुताबिक अगर उत्पादन में कमी आई है तो सरकार को इसे स्वाभाविक स्तर पर लाने के लिए कुछ करना चाहिए। इस विचारधारा के मुताबिक खर्चीली राजकोषीय या मौद्रिक नीति जरूरी है। यह मूर्खतापूर्ण धारणा है। कोविड-19 जैसी विश्वव्यापी महामारी अर्थव्यवस्था में कोई अतिरिक्त क्षमता पैदा नहीं कर रही है जिसके लिए सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत है। इससे बचने के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं उनके उत्पादन में कमी आने की आशंका है।

इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ केंद्रीय बैंकों को कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि कोविड-19 से वित्तीय बाजारों की रफ्तार नहीं थमनी चाहिए। उदाहरण के लिए यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने कहा है कि वह यह सुनिश्चित करेगा कि बैंकों के पास उधारी जारी रखने के लिए पर्याप्त नकदी हो। अमेरिका फेडरल रिजर्व ने भी 1.5 लाख करोड़ डॉलर की नकदी झोंकी है और साथ ही नीतिगत ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की कटौती करने का चौंकाने वाला फैसला भी लिया है। अभी किसी को यह पता नहीं है कि ब्याज दरों में कटौती से क्या हासिल होगा लेकिन निश्चित रूप से शेयर बाजार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। 

सरकारी खर्च बढऩे से भी इसमें कोई मदद नहीं मिलेगी। एक आम राजकोषीय प्रोत्साहन का मकसद लोगों में खर्च की प्रवृत्ति को बढ़ाना है। अभी हमें इसकी जरूरत नहीं है-खासकर अगर यह खर्च सामाजिक दूरी के साथ प्रतिकूल संबंध रखता हो। इसके बजाय कोरोनावायरस से प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के लिए लक्षित सहायता ज्यादा उपयोगी हो सकती है। उदाहरण के लिए कोरोनावायरस से शुरुआत में ही प्रभावित होने वाले दक्षिण कोरिया ने हर स्तर पर शानदार काम किया है। वहां की सरकार ने बच्चों की देखभाल के लिए एक आपात सब्सिडी की व्यवस्था की और साथ ही छोटे उद्यमों को राहत देने के लिए भी विशेष इंतजाम किए। अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष ने भी इस तरह के फौरी उपाय करने और कर में राहत देने का सुझाव दिया है। यहां हमारा मकसद कोरोनावायरस के प्रभावों का आकलन करना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इससे अर्थव्यवस्था को ज्यादा नुकसान न हो और लोगों तथा कारोबारियों के पास लंबे समय तक इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त संसाधन हों। अभी हम नहीं जानते हैं कि इससे कितने लंबे समय तक उत्पादन प्रभावित होगा और किन क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा। 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रोत्साहन पैकेज की मांग को आम बजट में ठुकरा दिया था लेकिन शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने इस बारे में कहा कि सरकार इस मोर्चे पर आगे बढ़ रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे प्रोत्साहन पैकेज को लेकर उम्मीदें बढ़ जाएंगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। उम्मीद है कि जो कुछ भी उपाय किए जाएंगे, वे पूरी आर्थिक गतिविधि के लिए नहीं होंगे बल्कि इससे प्रभावित क्षेत्रों को अपना कारोबार जारी रखने में फौरी राहत मिलेगी। कोविड-19 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की तरह नहीं है। यह अलग तरह का संकट है। आप इसमें से अपना रास्ता नहीं निकाल सकते हैं। सरकार के पास दूसरे कई काम हैं और उसे उन पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उदाहरण के लिए उसे संसाधनों की कमी से जूझ रहे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को सक्षम बनाने पर काम करना चाहिए।

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