बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रवर्तन की कार्रवाई के डर से कंपनी सुसंचालन पर असर
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प्रवर्तन की कार्रवाई के डर से कंपनी सुसंचालन पर असर

सोमशेखर सुंदरेशन /  March 16, 2020

कंपनी जगत राहत की सांस ले रहा है। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने हाल ही में एक अहम कदम उठाते हुए एक मानक परिचालन प्रक्रिया जारी की। इसमें कहा गया है कि कंपनी कानून का पालन नहीं करने पर स्वतंत्र निदेशकों और गैर-कार्यकारी निदेशकों के खिलाफ नियमित रूप से कानूनी कार्यवाही नहीं होनी चाहिए। 

इस परिपत्र को ऐसे लोगों के खिलाफ दायर मुकदमों या शुरू की गई मुकदमे की कार्यवाही पर 'स्पष्टीकरण' बताया गया। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि कंपनी की गलतियों के लिए उसके प्रबंधन में अहम पद पर बैठे व्यक्ति और दैनिक कामकाज से जुड़े पूर्णकालिक निदेशकों को उत्तरदायी होना चाहिए। हालांकि इसमें कुछ भी नया नहीं है बल्कि यह 1990 के दशक से ही कानून का हिस्सा था और इसे 2013 में बनाए गए नए कंपनी कानून में भी इसे कूटबद्ध किया गया था। 

आखिर कानून के स्पष्ट होने के बावजूद भी इस तरह के स्पष्टीकरण की जरूरत क्यों पड़ी। साफ है कि प्रवर्तन की व्यवस्था में खामी है। इस स्पष्टीकरण में वही बात कही गई है जो जुलाई 2011 में मास्टर सर्कुलर में कही गई थी। 2011 के मास्टर सर्कुलर में नवंबर 1998 में जारी इस स्पष्टीकरण पर जोर दिया गया था कि किसी कंपनी की गलतियों की सजा उसके प्रबंधन में शामिल अधिकारियों को मिलनी चाहिए और अगर प्रबंधन में कोई तय अधिकारी नहीं है, तो उसी स्थिति में निदेशकों का रुख किया जाना चाहिए।

बीच के नौ वर्षों के दौरान इन सिद्धांतों को संसद द्वारा बनाए गए कानून में कूटबद्ध किया गया लेकिन इससे कोई फर्क पैदा नहीं हुआ। यही असली कहानी है। प्रवर्तन के उचित कार्यान्वयन का मतलब है कि गलती करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो और बेगुनाहों को बेमतलब में परेशान न किया जाए। जब किसी बेगुनाह को आरोपी बनाया जाता है तो इससे समय और संसाधनों पर बिना वजह दबाव बढ़ता है। प्रवर्तन कार्रवाई की आशंका से गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन कंपनियों के बोर्ड में निदेशक बनने से कतराते हैं। इससे कंपनियों के कामकाज में गुणवत्ता लाने का व्यापक उद्देश्य प्रभावित होता है। 

कंपनी कानून में लंबे समय से गलती करने वाले अधिकारी की अवधारणा रही है। यह ऐसा व्यक्ति होता है जिसकी पहचान बोर्ड एक ऐसे शख्स के रूप में करता है जो कंपनी के कामकाज और नियमों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी होती है। फिर भी कंपनी कानून का पालन कराने वाले अधिकारी और दूसरी एजेंसियां नियमित तौर पर निदेशकों पर कार्रवाई करती हैं। 

2011 के मास्टर सर्कुलर में यह सुनिश्चित करने के लिए कि निदेशक के खिलाफ प्रवर्तन की कार्रवाई की जानी चाहिए या नहीं, बोर्ड की प्रक्रियाओं के बारे में उसकी जानकारी की जांच की अवधारणा पेश की थी। कंपनी कानून, 2013 की धारा 149 (12) में इसे जोड़ा गया था। किसी कंपनी के बोर्ड की बैठक में जो कुछ रखा जाता है, उसके लिए निदेशक अनिवार्य रूप से प्रबंधन पर निर्भर होता है।

बोर्ड को प्रबंधन पर भरोसा करना होता है और वह प्रबंधन और अहम पद पर बैठे शख्स के हर फैसले को शक की निगाह से नहीं देख सकता है। अगर किसी कंपनी का बोर्ड प्रबंधन के हर फैसले पर उंगली उठाएगा और इस प्रक्रिया में शीर्ष नेतृत्व को कमजोर करेगा, तो फिर कंपनी काम नहीं कर पाएगी। इसी तरह सूचीबद्ध कंपनियों के संचालन के लिए पूंजी बाजार नियामक द्वारा बनाए गए नियमों में भी यही सिद्धांत अपनाया गया है। फिर भी आए दिन निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई की घटनाएं होती रहती हैं। 

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने मामले की गंभीरता को समझा है और स्पष्टीकरण जारी किया है। लेकिन इस बारे में जागरूकता पैदा करना और दूसरी प्रवर्तन एजेंसियों के साथ क्षमता का निर्माण भी जरूरी है। किसी कंपनी में कुछ भी गलत होता है तो राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां नियमित रूप से उसके सभी निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई करती हैं। ऐसे निदेशकों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने के फैसलों से अदालतें पटी पड़ी हैं। 

साथ ही निदेशकों को जनहित याचिकाओं का भी सामना करना पड़ रहा है। कई निदेशकों को अपनी परिसंपत्तियां घोषित करनी पड़ी हैं और लंबित जांच के कारण उनकी संपत्तियां सील हो गई हैं। इस महीने आए स्पष्टीकरण में कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकारियों से आंतरिक जांच और उचित निर्देश के लंबित मामलों की भी जानकारी देने को कहा गया है। नियामकों और प्रवर्तन एजेंसियों को कंपनी मामलों के मंत्रालय की परिधि से बाहर निकालना अगला लक्ष्य होना चाहिए।

(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं।)
Keyword: Company, law, Comapny law, Company Board,
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