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गलत प्रोत्साहन हैं वास्तविक समस्या

अजय शाह /  March 18, 2020

रूढि़वादी लोगों का कहना है कि देश के वित्तीय जगत की मौजूदा नीतिगत मशीनरी मोटे तौर पर ठीक है। येस बैंक संकट हमें यह याद दिलाता है कि नीतिगत व्यवस्था में कई खामियां हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि नाकामी को लेकर व्यक्तिगत होने की आवश्यकता नहीं है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अधिकारियों ने इन कठिनाइयों से निपटने में समझदारी और प्रतिबद्धता का परिचय दिया। दरअसल कमी संस्थागत क्षमता और प्रोत्साहन और सूचनाओं की अवैयक्तिक कार्यपद्धति थी। इसका हल संस्थागत सुधार में है।

बाजार आधारित ऋण जोखिम आकलन बताता है कि येस बैंक सन 2011 से 2014 तक और उसके बाद 2018 के बाद से कठिनाई के दौर से गुजर रहा था। इसके बावजूद मार्च 2019 में उसने 16.5 फीसदी का बेहतर पूंजी पर्याप्तता अनुपात दर्शाया था। जाहिर है यह आंकड़ा गलत था। बैंकिंग नियमन बनाने और उनके क्रियान्वयन दोनों में खामी थी।

किसी बैंकों के संचालन के लिए नीतियां बनाने का शुरुआती चरण अत्यंत निराश करने वाला होता है। नीति निर्माता तमाम उलझनों में रहते हैं और उनके पास पर्याप्त विचार करने और सावधानीपूर्वक डिजाइन तैयार करने का वक्त ही नहीं रहता। परंतु अधिकारियों को इस अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा ही नहीं करनी चाहिए थी। उनके पास निस्तारण योजना तैयार करने का पर्याप्त समय था। हम यह तो मानते हैं कि देश में ऐसे निस्तारण निकाय का अभाव है जो देश की वित्तीय कंपनियों को समुचित निस्तारण मुहैया करा सके। येस बैंक और इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के निस्तारण की पूर्व शर्त की तुलना अगर 2001 में यूटीआई और 2004 में ग्लोबल ट्रस्ट बैंक के निस्तारण की पूर्व शर्त से की जाए तो यह काफी समस्याग्रस्त नजर आती है।

यह बात आर्थिक कारकों को किस प्रकार बदल सकती है? निजी व्यक्ति शायद निजी बैंकों के खुलासों और उनकी ऋण देने की क्षमता पर कम ही भरोसा करते हैं। वे इलेक्ट्रॉनिक भुगतान व्यवस्था पर भी कम भरोसा करते हैं। यदि भरोसे की यह कमी तनावग्रस्त निजी कंपनियों के एक समूह में विकसित हो जाती है तो इसका प्रसार इन कंपनियों कीऋण या जमा तक सीमित पहुंच के रूप में सामने आ सकता है। लंबी अवधि में इन बदलावों के प्रोत्साहन संबंधी निहितार्थ अर्थव्यवस्था के लिए अधिक मानीखेज साबित हो सकते हैं, बजाय कि तात्कालिक उथल-पुथल के। 

मुख्यधारा की बहस में किसी कंपनी के ढह जाने को व्यक्तियों की विफलता माना जाता है। फर्म और नीतिगत संस्थान दोनों जगह ऐसा होता है। हमें इस सिद्घांत को संदेह की नजर से देखना चाहिए कि ऐसी घटना कुछ बुरे लोगों के कारण होती है। अधिक अमूर्त नजरिया अधिक अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाला होता है क्योंकि इसमें व्यक्तियों को एक व्यापक नाटक में केवल अपना किरदार निभाने वाला माना जाता है। यहां हर व्यक्ति प्रोत्साहन को लेकर प्रतिक्रिया दे रहा होता है।

 

