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कोरोना से निपटने की तैयारी पर्याप्त नहीं

सचिन मामबटा और सोहिनी दास /  March 15, 2020

सरकार ने मॉल और भीड़ वाली जगहों को बंद करने की घोषणा देश में कोरोनावायरस संक्रमण को नियंत्रित करने का अहम पहलू हो सकता है। स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा और 10 शीर्ष प्रभावित देशों के डेटा के विश्लेषण से यह अंदाजा होता है कि भारत ऐसी महामारी के लिए जरूरी संसाधनों के लिहाज से पीछे रहेगा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 13 मार्च तक खत्म हुए हफ्ते के दौरान 123 देशों में 132,536 मामले की पुष्टि हुई है। चीन, इटली, ईरान, दक्षिण कोरिया, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका, स्विटजरलैंड और जापान जैसे शीर्ष 10 देशों में मामले की पुष्टि हुई है। कोविड-19 के 90 फीसदी मरीज इन्हीं देशों से हैं। इन देशों के मुकाबले भारत में प्रति 1,000 लोगों में से कुछ को ही अस्पताल का बेड और डॉक्टर उपलब्ध होगा। 

देश में एक बड़े तबके के पास हाथ धोने के सामान और बीमारी को दूर रखने की बुनियादी जरूरतें पूरी करने की सुविधाएं नहीं हैं। देश में काफी तादाद में लोगों की माली हालत इस वजह से भी खराब हो जा रही है क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ जाती है। इससे यह अंदाजा मिलता है इस महामारी के फैलने पर स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतें आएंगी और असमानता की खाई बढ़ेगी। विश्व बैंक के आंकड़ों के विश्लेषण से भी इस असमानता का अंदाजा होता है कि भारत और कोरोनावायरस से अब तक प्रभावित प्रमुख देशों के बीच कितना अंतर है। वर्ष 2011 में भारत में प्रति 1,000 लोगों पर 0.7 अस्पताल और इतने ही डॉक्टर थे जबकि चीन में इसी साल 3.8 और इटली में 3.5 अस्पताल थे। वहीं चीन में 1.8 और इटली में 4.1 डॉक्टर थे।

कोविड-19 से बचने के लिए हाथ-धोने की सिफारिश की जाती है। 2017 के आंकड़ों से यह अंदाजा मिलता है कि करीब 50.7 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास हाथ धोने की बुनियादी सुविधा यानी साबुन और पानी तक नहीं है। शहरी आबादी में 20.2 फीसदी आबादी और कुल 40.5 फीसदी आबादी के पास कोई सुविधा नहीं है। भारतीय लोग बड़ी बीमारी की चपेट में आने पर खर्च की वजह से गरीबी में फंस जाते हैं। 2011 में स्वास्थ्य सेवाओं पर हैसियत से ज्यादा खर्च ईरान में 0.03 फीसदी जबकि भारत 4.16 फीसदी रहा। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि भारत स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करने वाले देशों में नहीं रहा है। वर्ष 2016 में विश्व बैंक के पास उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों को देखते हुए अंदाजा होता है कि भारत में सरकार के स्तर पर स्वास्थ्य पर 3.14 फीसदी खर्च किया गया जबकि चीन में यह खर्च 9.05 फीसदी तक रहा वहीं इटली में 13.47 फीसदी जबकि ईरान में स्वास्थ्य पर 22.6 फीसदी खर्च किया गया। 

भारत में 'आयुष्मान भारत' के जरिये स्वास्थ्य बीमा देने की कोशिश की गई है। हालांकि इसमें भी कई तरह की दिक्कतें सामने आ रही हैं कि अस्पताल इस योजना के मरीजों को लेने से इनकार कर रहे हैं। मणिपाल एजुकेशन ऐंड मेडिकल ग्रुप (एमईएमजी) के चेयरमैन रंजन पई का कहना है, 'जब ऐसी महामारी होती है तब किसी भी देश का स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा चरमरा जाता है। मुझे लगता है कि सरकार काफी सक्रियता दिखा रही है। मैंने इससे पहले वैश्विक स्तर पर कोई अफरा-तफरी नहीं देखी है।' विनिर्माण सेगमेंट के मुताबिक मास्क, श्वसन से जुड़े उपकरण की कमी से भी वैश्विक स्तर पर हलचल है और भारत में भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। 

एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (एआईएमईडी) के राजीव नाथ कहते हैं, 'चीन से कई उपकरणों के आयात में कमी की वजह से देश के स्वास्थ्य सुरक्षा पर असर पड़ेगा क्योंकि चीन पर इन उपकरणों को लेकर काफी निर्भरता रही है। वैश्विक स्तर पर मास्क और ग्लोव की कमी का फायदा लेने के लिए घरेलू कंपनियां विनिर्माण पर जोर दे रही हैं।' नाथ का कहना है कि वे विनिर्माण क्षमता और वेंटीलेटर तथा ऑक्सीजन आपूर्ति की क्षमता से जुड़े आंकड़े जुटा रहे हैं। 3 मार्च को डब्ल्यूएचओ ने कहा कि इसने 47 देशों में 5 लाख सुरक्षात्मक उपकरण और सामान भेजे हैं लेकिन अब भी आपूर्ति कम पड़ रही है। इसका अनुमान है कि वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए निर्माण में 40 फीसदी की बढ़ोतरी जरूरी है। डब्ल्यूएचओ ने 'कोविड 19 सॉलिडैरिटी रिस्पॉन्स फंड' बनाया है।

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