येस बैंक की विफलता में शामिल मनुष्यगत कदम ऐसी ही प्रतिक्रिया थे।  हम जानते हैं कि देश के नागरिक यातायात की लाल बत्ती का उल्लंघन करने को उत्सुक रहते हैं लेकिन यही नागरिक दूसरे देशों में इन नियमों का अच्छी तरह पालन करते हैं। मोटे तौर पर लोग हर जगह एक से होते हैं। असल बात यह है कि उन्हें क्या प्रोत्साहन मिलते हैं। येस बैंक के पतन के बाद जरूरत जांच और लोगों की खामी तलाशने की नहीं है। असली चिंता गलत प्रोत्साहनों की होनी चाहिए।

निजी वित्तीय कंपनियों में शामिल लोग बार-बार गलत काम क्यों करते हैं? नीतिगत संस्थानों में शामिल लोग बार-बार गलतियां क्यों करते हैं? दोनों मामलों में असल बात गलत प्रोत्साहन से जुड़ी है। जिन बुरे प्रोत्साहनों ने हमें 2011-12 के बाद से लगातार अहम वित्तीय संकट में डाला है वे अभी भी बरकरार हैं। यदि जरूरी सुधार नहीं अपनाए गए तो संकट और गहराएगा। 

हम बैंकिंग नियमन में कैसे सुधार करेंगे? आरबीआई को उद्देश्य स्पष्ट करना चाहिए: खुदरा महंगाई को 4 फीसदी करना और बैंकों को मजबूत और सुरक्षित करना। आरबीआई बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों का बहुमत है, ऐसे में आवश्यकता यह है कि बोर्ड को संगठनात्मक ढांचे के अधीन रखा जाए, प्रबंधन को जवाबदेह बनाया जाए और विधायी कामकाज पर नियंत्रण किया जाए। विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक कामकाज में अच्छी संचालन प्रक्रिया की आवश्यकता होती है जो कानून में संहिताबद्ध हो। तमाम अन्य वित्तीय एजेंसियों की तरह आरबीआई को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के अंकेक्षण और प्रतिभूति अपील पंचाट की आवश्यकता है। इतना ही नहीं रिपोर्टिंग, आरटीआई और बजट की औपचारिक प्रक्रियाओं की भी आवश्यकता है।

निस्तारण में सुधार कैसे हो? भारत में ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) का सफर 2016 में शुरू हुआ। फिर भी दो तरह की वित्तीय फर्म हैं जहां आईबीसी की प्रक्रिया के कमजोर रहने की आशा है। एक तो वे फर्म जो आम परिवारों से संबद्ध हैं, मसलन बैंक और बीमा कंपनियां तथा दूसरी व्यवस्थागत रूप से महत्त्वपूर्ण फर्म मसलन एचडीएफसी आदि। इन दोनों समूहों के लिए विशेष निस्तारण निकाय की आवश्यकता है जो नाकाम वित्तीय फर्म के निपटान में कर्जदाताओं के हित से परे नजर डालेगा।

इन विचारों पर भारतीय शोध समुदाय में सन 1990 के दशक से ही काम हो रहा है, विशेषज्ञ समिति ने 2007 से 2010 तक इस पर काम किया और सन 2011-15 के दौरान न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण के नेतृत्व वाले वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) ने मसौदा कानून तैयार किया।

नीतिगत विश्लेषण की इस प्रक्रिया के दौरान देश की वित्तीय आर्थिक नीति में तमाम खामियां नजर आईं और संस्थागत सुधारों का डिजाइन तैयार किया गया। भारतीय नीतिगत समुदाय के एक हिस्से का कहना रहा है कि देश के वित्त जगत की बड़ी खामी सरकारी बैंकों का भारी-भरकम आकार है। हालांकि मैं सरकारी स्वामित्व का हिमायती नहीं हूं लेकिन वित्तीय क्षेत्र में सरकारी नियमन की कमी को लेकर चिंता जायज है। अर्थशास्त्री लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि सरकारी बैंकों से भी बड़ी समस्या कमजोर नियमन वाले निजी बैंक हैं। अगले 25 वर्ष में चरणबद्ध ढंग से पहले बैंकिंग नियमन मजबूत किए जाएं, उसके बाद निजी बैंकों के लिए रास्ते खुले और अंत में सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाए। जब तक नियमन क्षमता मजबूत नहीं है, छोटा बैंकिंग तंत्र ही हमारे हित में है। 

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)
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